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“झारखंड में हेल्थ सिस्टम की बड़ी चूक: 7 साल की बच्ची को चढ़ाया दूषित खून, HIV पॉजिटिव निकली”

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रांची 26 अक्टूबर 2025

झारखंड से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जहां महज 7 साल की एक बच्ची HIV पॉजिटिव पाई गई है। परिवार ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि बच्ची को यह संक्रमण उस समय हुआ जब एक सरकारी अस्पताल से उसे ब्लड ट्रांसफ्यूजन (रक्त चढ़ाने) के दौरान दूषित रक्त दिया गया। मामले के उजागर होने के बाद राज्य स्वास्थ्य विभाग ने जांच के आदेश जारी कर दिए हैं, जबकि ब्लड बैंक और अस्पताल प्रशासन सवालों के घेरे में आ गए हैं।

इलाज के दौरान हुआ संक्रमण का शक

जानकारी के मुताबिक, बच्ची को कुछ सप्ताह पहले गंभीर एनीमिया (खून की कमी) के कारण इलाज के लिए धनबाद जिले के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों ने उसे रक्त चढ़ाने की सलाह दी थी। परिवार का आरोप है कि अस्पताल के ब्लड बैंक से लाया गया खून संक्रमित था, और उसी कारण अब बच्ची HIV पॉजिटिव पाई गई है।

मां का कहना है, “हमारी बच्ची पूरी तरह स्वस्थ थी, उसे कभी कोई ऐसी बीमारी नहीं थी। अस्पताल से खून चढ़ाने के कुछ हफ्तों बाद उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। जब हमने जांच कराई, तो रिपोर्ट में HIV पॉजिटिव आया। यह साफ है कि यह संक्रमण उसी रक्त से हुआ है।”

परिवार में मातम और गुस्सा

इस खबर ने पूरे इलाके को हिला दिया है। परिवार सदमे में है और न्याय की मांग कर रहा है। बच्ची के पिता ने कहा कि “सरकारी लापरवाही ने हमारी बेटी की जिंदगी बर्बाद कर दी।” उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

जांच समिति गठित, सैंपल फिर से जांचे जाएंगे

राज्य स्वास्थ्य विभाग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कर दी है। विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि संबंधित ब्लड बैंक से रक्त के नमूने को दोबारा परीक्षण के लिए भेजा गया है। “अगर यह साबित होता है कि HIV संक्रमित रक्त चढ़ाया गया था, तो संबंधित मेडिकल अधिकारियों और ब्लड बैंक कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी,” अधिकारी ने कहा।

चिकित्सीय लापरवाही या सिस्टम की विफलता?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रक्त संक्रमण से पहले HIV, हेपेटाइटिस B और C जैसी बीमारियों की स्क्रीनिंग अनिवार्य होती है। ऐसे में अगर यह आरोप सही साबित होता है, तो यह न केवल एक गंभीर चिकित्सीय लापरवाही है बल्कि पूरे ब्लड बैंक सिस्टम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

मानवाधिकार संगठनों का हस्तक्षेप

इस घटना के बाद कई मानवाधिकार और बाल अधिकार संगठनों ने भी संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक बच्ची का मामला नहीं, बल्कि देश की रक्त सुरक्षा प्रणाली की नाकामी का संकेत है। एनजीओ प्रतिनिधियों ने कहा कि ऐसे मामलों में राज्य को पीड़ित परिवार को मुआवजा और आजीवन इलाज की सुविधा देनी चाहिए।

झारखंड की यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्था की भयावह स्थिति को उजागर करती है, जहां एक मासूम बच्ची प्रशासनिक लापरवाही की कीमत अपनी पूरी जिंदगी से चुकाने को मजबूर है। जांच भले ही जारी है, लेकिन सवाल अब भी बरकरार है — क्या भारत की ब्लड सेफ्टी प्रणाली सचमुच सुरक्षित है, या फिर ऐसे हादसे और बच्चों की जिंदगी छीनते रहेंगे?

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