अखलाक अहमद । नई दिल्ली 9 दिसंबर 2025
देश में एक बार फिर ‘वंदे मातरम्’ को लेकर राजनीतिक और वैचारिक बहस तेज हो गई है। संसद और सड़कों पर इस मुद्दे पर गरमाहट बनी हुई है, और इसी क्रम में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने ऐसा बयान दिया है जिसने राष्ट्रीय विमर्श को और प्रज्वलित कर दिया है। मदनी ने साफ शब्दों में कहा कि मुस्लिम समाज “वंदे मातरम्” को स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि यह उनके अनुसार शिर्क यानी इस्लामिक आस्था के विरुद्ध है। उन्होंने कहा—“हम जिएंगे तो इस्लाम पर, मरेंगे तो इस्लाम पर; मजहबी तौर पर वंदे मातरम् कहना हमारे लिए मुमकिन ही नहीं है।”
मदनी ने केंद्र सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि वंदे मातरम् जैसे धार्मिक संवेदनशील मुद्दों को राजनीतिक लाभ के लिए उछाला जा रहा है। उनका कहना था कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और किसी भी संप्रदाय पर ऐसा कोई भी कार्य थोपना जो उनकी आस्था के विरुद्ध जाता हो, लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि मुसलमान किसी भी कीमत पर देश-विरोधी नहीं, लेकिन उन्हें अपने धार्मिक सिद्धांतों से विचलित करने की कोशिशें स्वीकार्य नहीं हैं। मदनी के इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक तेज प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं।
उन्होंने अपने संबोधन में यह भी दावा किया कि मुसलमान देशभक्ति में पीछे नहीं हैं, लेकिन देशभक्ति को किसी एक विशेष नारे या गीत से जोड़ना गलत है। मदनी ने कहा कि “हमारी वफादारी इस मुल्क से है और हमेशा रहेगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने धर्म के खिलाफ जाकर कुछ स्वीकार करें।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि वंदे मातरम् में मातृभूमि की उपासना का भाव है, जो इस्लामी सिद्धांतों में स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि इस्लाम में इबादत सिर्फ अल्लाह की होती है।
दूसरी ओर, राजनीतिक दलों और कई सामाजिक संगठनों ने मौलाना मदनी के बयान को विभाजनकारी और पुरातनपंथी बताया है। भाजपा के नेताओं ने इसे “राष्ट्र-विरोधी मानसिकता” कहा और आरोप लगाया कि ऐसे बयान समाज में नफरत और भ्रम फैलाते हैं। कुछ नेताओं ने कहा कि वंदे मातरम् राष्ट्र का गौरव है और इसे लेकर किसी भी प्रकार का विरोध “अखंडता के खिलाफ” है। वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे एक संवेदनशील धार्मिक मुद्दा बताते हुए केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार हर मुद्दे को राजनीतिक ध्रुवीकरण में बदलना चाहती है, ताकि चुनावी फायदे के लिए समाज में विभाजन गहरा हो।
बयान के बाद मुस्लिम समाज के भीतर भी मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखी गई हैं। कुछ धार्मिक संगठनों ने मदनी का समर्थन करते हुए कहा कि यह इस्लामी सिद्धांतों का स्पष्ट मामला है, वहीं दूसरी ओर कई युवा मुस्लिम आवाजों ने यह तर्क दिया कि राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और देश के प्रति सम्मान व्यक्त करना किसी मज़हबी सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है, और आधुनिक भारत में संतुलित व्याख्या आवश्यक है।
कुल मिलाकर, मौलाना अरशद मदनी का यह बयान वंदे मातरम् पर वर्षों से चले आ रहे विवाद को फिर से केंद्र में ले आया है। यह बहस अब सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और राष्ट्रवाद की परिभाषा से भी जुड़ चुकी है—जहाँ हर पक्ष अपने-अपने दृष्टिकोण से राष्ट्रप्रेम की नई व्याख्या करने की कोशिश कर रहा है।




