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लोकसभा में भूचाल—SC छात्रा रेप-ब्लैकमेल केस पर सरकार घिरी, “बेटी बचाओ” पर सवाल

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महेंद्र सिंह । नई दिल्ली 8 दिसंबर 2025

लोकसभा में विस्फोटक खुलासा—SC छात्रा को दो प्रोफेसरों ने बनाया शिकार, वीडियो से ब्लैकमेल किया, पर विश्वविद्यालय और सरकार दोनों ने मुंह मोड़ा
लोकसभा के पटल पर आज जो सच सामने आया, वह किसी एक आपराधिक घटना का केवल विवरण नहीं था, बल्कि यह भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों के भीतर मौजूद भयावह संस्थागत सड़ांध का काला, बदबूदार आईना था। डॉ. कडियम काव्या का बयान देश को यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जिस “ज्ञान के मंदिर” को हम पूजते हैं, वहाँ भी बेटियाँ—विशेषकर वे बेटियाँ जो सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर हैं—किस तरह से क्रूरता की शिकार बन रही हैं। उन्होंने सदन में राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की एक दलित (SC) छात्रा के साथ हुए जघन्य अन्याय का खुलासा किया, जहाँ पहले एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने उसकी मजबूरी और भेद्यता का फायदा उठाकर उसका यौन शोषण किया।

यह पहली चोट इतनी गहरी थी कि पीड़िता भावनात्मक रूप से पूरी तरह टूट गई। मगर उसकी त्रासद गाथा यहीं समाप्त नहीं हुई; जब वह अपने घावों को भरने की कोशिश कर रही थी, तभी उसी संस्थान के एक दूसरे प्रोफेसर ने उसके निजी पलों के वीडियो फुटेज का इस्तेमाल कर उसे खौफनाक ब्लैकमेलिंग का शिकार बनाया और फिर से यौन उत्पीड़न किया। यह घटना महज़ दो व्यक्तियों द्वारा किया गया अपराध नहीं है—यह उस गहरी जड़ जमा चुकी संस्थागत मानसिकता का घिनौना प्रमाण है, जहाँ दलित छात्राओं की चीख को सुना नहीं जाता, उनकी पीड़ा को या तो जानबूझकर खारिज कर दिया जाता है, या उन्हें डरा-धमकाकर चुप रहने पर मजबूर कर दिया जाता है, जिससे अपराधी सुरक्षित बच निकलें।

संस्थागत दमन: ICC ने दिया धोखा—ओडिशा लौटी पीड़िता, माता-पिता को भी न्याय नहीं, राज्य और केंद्र दोनों मौन; जातिगत हिंसा पर गुस्सा फूटा

जिस समय पीड़िता ने अपने भीतर का सारा साहस और बची-खुची हिम्मत बटोरी और विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति (ICC) में यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई, तो उसे शायद उम्मीद रही होगी कि यह समिति, जो कि कानूनन कमजोरों की रक्षक के रूप में स्थापित की गई है, उसे न्याय दिलाएगी। लेकिन डॉ. काव्या के अनुसार, ICC ने न्याय देने के बजाय एक भयानक संस्थागत खामोशी ओढ़ ली—जिसने सीधे तौर पर आरोपी प्रोफेसरों को खुला संरक्षण दिया।

न कोई कठोर कार्रवाई की गई, न न्यायोचित सुनवाई हुई, और न ही पीड़िता को किसी भी प्रकार का समर्थन या संवेदनशीलता मिली। यह समिति, जो एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय-तंत्र होनी चाहिए थी, उसने आरोपियों के लिए एक अभेद्य ढाल का काम किया। न्याय तो दूर, पीड़िता को वहाँ सुरक्षा और इंसानियत के नाते मिलने वाली संवेदना तक नहीं नसीब हुई। यह बेहद शर्मनाक है कि जिस विश्वविद्यालय को संस्कृत, सभ्यता और उच्च संस्कृति का केंद्र कहा जाता है, वहाँ एक दलित छात्रा को सरेआम अपमान और अन्याय का घूंट पीकर, न्याय की भीख माँगते रहना पड़ा। जब आरोपी प्रोफेसरों और विश्वविद्यालय प्रबंधन की मिलीभगत से पीड़िता का हर हौसला टूट गया, तब वह हताश होकर अपने गृह राज्य ओडिशा लौट गई।

उसके माता-पिता को भी इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी होने के बावजूद, किसी भी स्तर पर—चाहे वह केंद्र सरकार हो, राज्य सरकार हो, विश्वविद्यालय प्रशासन हो, या पुलिस—किसी ने भी उसे सुरक्षा, न्याय या कानूनी सहायता नहीं दी। यह त्रासदी चीख-चीख कर यह साबित करती है कि इस देश में दलित बेटियों को केवल कानून की किताब में ही अधिकार मिलते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में उन्हें सिर्फ उपेक्षा, भय, संस्थागत भ्रष्टाचार और जातिगत हिंसा का सामना करना पड़ता है। डॉ. काव्या ने सदन में जोरदार तरीके से कहा कि “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” की गूंजने वाली राजनीतिक बयानबाज़ी का असली, बदरंग चेहरा यही है—जहाँ देश के शिक्षा संस्थान खुलेआम अपराधियों के अड्डे बन जाते हैं, और पीड़िताओं को संरक्षण देने के बजाय यही संस्थाएँ उनके खिलाफ एक मजबूत, अमानवीय दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं।

विश्वविद्यालयों में नशीले पदार्थों का जाल—काव्या का गंभीर आरोप: “कैंपस ड्रग माफिया की गिरफ्त में, सरकार सो रही है!”

डॉ. काव्या ने इस पूरे मामले को केवल यौन उत्पीड़न तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने देश के कई विश्वविद्यालयों में पसरे एक और भयानक खतरे की ओर इशारा किया—नशीले पदार्थों (ड्रग्स) की तस्करी और उपयोग का जाल। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि ऐसे कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के कैंपस अब “ड्रग माफिया की गिरफ्त” में आ चुके हैं, जो छात्रों के मानसिक, शारीरिक और शैक्षणिक जीवन को अंदर से खोखला कर रहा है। उन्होंने बेहद गंभीर आरोप लगाया कि कई संस्थानों में यह “ड्रग नेटवर्क” प्रशासन की अनदेखी, और कई बार तो प्रत्यक्ष संरक्षण के कारण पनप रहा है, जिसे दबाने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं की जाती। उनका यह आरोप सीधे तौर पर देश की कानून-व्यवस्था और कैंपस प्रशासन की निष्क्रियता पर एक प्रचंड हमला है।

उन्होंने सरकार से सीधा और तीखा सवाल पूछा: “आखिर कितनी और छात्राओं को इस भयानक शोषण, ड्रग्स और अपराध के बीच पिसते हुए देखना पड़ेगा? कब तक यह सरकार अपनी आँखें बंद करके सोती रहेगी? क्या हमारे शिक्षा संस्थान अब ज्ञान के केंद्र न रहकर, अपराधियों और ड्रग डीलरों के सुरक्षित ठिकाने बन चुके हैं?” काव्या का यह बयान स्पष्ट रूप से यह साबित करता है कि जब शिक्षा के पवित्र परिसरों में ड्रग्स, जातिगत हिंसा और यौन अपराध मिलकर छात्रों के भविष्य को बर्बाद कर रहे हों, तब शासन की निष्क्रियता और उदासीनता ही सबसे बड़ा, अक्षम्य अपराध बन जाती है।

SC छात्राओं की सुरक्षा पर राष्ट्रीय बहस—लोकसभा में उठे 4 तीखे सवाल और निष्कर्ष

डॉ. काव्या ने अपनी दहाड़ के साथ सरकार को सीधी चुनौती दी, और चार अत्यंत तीखे तथा कार्रवाई-योग्य सवाल पूछे, जिनका उत्तर पूरा देश मांग रहा है: 1. क्या सरकार उच्च शिक्षण संस्थानों में यौन उत्पीड़न को जड़ से ख़त्म करने के लिए कोई नई, कठोर और समयबद्ध राष्ट्रीय नीति लाएगी? 2. क्या ICC (Internal Complaints Committee) को राजनीतिक और प्रशासनिक दखल से पूरी तरह मुक्त और सशक्त, जवाबदेह इकाई बनाया जाएगा? 3. क्या विशेष रूप से दलित (SC) छात्राओं के मामलों की सुरक्षा और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए कोई विशेष निगरानी तंत्र या फास्ट-ट्रैक सिस्टम बनाया जाएगा? 4. कैंपस में फैले ड्रग्स और सभी प्रकार की अवैध गतिविधियों को स्थायी रूप से नष्ट करने के लिए सरकार का क्या ठोस एक्शन प्लान है? उन्होंने जोर देकर कहा कि यह केवल एक लड़की की लड़ाई नहीं, बल्कि यह पूरे देश की, समाज के हाशिए पर मौजूद सभी बेटियों के सम्मान और सुरक्षा का सवाल है।

उनका निष्कर्ष इतना ही कठोर था कि जब तक विश्वविद्यालयों में अपराध, जातिगत उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और ड्रग्स का खतरा बना रहेगा, तब तक “नारी सुरक्षा” और “नारी सशक्तिकरण” का दावा केवल कोरे चुनावी भाषणों में ही अच्छा लगेगा, और धरातल पर उसकी कोई कीमत नहीं होगी। यह पूरा मामला भारत के नैतिक पतन का एक क्रूर आईना है—जहाँ सत्ता के चमकदार नारे गूँजते रहते हैं, लेकिन जमीन पर बेटियाँ यौन उत्पीड़न, जातिगत हिंसा, ब्लैकमेल और सबसे बढ़कर संस्थागत उदासीनता की शिकार बनती रहती हैं।

जब विश्वविद्यालय जैसे पवित्र शिक्षा केंद्र भी असुरक्षा के अड्डे बन जाएँ, तब देश को कठोरता से पूछना ही पड़ेगा—”बेटी बचाओ” सिर्फ एक नारा है या राष्ट्र की सच्ची जिम्मेदारी? और अगर दलित बेटियाँ भी सुरक्षित नहीं हैं, तो क्या भारत सचमुच आगे बढ़ रहा है? लोकसभा में डॉ. कडियम काव्या की यह दहाड़ दबी नहीं है—अब देश यह देखने के लिए बेचैन है कि सरकार कार्रवाई करेगी, या इस पीड़िता की तरह इस ज्वलंत और संवेदनशील मुद्दे को भी अंधेरे की गर्त में छोड़ दिया जाएगा।

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