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272 पूर्व अफसरों का पत्र: लोकतंत्र की आड़ में BJP की दलाली—जनता का सवाल, ये रक्षक हैं या सत्ता के किराए के पैदल सैनिक?

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नई दिल्ली 19 नवंबर 2025

देश में राजनीति उस समय विस्फोट की तरह फट पड़ी जब 272 स्वयंभू “इमिनेंट नागरिक”—जिनमें 16 पूर्व जज, 123 अफसरशाह और 133 सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी शामिल हैं—ने एक ऐसा पत्र जारी किया जो लोकतंत्र की रक्षा नहीं, बल्कि सत्ता के चरण-चुंबन का सबसे अश्लील उदाहरण बनकर सामने आया। यह पत्र राहुल गांधी और कांग्रेस पर हमला करता है, पर उसका असली मक़सद चुनाव आयोग पर लग रहे आरोपों की आंच को BJP से दूर रखना है। नाम भले 272 हों, लेकिन देश की जनता ने साफ़ देख लिया—यह पत्र देश की आत्मा नहीं, बल्कि सत्ता की डोर से बंधे चेले-चापलूसों का सामूहिक बयान है।

यह वही जमात है जिसने अपने करियर में सत्ता के सामने सिर झुकाकर, समझौते करके और पदों के लिए कतारें लगाकर काम किया। असली सवाल यह है—जब देश में वोटर लिस्ट से 70 लाख नाम गायब हो रहे हैं, जब एक ही व्यक्ति के 6 EPIC नंबर मिल रहे हैं, जब हरियाणा में 25 लाख संदिग्ध वोट जुड़ रहे हैं, जब सुप्रीम कोर्ट को मजबूर होकर searchable वोटर लिस्ट का आदेश देना पड़ रहा है—तब यह 272 की जमात किस बात की रक्षा कर रही है? लोकतंत्र की? या BJP के पोषित भ्रष्ट तंत्र की?

सोशल मीडिया, राजनीतिक विश्लेषक और जनता ने इस पत्र के बाद आग उगलना शुरू कर दिया। लोगों ने कहा—“ये 272 लोग इमिनेंट नहीं, इम्यून हैं—जवाबदेही से, नैतिकता से, शर्म से।” यह पत्र असल में उस डर का दस्तावेज़ है जो सत्ता ने इन पर वर्षों में बोया—पद, पैसे और सुविधाओं का डर, कि कहीं अगली सरकार में इनकी फाइलें खुल न जाएं। कई लोग साफ़ कह रहे हैं कि ये अधिकारी लोकतंत्र की चिंता नहीं, बल्कि अपनी अवैध संपत्तियों, अपने बच्चों की पोस्टिंग और अपने भविष्य की मलाई बचाने को उतरे हैं।

सबसे तीखी आलोचना तब उभरी जब सूची के नंबर 27—लक्ष्मी पुरी, पूर्व IFS अधिकारी—का नाम सामने आया। आलोचकों ने पूछा—क्या यह संयोग है कि वह केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की पत्नी हैं? और क्या यह भी संयोग है कि हाल ही में हरदीप पुरी का नाम अंतरराष्ट्रीय Epstein Files में आया? सोशल मीडिया ने इस पर कटाक्ष किया कि यह पत्र लोकतंत्र की रक्षा नहीं, बल्कि वैश्विक भ्रष्ट नेटवर्क के बचाव में लिखा गया “संयुक्त परिवार का घोषणा पत्र” लगता है।

पत्र का पहला नाम भी विवादों से भरा—जस्टिस आदर्श कुमार गोयल। सवाल उठे कि सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के कुछ ही घंटों में उन्हें NGT की चेयरमैनशिप कैसे मिल गई? और चमत्कार देखिए—कुछ देर बाद उनके बेटे को भाजपा सरकार ने हरियाणा में एडिशनल एडवोकेट जनरल बना दिया। जनता ने पूछा—क्या यह “योग्यता” का पुरस्कार था या “वफादारी” का? और क्या यह पत्र उसी वफादारी की रसीद है?

यह 272 का गैंग बड़ी शालीनता से कहता है कि राहुल गांधी संस्थाओं पर हमला कर रहे हैं, लेकिन कोई यह नहीं बताता कि चुनाव आयोग सवालों का जवाब क्यों नहीं देता। क्यों नहीं EC प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डेटा जारी करता? क्यों नहीं वह बताता कि:

  1. EC चयन प्रक्रिया क्यों बदली गई?
  2. आयोग के अधिकारियों को FIR से बचाने वाला नियम क्यों लाया गया?
  3. चुनाव से ठीक पहले क्यों केवल चुनिंदा राज्यों में SIR लागू की गई?
  4. 70 लाख वोट क्यों डिलीट हुए?
  5. लाखों नए वोटर कैसे जोड़े, कौन हैं, उनका अता पता क्या है?
  6. हरियाणा से ट्रेन भर के कैसे बीजेपी के खर्चे से लोग बीजेपी के लिए वोट देने आ रहे थे? 
  7. बीजेपी के अनेकों कार्यकर्ता अलग अलग राज्यों में वोट डालने के बाद फिर दूसरे राज्य बिहार में कैसे वोट डाल गए?
  8. एक आदमी के 6 एपिक नंबर कैसे मौजूद हैं? 
  9. हरियाणा में 25 लाख संदिग्ध वोट कैसे जुड़ गए?

यह सवाल वही पूछता है जो लोकतांत्रिक है। और यह सवाल वही दबाता है जो सत्ता का गुलाम है।

272 में से एक भी व्यक्ति ने इन मुद्दों पर एक शब्द नहीं बोला—क्योंकि यह लड़ाई “संविधान बनाम विपक्ष” की नहीं, बल्कि “सत्ता द्वारा संरक्षित विशेषाधिकार बनाम जनता के अधिकार” की है। सच यह है कि इन 272 लोगों का संघर्ष किसी संस्था के लिए नहीं है।

उनका संघर्ष उनके पदों, लाभों, पोस्ट-रिटायरमेंट खुशियों और सत्ता से मिले संरक्षण को बचाने का है। वह अपने मालिक का एहसान उतार रहे हैं—देश की कीमत पर।

लोकतंत्र 272 से नहीं चलता।

लोकतंत्र इस देश की जनता से चलता है।

और जनता अपनी आंखों से देख रही है कि कौन सवाल पूछ रहा है, और कौन अपने दाता की दलाली में लगा है।

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