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भाजपा शासन में कानून व्यवस्था, नक्सल नियंत्रण और सुरक्षा — भय से विश्वास की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़

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13 जुलाई 2025

 

कभी यह कहा जाता था कि छत्तीसगढ़ का नक्शा दो रंगों में बंटा है — एक हिस्सा लोकतंत्र का और दूसरा नक्सलवाद का। बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, नारायणपुर जैसे ज़िले वर्षों तक नक्सल हिंसा, दहशत और खून के कारोबार से जूझते रहे। आदिवासी जनता, पुलिस और विकास कार्य — तीनों ही बंदूक के निशाने पर रहते थे। लेकिन भाजपा शासन ने इस भय के चक्रव्यूह को तोड़ा। कड़ा सुरक्षा संकल्प, संवेदनशील प्रशासन और सतत विकास की त्रिसूत्री रणनीति से छत्तीसगढ़ को भय से भरोसे की ओर ले जाया गया।

नक्सल पर निर्णायक प्रहार: सिर्फ़ गोलियां नहीं, नीति से युद्ध

भाजपा सरकार ने नक्सलवाद को केवल सुरक्षा की समस्या नहीं माना, बल्कि विकास और विश्वास की चुनौती के रूप में स्वीकार किया। यही कारण है कि पहले की सरकारों की केवल ‘बंदूक से जवाब’ वाली नीति को बदलकर ‘बंदूक + संवाद + विकास’ की रणनीति बनाई गई। स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG), DRG (District Reserve Guards), और कोबरा कमांडो यूनिट को न केवल अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया गया, बल्कि स्थानीय युवाओं को भर्ती कर उनके माध्यम से नक्सलियों पर जमीनी जानकारी और जवाबी कार्रवाई को बढ़ाया गया। अब नक्सलियों के गढ़ कहे जाने वाले इलाके भी सुरक्षित पुलिस कैंप, नई सड़कों और सरकारी दफ्तरों से रोशन हो रहे हैं।

पुलिसिंग में जनता की भागीदारी: सुरक्षा अब डर नहीं, संवाद है

भाजपा शासन ने छत्तीसगढ़ में जन मित्र पुलिसिंग को बढ़ावा दिया। आदिवासी क्षेत्रों में पुलिस अब शक्ति का नहीं, सेवा का चेहरा बनी है। “आदिवासी युवा भर्ती अभियान”, “लोक संवाद शिविर”, “बस्तर में तिरंगा”, “सुरक्षा सभा” जैसे अभियानों ने जनता और पुलिस के बीच की खाई को पाटा है। जहां पहले बच्चे पुलिस वर्दी से डरते थे, अब वे थानों में कंप्यूटर सीखते हैं, खेलते हैं और स्वास्थ्य सेवाएं पाते हैं। यह बदलाव केवल सुरक्षा का नहीं, मानवता और शासन के पुनर्निर्माण का संकेत है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर से आई सुरक्षा: जहां सड़क पहुंची, वहां बंदूक हारी

नक्सलवाद को मात देने में सबसे बड़ी जीत है — बस्तर तक सड़कों की पहुंच। भाजपा शासन ने यह सिद्ध किया कि जहां विकास की सड़क जाती है, वहां नक्सल का रास्ता खत्म होता है। अब सुकमा, बीजापुर, कोंटा, और कोंडागांव जैसे अति संवेदनशील क्षेत्रों में भी डामर सड़कें, पुल-पुलियां, मोबाइल टावर, बिजली के खंभे और सरकारी भवन खड़े हो रहे हैं। बस्तर फाइटर्स जैसे स्थानीय बल, गांवों में CCTV नेटवर्क, और हेलीकॉप्टर आधारित आपात रेस्क्यू सिस्टम से जनता की सुरक्षा की भावना और विश्वास दिन-ब-दिन मज़बूत हो रही है।

पूर्व नक्सलियों का पुनर्वास: हथियार छोड़ा, अब हाथ में किताबें और कारीगरी

भाजपा सरकार ने हथियार उठाए लोगों को भी मुख्यधारा में लाने का सुनियोजित प्रयास किया। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए पुनर्वास नीति, स्वरोज़गार ऋण, स्किल ट्रेनिंग, और सुरक्षा की गारंटी दी गई। हज़ारों युवक जो कभी बंदूक के भरोसे जंगलों में घूमते थे, आज दुकान चला रहे हैं, खेती कर रहे हैं, शिक्षक बने हैं और समाजसेवी की भूमिका निभा रहे हैं। यह सिर्फ़ पुनर्वास नहीं, नवजीवन का निर्माण है।

अपराध नियंत्रण और तेज़ न्याय: कानून अब तेज़, न्याय अब सुलभ

छत्तीसगढ़ में भाजपा शासन ने सिर्फ़ नक्सलवाद ही नहीं, सामान्य अपराधों पर भी तेज़ नियंत्रण स्थापित किया। ई-एफआईआर, महिला हेल्पलाइन, साइबर सेल विस्तार, पोस्को स्पेशल कोर्ट, और थानों में सीसीटीवी निगरानी जैसी व्यवस्थाओं ने कानून की पकड़ और न्याय की गति को तेज किया है। नारी शक्ति योजना, सखी वन स्टॉप सेंटर, और महिला शिकायत निवारण पोर्टल जैसे प्रयासों ने महिलाओं को सुरक्षित और स्वावलंबी बनाया है।

छत्तीसगढ़, जो कभी खौफ, हिंसा और अस्थिरता का पर्याय माना जाता था, आज भाजपा शासन में संवेदनशील शासन, कड़े सुरक्षा उपाय और सतत विकास के बल पर शांति, विश्वास और आत्मबल की ओर बढ़ रहा है। भाजपा ने यह साबित किया कि बंदूक से तख्त नहीं हिलते, लेकिन जनता का विश्वास मिले तो जंगल में लोकतंत्र की बस्तियां बस सकती हैं।

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