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खड़गे के आरोप से संसद सन्न—राज्यसभा में रिकॉर्ड हटाने पर हड़कंप, पूर्व उपराष्ट्रपति की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल

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महेंद्र सिंह। नई दिल्ली | 1 दिसंबर 2025

राज्यसभा का वातावरण उस समय पूरी तरह सन्न रह गया जब विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कार्यवाही के बीच ऐसा आरोप लगाया जिसने पूरे सदन को हिला कर रख दिया। खड़गे ने सभापति सीपी राधाकृष्णन को संबोधित करते हुए स्पष्ट कहा कि “आपके पहले जो सभापति थे, वे निष्पक्ष नहीं थे”—और इसी के साथ उन्होंने यह गंभीर दावा किया कि उनके भाषण के कई हिस्से “माला-फिद” इरादे से रिकॉर्ड से हटाए गए। उनके इतना कहते ही सत्ता पक्ष के सांसदों ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया और सदन में हंगामा मच गया। खड़गे का आरोप न सिर्फ़ उनकी बात काटे जाने पर था, बल्कि इस बात पर भी था कि बिना किसी नियम आधारित औचित्य के विपक्ष की आवाज़ को बार-बार कमजोर किया गया—और यह सीधे पूर्व उपराष्ट्रपति व सभापति रहे जगदीप धनखड़ की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है, क्योंकि कार्यवाही से किसी भी अंश को हटाने का अधिकार उन्हीं के पास था।

खड़गे ने कहा—“मैंने जो बातें बोली थीं, उन्हें रिकॉर्ड से माला-फाइड तरीके से हटाया गया। आखिर यह सब क्यों किया गया? किसके दबाव में किया गया?” उनके इस बयान ने न केवल सदन में मौजूद सांसदों को चौंका दिया, बल्कि सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया को भी और तीखा बना दिया। खड़गे ने कहा कि उन्हें न सिर्फ़ बोलने में बार-बार रोका गया, बल्कि उनके भाषण के उन हिस्सों को हटाया गया जिनमें सरकार और संस्थागत पदों की जवाबदेही पर सवाल उठाए गए थे। खड़गे ने कहा कि यह केवल राजनीतिक सेंसरशिप नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन है—क्योंकि सांसद को अपनी बात पूरी स्वतंत्रता के साथ रखने का अधिकार है।

खड़गे ने आगे यह भी आरोप लगाया कि विपक्ष के साथ यह कोई एक दिन या एक घटना की समस्या नहीं है। उन्होंने कहा कि कई मौकों पर विपक्षी नेताओं के भाषणों के महत्वपूर्ण अंश हटाए गए हैं, जबकि सत्ता पक्ष के सदस्यों के कई बयान और विवादित टिप्पणियाँ रिकॉर्ड में जस-की-तस रहने दी जाती हैं। उन्होंने कहा कि यह सिलसिला लगातार चल रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि राज्यसभा की कार्यवाही में निष्पक्षता का संतुलन बिगड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि संसदीय इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं जहां विपक्ष के महत्वपूर्ण वाक्यों को इतने व्यवस्थित तरीके से हटाया गया हो। खड़गे के अनुसार—“जब सरकार पर सवाल उठाए जाते हैं, तभी रिकॉर्ड से निकालकर चुप करा दिया जाता है।”

इस विवाद का केंद्र बिंदु यह है कि खड़गे का आरोप सीधे पूर्व सभापति धनखड़ की भूमिका को चुनौती देता है। धनखड़ अपनी सख्ती के लिए जाने जाते रहे हैं और सदन का संचालन करते समय कई बार उन्होंने विपक्षी नेताओं को नियमों के नाम पर टोका है। लेकिन इस बार मामला अलग था—क्योंकि खड़गे ने कहा कि जो अंश हटाए गए, उनके लिए कोई नियम नहीं बताया गया। विपक्ष का आरोप है कि यह प्रक्रिया नियम-आधारित नहीं, मनमानी और चुनिंदा तरीके से लागू की जा रही है। खड़गे के आरोप का संकेत साफ था कि विपक्ष मानता है कि धनखड़ की अध्यक्षता में राज्यसभा में विपक्ष की आवाज़ को समान अवसर नहीं मिल रहा।

जैसे ही खड़गे ने यह बयान दिया, सत्ता पक्ष के सदस्य सीटों से खड़े हो गए। सत्ता पक्ष ने खड़गे के बयान को “अशोभनीय”, “अस्वीकार्य” और “सभापति के पद का अनादर” बताया। वहीं, विपक्षी सांसद खड़गे के आसपास एकजुट हो गए और कहा कि खड़गे ने जो आरोप लगाए हैं वे पूरी तरह तथ्यात्मक अनुभव के आधार पर हैं। हंगामा इतना बढ़ गया कि सदन की कार्यवाही बाधित हो गई और कुछ समय के लिए स्थगित करनी पड़ी। यह स्पष्ट दर्शाता है कि विवाद महज़ बयान तक सीमित नहीं रहा, सत्ता और विपक्ष के बीच गहरे अविश्वास का परिणाम बन गया।

यह घटना राज्यसभा की कार्यवाही में निष्पक्षता पर सबसे बड़ा सवाल उठाती है। विपक्ष का तर्क है कि यदि सांसद की कही हुई बातों को बिना वैध स्पष्टीकरण हटाया जाएगा, तो यह लोकतांत्रिक विमर्श को सीमित करने का तरीका बन जाएगा। खड़गे का कहना है कि संसद का उद्देश्य सरकार को जवाबदेह बनाना है, न कि सवालों से बचाने के लिए प्रक्रियाओं का दुरुपयोग करना। खड़गे ने यह भी कहा कि यह संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि संसदीय व्यवस्था की पारदर्शिता और लोकतंत्र की रक्षा का प्रश्न है—और विपक्ष इस मुद्दे पर पीछे नहीं हटेगा।

खड़गे का बयान और उसके बाद सदन का माहौल यह दिखाता है कि संसद के अंदर राजनीतिक तनाव अपने चरम पर है। मुद्दा केवल एक अंश हटाने का नहीं, यह सिद्धांत का सवाल है कि क्या संसद में विपक्ष उतनी ही स्वतंत्रता से बोल सकता है जितनी लोकतंत्र उसे आजादी देता है। इस विवाद ने राज्यसभा को नए राजनीतिक तूफ़ान में धकेल दिया है, और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और बड़ा रूप ले सकता है—क्योंकि यह केवल संसद की प्रक्रिया का नहीं, लोकतंत्र की सेहत का प्रश्न है।

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