अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/इस्लामाबाद/तेहरान | 12 अप्रैल 2026
इस्लामाबाद में अमेरिका और Iran के बीच हुई बहुप्रतीक्षित बातचीत जिस उम्मीद के साथ शुरू हुई थी, वह अंत तक पहुंचते-पहुंचते पूरी तरह निराशा में बदल गई। लगभग एक दिन तक चली लंबी और गहन चर्चा के बाद भी दोनों देशों के बीच कोई ठोस समझौता नहीं हो सका, और इसी के तुरंत बाद ईरान की संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने बेहद सख्त लहजे में अमेरिका पर निशाना साधा। ग़ालिबाफ ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ईरानी पक्ष का “भरोसा जीतने में असफल” रहा, और यही इस पूरी वार्ता की सबसे बड़ी विफलता बनकर सामने आई। उनका यह बयान केवल एक कूटनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस गहरे अविश्वास का प्रतीक है जो वर्षों से दोनों देशों के रिश्तों में जड़ें जमा चुका है।
इस पूरी बातचीत को लेकर शुरू से ही उम्मीद जताई जा रही थी कि यह दोनों देशों के बीच जमी बर्फ को कुछ हद तक पिघला सकती है, क्योंकि यह 1979 के बाद सबसे महत्वपूर्ण और सीधे संवादों में से एक मानी जा रही थी। लेकिन जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ी, यह साफ होता गया कि मतभेद सिर्फ सतही नहीं, बल्कि बेहद गहरे और जटिल हैं। ईरान ने बातचीत में अपनी शर्तों और सुरक्षा चिंताओं को मजबूती से रखा, वहीं अमेरिका अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं से पीछे हटने के मूड में नहीं दिखा। नतीजा यह हुआ कि वार्ता का कोई साझा रास्ता निकलने के बजाय दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्थितियों पर और ज्यादा अडिग हो गए।
सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सामने आया, जो लंबे समय से अमेरिका और पश्चिमी देशों की चिंता का केंद्र रहा है। अमेरिका चाहता है कि ईरान इस दिशा में अपनी गतिविधियों पर स्पष्ट और सख्त प्रतिबद्धता दे, जबकि ईरान इसे अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय अधिकार का हिस्सा मानता है। यही टकराव बातचीत में बार-बार उभरता रहा और अंततः किसी भी सहमति की संभावना को खत्म कर गया। इसके अलावा आर्थिक प्रतिबंधों में ढील, क्षेत्रीय प्रभाव, और खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण जैसे मुद्दे भी ऐसे थे, जिन पर दोनों पक्षों के बीच खाई और चौड़ी होती गई।
ग़ालिबाफ के बयान में एक और महत्वपूर्ण संकेत छिपा था—उन्होंने कहा कि अब यह अमेरिका पर निर्भर करता है कि वह विश्वास बहाल करने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है। इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि ईरान अब केवल शब्दों या आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होने वाला, बल्कि उसे व्यवहारिक और भरोसेमंद कदम चाहिए। पिछले अनुभवों—चाहे वह युद्ध हो या समझौतों का टूटना—ने ईरान को बेहद सतर्क बना दिया है, और यही वजह है कि अब वह किसी भी समझौते से पहले ठोस गारंटी चाहता है।
इस वार्ता के असफल होने का असर केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता पर पड़ सकता है। पहले से ही एक नाजुक युद्धविराम की स्थिति बनी हुई है, और ऐसे में बातचीत का टूटना किसी भी समय नए टकराव की जमीन तैयार कर सकता है। इज़रायल पहले ही अपनी सेना को अलर्ट पर रख चुका है, और क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियां इस बात का संकेत हैं कि हालात कभी भी बदल सकते हैं।
इस्लामाबाद की यह वार्ता एक बार फिर यह साबित करती है कि अमेरिका और ईरान के बीच असली समस्या केवल राजनीतिक या सैन्य नहीं, भरोसे की है। जब तक यह भरोसा बहाल नहीं होता, तब तक हर बातचीत अधूरी और हर समझौता अस्थायी ही रहेगा। दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या दोनों देश इस गहरी खाई को पाटने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाते हैं या फिर यह तनाव एक बार फिर बड़े संघर्ष का रूप ले लेता है।




