मुंबई, महाराष्ट्र । 30 जुलाई 2025
राजनीति में महिलाओं के मुद्दों का उठाया जाना ज़रूरी है—लेकिन जब इन मुद्दों को संवेदना नहीं, बल्कि सत्ता की रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगे, तब यह लोकतंत्र के लिए एक खतरे की घंटी है। महाराष्ट्र महिला आयोग की प्रमुख रुपाली चाकणकर का यह आरोप कि एनसीपी (एसपी) की नेता रोहिणी खडसे ने घरेलू हिंसा की पीड़िताओं का राजनीतिक उपयोग किया, हमारे सामने कुछ बेहद गंभीर सवाल खड़े करता है: क्या महिला अधिकारों के नाम पर संवेदनशील मामलों का मंचन सही है? क्या संवैधानिक संस्थानों की मर्यादा को दरकिनार करके पीड़िता को कैमरों के सामने लाना न्याय है या अनैतिकता?
घटना को समझना ज़रूरी है। एक महिला, जो घरेलू हिंसा की पीड़िता है, उसका मामला अदालत में लंबित है। ऐसे में रोहिणी खडसे द्वारा उसे प्रेस कॉन्फ्रेंस में सार्वजनिक रूप से लाकर उसका बयान दिलवाना न केवल उसकी निजता का उल्लंघन है, बल्कि यह उसकी मानसिक स्थिति और न्यायिक प्रक्रिया पर सीधा प्रभाव डाल सकता है। महिला आयोग की अध्यक्ष ने सही ही कहा कि ऐसा व्यवहार संवैधानिक गरिमा के विरुद्ध है। न्याय की प्रक्रिया कोर्ट में चलती है, मीडिया में नहीं। और जब कोई नेता संवेदनशील मामलों को मंच पर लाकर उसका राजनीतिक उपयोग करता है, तो वह पीड़िता को और भी असुरक्षित बना देता है।
इस पूरे प्रकरण की गंभीरता इसीलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि रोहिणी खडसे स्वयं घरेलू उत्पीड़न और मादक पदार्थों से जुड़े मामले में अपने पति की गिरफ्तारी को लेकर निशाने पर हैं। जब आरोप प्रत्यारोप की राजनीति शुरू होती है, तो असली पीड़िता कहीं खो जाती है। यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन सच बोल रहा है और किसका मकसद केवल “राजनीतिक सहानुभूति” हासिल करना है।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि महिला पीड़ा कोई ‘राजनीतिक स्क्रिप्ट’ नहीं है, जिसे जब चाहें मंच पर उतारा जा सके। ऐसे मामलों में गोपनीयता, गरिमा और संवेदनशीलता सर्वोपरि होनी चाहिए। अगर नेताओं को लगता है कि वे पीड़िताओं की मदद कर रहे हैं, तो वे उन्हें न्याय दिलाने के लिए कानूनी सहायता, परामर्श और संरक्षण मुहैया कराएं—not माइक्रोफोन और प्रेस की चकाचौंध।
इस घटना के बाद महिला संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों। राज्य महिला आयोग की स्वायत्तता और नैतिक दृष्टिकोण को बरकरार रखना बेहद ज़रूरी है। यह आयोग किसी भी पार्टी या विचारधारा के अधीन नहीं हो सकता। जब आयोग की प्रमुख रुपाली चाकणकर इस तरह की नैतिक बात उठाती हैं, तो यह महज़ किसी एक नेता की आलोचना नहीं है—यह एक चेतावनी है कि महिला सुरक्षा के मुद्दों का राजनीतिककरण बंद होना चाहिए।
महिलाओं के मुद्दों का मंचन केवल तब तक सही है जब वह उनके अधिकारों की रक्षा और न्याय की मांग के लिए हो—ना कि सत्ता विरोधी एजेंडे, सहानुभूति अर्जन या खुद को पीड़िता दिखाने के लिए। यह घटना हमें एक बार फिर याद दिलाती है कि समाज को, संस्थाओं को और खासकर राजनीति को महिलाओं की पीड़ा का सम्मान करना सीखना होगा—उसे भुनाना नहीं।




