अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो 26 अक्टूबर 2025
ट्रंप की वापसी से यूरोप में गहराता असंतोष और भय
डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक पुनर्स्थापना ने यूरोप में गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। एक बार फिर “अमेरिका फ़र्स्ट (America First)” के नारे के साथ ट्रंप का नेतृत्व यूरोपीय देशों को यह एहसास करा रहा है कि वॉशिंगटन की प्राथमिकताओं में अब उनके लिए बहुत कम जगह बची है। अमेरिकी विदेश नीति का झुकाव इस समय अपने व्यापारिक और सुरक्षा हितों की ओर है, और यूरोप के पारंपरिक सहयोगियों को ट्रंप की नई रणनीति में “सहयोगी” से ज़्यादा “पर्यवेक्षक” की भूमिका दी जा रही है। यूरोपीय देशों में यह डर गहराता जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन वैश्विक मंचों पर अमेरिका की एकतरफा भूमिका को फिर से मजबूत करेगा — जहाँ यूरोप को अब महज़ एक “साइडलाइन प्लेयर” की तरह देखा जाएगा। यूरोपीय नेता इस स्थिति से निपटने के लिए अपने-अपने स्तर पर रणनीतिक विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस साझा नीति सामने नहीं आई है।
नाटो पर दबाव और यूरोपीय सुरक्षा की नई परीक्षा
ट्रंप का रवैया नाटो (NATO) के प्रति पहले से ही कठोर रहा है। वे बार-बार यह कहते रहे हैं कि अमेरिका यूरोप की सुरक्षा के लिए “अनावश्यक बोझ” उठा रहा है और यूरोपीय देशों को अपनी रक्षा पर अधिक खर्च करना चाहिए। इस बयानबाज़ी ने अटलांटिक गठबंधन की नींव को हिला दिया है। यूरोपीय देशों, खासकर जर्मनी, फ्रांस और पोलैंड में, इस बात की चिंता बढ़ रही है कि अगर अमेरिका नाटो के सामरिक समर्थन से पीछे हट गया, तो महाद्वीप की सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है। इसी कारण यूरोपीय संघ अब “रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy)” की नीति पर विचार कर रहा है, जिसके तहत यूरोप अपनी रक्षा नीति, सैन्य तैयारी और आपसी समन्वय को अमेरिकी निर्भरता से अलग दिशा में विकसित करना चाहता है।
यूरोप की राजनीतिक और सैन्य संस्थाओं में यह चर्चा तेज है कि अब समय आ गया है जब उन्हें अपनी रक्षा और विदेश नीति के लिए वॉशिंगटन की मंजूरी का इंतज़ार नहीं करना चाहिए।
व्यापारिक हितों की टकराहट – ट्रंप का टैरिफ़ हथियार
ट्रंप की “अमेरिका-प्रथम” नीति केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी यूरोप को चुनौती दे रही है। उन्होंने यूरोपीय इस्पात, एल्युमिनियम और ऑटोमोबाइल उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ (शुल्क) लगाने की चेतावनी दी है। इससे यूरोप के औद्योगिक केंद्रों — विशेष रूप से जर्मनी और फ्रांस — में गहरी चिंता पैदा हुई है, क्योंकि अमेरिका यूरोपीय निर्यात का सबसे बड़ा बाज़ार है। ऊर्जा क्षेत्र में भी यूरोप पर दबाव है। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि यूरोपीय देश रूस की गैस के बजाय अमेरिकी एलएनजी (LNG) पर निर्भर रहें, ताकि यूरोप की ऊर्जा सुरक्षा भी अमेरिकी नियंत्रण में आ जाए।
DW के विश्लेषण में यह कहा गया है कि यह नीति यूरोप को “आर्थिक रूप से झुकाने” की रणनीति का हिस्सा है, जिससे अमेरिका अपने उद्योगों और कंपनियों को लाभ पहुंचा सके। इस टकराव के बीच यूरोप को अब यह तय करना होगा कि वह आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह पर चले या फिर अमेरिकी दबाव में झुका रहे।
कूटनीति में घटती भूमिका और ‘नीति ग्रहणकर्ता’ यूरोप
कूटनीतिक स्तर पर भी यूरोप को यह महसूस होने लगा है कि अब वह वॉशिंगटन की प्राथमिकताओं में पीछे खिसक गया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और जर्मन चांसलर ओलाफ शॉल्ज़ ने हाल ही में स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूरोप को “अमेरिकी संरक्षण” की नीति से बाहर निकलकर अपने निर्णय खुद लेने होंगे। ट्रंप प्रशासन का दृष्टिकोण इस बार पहले से अधिक केंद्रित और सीमित है — जिसमें बहुपक्षीय सहयोग की जगह द्विपक्षीय सौदेबाज़ी (Bilateralism) को प्राथमिकता दी जा रही है। इस दृष्टिकोण में यूरोप अब सामूहिक साझेदार नहीं बल्कि अलग-अलग देशों के रूप में देखा जा रहा है, जिन्हें अमेरिका अपने हितों के अनुसार “प्रबंधन” करना चाहता है।
DW की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यूरोपीय नेताओं को अब इस वास्तविकता का सामना करना होगा कि वे अब अमेरिका की “नीति निर्धारण प्रक्रिया” में नहीं, बल्कि “नीति ग्रहण प्रक्रिया” में हैं।
यूरोप की नई रणनीति – आत्मनिर्भरता और सहयोग का संतुलन
ट्रंप की नीतियों के बाद यूरोप अब खुद को अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यूरोपीय संघ ने रक्षा बजट में वृद्धि, टेक्नोलॉजी क्षेत्र में निवेश, और ग्रीन एनर्जी में साझेदारी को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। फ्रांस और जर्मनी जैसे देश अब यह मानते हैं कि यदि यूरोप को वैश्विक शक्ति बने रहना है, तो उसे अमेरिका के “छाते” के नीचे नहीं, बल्कि अपने दम पर खड़ा होना होगा। साथ ही, यूरोप यह भी समझता है कि अमेरिका से पूरी तरह अलग होना उसके आर्थिक और सामरिक हितों के खिलाफ हो सकता है। इसलिए यूरोप अब “सहयोग और स्वतंत्रता के बीच संतुलन” की नीति अपनाने की कोशिश कर रहा है।
ट्रंप की दुनिया में यूरोप की जगह अब परीक्षा पर
ट्रंप की नीतियाँ वैश्विक शक्ति-संतुलन को फिर से परिभाषित कर रही हैं। इस नए परिदृश्य में यूरोप को यह समझना होगा कि वह अगर वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका बनाए रखना चाहता है, तो उसे अपने हितों की रक्षा खुद करनी होगी। हैट्रंप की “अमेरिका फ़र्स्ट” दुनिया में यूरोप के लिए जगह है, लेकिन सीमित — उतनी ही, जितनी वह खुद बना सके। यूरोप को अब यह तय करना है कि वह अमेरिकी नीति के अनुयायी बनेगा या एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेगा।
यह केवल कूटनीति का नहीं, बल्कि पूरे यूरोप के आत्मसम्मान और भविष्य का प्रश्न बन चुका है।
ट्रंप की नीतियों ने यूरोप को एक कठोर परीक्षा के दौर में डाल दिया है। अब यह संघर्ष केवल अमेरिका से संबंधों का नहीं, बल्कि उस “स्वतंत्र यूरोप” की अवधारणा का है, जिसकी कल्पना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की गई थी — और यह निर्णय अब यूरोप को खुद लेना होगा।




