एबीसी नेशनल न्यूज | तेहरान | 11 मार्च 2026
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच दुनिया भर में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि शीर्ष नेतृत्व पर लगातार हमलों और कई महत्वपूर्ण सैन्य कमांडरों के मारे जाने के बावजूद ईरान आखिर किस तरह युद्ध की स्थिति में मजबूती से खड़ा हुआ है। हाल के दिनों में कई अहम रणनीतिक पदों पर बैठे अधिकारियों को निशाना बनाए जाने की खबरों ने यह धारणा बनाई कि ईरान की सैन्य और राजनीतिक कमान कमजोर पड़ सकती है, लेकिन इसके विपरीत देश की युद्ध क्षमता में कोई बड़ा ठहराव नहीं दिखा। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ईरान की वह बहुस्तरीय सत्ता व्यवस्था बताई जा रही है, जिसे इस सोच के साथ तैयार किया गया कि किसी एक व्यक्ति के हट जाने या मारे जाने से पूरी व्यवस्था ठप न पड़े।
ईरान की शासन प्रणाली एक केंद्रीकृत व्यक्ति आधारित मॉडल पर नहीं टिकी है, बल्कि इसे कई संस्थागत स्तंभों में बांटा गया है। राजनीतिक नेतृत्व, धार्मिक नेतृत्व, संसद, न्यायपालिका, पारंपरिक सेना, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड और व्यापक सुरक्षा तंत्र—ये सभी मिलकर देश की शक्ति संरचना बनाते हैं। इन संस्थानों के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा है, लेकिन संकट के समय ये सभी एक साझा रणनीतिक ढांचे के तहत काम करते हैं। यही कारण है कि किसी एक स्तर पर नुकसान होने के बावजूद पूरी प्रणाली काम करती रहती है और युद्ध की कमान कमजोर नहीं पड़ती।
ईरान की रणनीतिक तैयारी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नेतृत्व की निरंतरता सुनिश्चित करना है। वहां कई महत्वपूर्ण पदों के लिए संभावित उत्तराधिकारियों की सूची पहले से तय रहती है। अक्सर एक पद के लिए तीन से चार वैकल्पिक अधिकारी तैयार रखे जाते हैं, जिन्हें पहले से ही उस जिम्मेदारी के लिए प्रशिक्षित किया जाता है और फैसलों की प्रक्रिया से अवगत कराया जाता है। यदि किसी कारण से कोई शीर्ष अधिकारी अचानक पद से हट जाता है या उसकी मौत हो जाती है, तो तुरंत अगला व्यक्ति कमान संभाल लेता है। इस व्यवस्था के कारण नेतृत्व में कोई लंबा खालीपन पैदा नहीं होता और सैन्य तथा प्रशासनिक गतिविधियां बिना रुकावट जारी रहती हैं।
ईरान की सैन्य संरचना भी इसी सिद्धांत पर आधारित है। पारंपरिक सेना के साथ-साथ इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड और उससे जुड़े विभिन्न सुरक्षा व अर्धसैनिक संगठन अलग-अलग स्तरों पर काम करते हैं। इन संगठनों के पास अपने कमांड सिस्टम, संसाधन और संचालन व्यवस्था होती है। युद्ध या संकट के समय ये सभी इकाइयां एक साझा लक्ष्य के साथ समन्वय में काम करती हैं। इससे यदि किसी एक हिस्से को नुकसान पहुंचता भी है तो पूरी सैन्य ताकत पर उसका निर्णायक असर नहीं पड़ता।
रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि ईरान ने पिछले कई दशकों में लगातार बाहरी दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनावों का सामना करते हुए अपनी सत्ता और सुरक्षा प्रणाली को इस तरह विकसित किया है कि वह अचानक पैदा होने वाले संकटों का सामना कर सके। इसी दीर्घकालिक तैयारी का परिणाम है कि शीर्ष नेतृत्व पर हमलों के बावजूद देश की सैन्य और राजनीतिक मशीनरी सक्रिय बनी हुई है।
पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों और सैन्य शक्ति से नहीं लड़े जाते। मजबूत संस्थागत ढांचा, तैयार उत्तराधिकार व्यवस्था और लगातार काम करने वाली नेतृत्व प्रणाली भी किसी देश की युद्ध क्षमता को बनाए रखने में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ईरान की मौजूदा व्यवस्था इसी सोच का उदाहरण मानी जा रही है, जहां एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरी प्रणाली मिलकर युद्ध की कमान संभाले हुए है।




