नई दिल्ली, 19 नवंबर 2025 | रिपोर्ट: ओम प्रकाश
दिल्ली में आयोजित एक भव्य और गरिमामयी समारोह में ‘इंदिरा गांधी प्राइज फॉर पीस, डिसआर्मामेंट एंड डेवलपमेंट 2024’ की घोषणा हुई, जो भारत की महानतम नेताओं में शामिल श्रीमती इंदिरा गांधी के नाम पर स्थापित किया गया था। यह पुरस्कार केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि उस व्यापक सोच, मानवीय संवेदनशीलता और वैश्विक दृष्टि का प्रतीक है जिसके लिए इंदिरा गांधी जानी जाती थीं। उनका सपना था—एक ऐसी दुनिया जहाँ भेदभाव की दीवारें न हों, जहाँ हर देश का आदमी और औरत समान गरिमा के साथ जी सके, और जहाँ शांति, सहयोग और मानवता सर्वोच्च मूल्य हों। आज जब दुनिया अनिश्चितता, संघर्ष और नफ़रत में डूबी है, तब यह पुरस्कार और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है।
वर्तमान वैश्विक स्थिति बेहद चिंताजनक है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार दुनिया इतनी व्यापक अस्थिरता, युद्ध और विस्थापन से जूझ रही है। लाखों लोग अपने ही देशों में सुरक्षित नहीं हैं, युद्ध की आग कई क्षेत्रों में भड़क रही है और शरणार्थियों की संख्या भयावह स्तर पर पहुँच चुकी है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी इस चुनौती का संतुलित और प्रभावी समाधान देने में असफल दिख रही हैं। ऐसे दौर में इंदिरा गांधी का संदेश हमें याद दिलाता है कि असली ताकत न हथियारों में है और न सत्ता के अहंकार में, बल्कि मानवता, न्याय और करुणा के मूल्यों में है।
इसी पृष्ठभूमि में इस वर्ष के पुरस्कार से सम्मानित की गईं चिली की पूर्व राष्ट्रपति और विश्वप्रसिद्ध मानवाधिकार नेता डॉ. मिशेल बैचेलेट। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में उन्होंने दुनिया भर में उत्पीड़ितों की आवाज़ उठाई, मानवाधिकार हनन के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की और वैश्विक अन्याय के खिलाफ लगातार खड़ी रहीं। ऐसे समय में जब दुनिया दिशाहीन प्रतीत होती है, बैचेलेट का चयन एक स्पष्ट संदेश है कि न्याय, समानता और मानवाधिकार की लड़ाई को कोई नहीं रोक सकता।
इंदिरा गांधी प्राइज ज्यूरी के चेयरमैन श्री शिवशंकर मेनन ने बैचेलेट को “सबसे उपयुक्त और प्रभावशाली चयन” बताते हुए कहा कि शायद इतिहास में कोई ऐसा समय नहीं रहा जब इस पुरस्कार की भावना इतनी प्रासंगिक हो। उन्होंने कहा कि मानवता को तोड़ने वाली दीवारें गिराने और सहयोग की भावना को पुनर्जीवित करने के लिए दुनिया को इंदिरा गांधी की सोच की पहले से कहीं अधिक जरूरत है। यह पुरस्कार केवल सम्मान नहीं, बल्कि एक वैश्विक संदेश है कि भारत शांति, निरस्त्रीकरण और विकास की वकालत में अग्रणी भूमिका निभा रहा है
पुरस्कार ग्रहण करते हुए मिशेल बैचेलेट ने भावुक शब्दों में कहा कि भारत लौटना उनके लिए सम्मान और आनंद दोनों है। उन्होंने इंदिरा गांधी को एक दूरदर्शी, सशक्त और प्रेरक नेता बताते हुए कहा कि उनकी विरासत—शांति, न्याय और प्रगति—आज पहले से अधिक जीवंत है। बैचेलेट ने यह भी कहा कि उनके राजनीतिक जीवन की प्रेरणा भी वही रही जिसे इंदिरा गांधी ने अपना मिशन बनाया था: जनकल्याण और मानवाधिकारों की रक्षा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शांति और प्रगति तभी संभव है जब हर इंसान की गरिमा और अधिकार सुरक्षित हों; अगर मानवाधिकारों का सम्मान नहीं होगा तो मानवता कभी भी अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँच सकेगी।
अपने प्रभावशाली संबोधन में उन्होंने दुनिया की सरकारों, संस्थाओं और नागरिकों से अपील की कि वे सीमाओं और विचारों की दीवारें छोड़कर एकजुट हों। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी की स्थायी विरासत को सम्मानित करने का यही सबसे सशक्त तरीका है—एक ऐसी दुनिया बनाना जहाँ शांति, समानता और गरिमा सिर्फ आदर्श नहीं, बल्कि सभी के जीवन की वास्तविकता हो।
मिशेल बैचेलेट का यह भाषण महज़ एक औपचारिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि एक वैश्विक चेतावनी और आह्वान था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मानवाधिकारों और शांति की लड़ाई किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी मानवता का साझा संकल्प है। दिल्ली का यह समारोह दुनिया को यह याद दिलाता है कि शांति की राह कठिन ज़रूर है, लेकिन असंभव नहीं—अगर दुनिया इंदिरा गांधी की विरासत से प्रेरणा लेकर एकजुट होकर आगे बढ़े।





