एबीसी डेस्क 6 दिसबर 2025
भारत की सबसे बड़ी और सबसे भरोसेमंद मानी जाने वाली एयरलाइन इंडिगो का अचानक इस तरह ठप पड़ जाना देश के विमानन इतिहास की सबसे बड़ी चेतावनी बनकर सामने आया है। एक दिन में 250 से अधिक उड़ानों का रद्द होना कोई सामान्य घटना नहीं—यह किसी विशाल सिस्टम के जड़ से हिल जाने का संकेत है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता—हर एयरपोर्ट पर जो दृश्य दिखे, वे बताते हैं कि भारत की एविएशन इंडस्ट्री तेजी से बढ़ी जरूर है, लेकिन उसकी नींव अत्यंत कमजोर है। यात्रियों की लंबी लाइनें, भीड़ का उफान, बच्चों का रोना, बुजुर्गों की थकान, रद्द उड़ानों की चमकती लाल स्क्रीन, और कहीं भी स्पष्ट जवाब देने वाला कोई अधिकारी नहीं—ऐसा लग रहा था जैसे एयरपोर्ट नहीं, बल्कि किसी आपदा-ग्रस्त स्टेशन का दृश्य हो। हजारों लोगों की जिंदगी एक झटके में अव्यवस्था की भेंट चढ़ गई—किसी का इंटरव्यू छूट गया, किसी की चिकित्सा अपॉइंटमेंट, किसी का विदेश कनेक्शन, किसी की पारिवारिक आपात स्थिति—लेकिन एयरलाइन व्यवस्थाएं सिर्फ हाथ खड़ी करती रहीं।
अब सवाल यही है—इंडिगो जैसी व्यवस्थित और लाभ कमाने वाली कंपनी कैसे एक दिन में ढह गई? इसका जवाब छिपा है महीनों से पनप रही उस थकान में, जिसे पायलटों ने बार-बार प्रबंधन को बताने की कोशिश की लेकिन हर बार अनसुना कर दिया गया। FTDL (Flight & Duty Time Limitations) नियम दुनिया की हर एयरलाइन की रीढ़ होते हैं। ये नियम पायलटों की सुरक्षा और यात्रियों की जान की रक्षा के लिए बनाए गए हैं। इनके अनुसार पायलटों के लिए अधिकतम उड़ान घंटे और न्यूनतम आराम अवधि तय होती है। लेकिन इंडिगो में कई महीनों से पायलट लगातार शिकायत कर रहे थे कि उनसे सीमा से अधिक काम लिया जा रहा है, शेड्यूल बिना आराम दिए तैयार किए जा रहे हैं, और महामारी के बाद स्टाफ की कमी की भरपाई बेहद आक्रामक वर्कलोड देकर की जा रही है। अधिकतर पायलट भारी मानसिक तनाव में थे—माइग्रेन, थकावट, चक्कर आना और नींद की समस्या बढ़ती जा रही थी—लेकिन प्रबंधन इन शिकायतों को या तो खारिज करता रहा, या यह कहकर टाल देता था कि “ऑपरेशन ज़रूरी है।”
यही तनाव एक दिन विस्फोट बनकर सामने आया जब बड़ी संख्या में पायलटों ने एक साथ ‘फटीग रिपोर्ट’ देनी शुरू कर दी। FTDL नियमों में यह प्रावधान है कि यदि पायलट थकान के कारण खुद को उड़ान के लिए अयोग्य समझते हैं, तो वे उड़ान भरने से इनकार कर सकते हैं—और इसका सम्मान एयरलाइन को करना पड़ता है, क्योंकि थका हुआ पायलट जानलेवा भी साबित हो सकता है। पायलटों के इस सामूहिक कदम ने पूरा सिस्टम जाम कर दिया। अचानक इंडिगो को एहसास हुआ कि उनके पास पर्याप्त बैकअप पायलट नहीं हैं। उड़ानें लगातार रद्द हो रही थीं, कई घंटों की देरी से उड़ानें चल रही थीं और एयरलाइन कर्मचारियों को यात्रियों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा था। यह पूरा संकट उस संरचनात्मक कमी को उजागर करता है जिसे कंपनी ने सालों से छुपा रखा था—कम स्टाफ में ज्यादा उड़ानें चलाना, और सुरक्षा से ज्यादा ध्यान लागत कम करने पर देना।
महामारी के दौरान इंडिगो ने भारी पैमाने पर छंटनी की थी। लेकिन जब बाजार फिर से खुला और यात्रियों की संख्या तेज़ी से बढ़ी, तब कंपनी ने पर्याप्त क्रू भर्ती नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि मौजूदा स्टाफ को दोगुना काम करना पड़ा। प्रबंधन ने इसे ‘स्मार्ट ऑपरेशन’ कहा, लेकिन असलियत यह थी कि यह मॉडल टिकाऊ नहीं था। पायलट लगातार 7-8 दिन तक उड़ानें भर रहे थे, कई को रात–दिन के शेड्यूल में लगातार बदलती फ्लाइट दे दी जाती, और आराम के घंटे कागज़ पर पूरे दिखा दिए जाते। लेकिन शरीर और दिमाग मशीन नहीं है—जो टूटेगा नहीं। आखिरकार पायलट टूटे और इंडिगो की पूरी व्यवस्था भी।
यह संकट केवल इंडिगो का नहीं, बल्कि भारतीय एविएशन का आईना है। भारत में उड़ानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन न तो एयरपोर्ट का बुनियादी ढांचा उतनी गति से विस्तार कर रहा है, न पायलटों की पर्याप्त भर्ती हो रही है, और न DGCA (नियामक) सुरक्षा नियमों को उतनी कड़ाई से लागू कर पा रहा है जितना करना चाहिए। जब एविएशन उद्योग में कॉस्ट-कटिंग सुरक्षा पर भारी पड़ जाए, तो ऐसे ‘मेल्टडाउन’ बार-बार होते रहेंगे। इस बार इंडिगो गिरी है—कल कोई और गिर सकता है।
अब दबाव बढ़ गया है कि इंडिगो न केवल पायलटों से संवाद स्थापित करे, बल्कि FTDL नियमों का कठोरता से पालन सुनिश्चित करे। इसके साथ ही कंपनी को भर्ती बढ़ानी होगी, शेड्यूलिंग सिस्टम में पारदर्शिता लानी होगी, और यह मानना होगा कि एयरलाइन सिर्फ जहाजों से नहीं, बल्कि उन लोगों से चलती है जो उन्हें उड़ाते हैं। सरकार और DGCA को भी यह समझना होगा कि यह संकट कोई ऑपरेशनल त्रुटि नहीं था—यह उस कमजोर संरचना का परिणाम था जिसका बोझ अब विमानन उद्योग उठा नहीं पा रहा।




