एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली
भारत की ऊर्जा जरूरतें और आयात पर बढ़ती निर्भरता
भारत तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था वाला देश है, जहां उद्योग, परिवहन, बिजली उत्पादन और घरेलू जरूरतों के कारण ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। देश की अपनी तेल और गैस उत्पादन क्षमता सीमित है, जिसके कारण भारत को अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। आंकड़ों के अनुसार भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और ईंधन की कीमतों पर पड़ता है। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं सामने आ रही हैं।
पश्चिम एशिया का भारत की ऊर्जा आपूर्ति में अहम स्थान
भारत के लिए पश्चिम एशिया लंबे समय से ऊर्जा का प्रमुख स्रोत रहा है। खाड़ी क्षेत्र के देशों से भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, एलपीजी और एलएनजी आयात करता है। भारत के कुल तेल आयात का लगभग 40 से 45 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। इसके अलावा तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी के मामले में भी खाड़ी देशों की बड़ी हिस्सेदारी है। कतर, सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भारत के लिए प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता माने जाते हैं। इन देशों के साथ भारत के दशकों पुराने ऊर्जा संबंध हैं और भारतीय रिफाइनरियों में प्रोसेस होने वाला कच्चा तेल काफी हद तक इसी क्षेत्र से आता है।
इराक, सऊदी अरब और कतर बने बड़े आपूर्तिकर्ता
अगर अलग-अलग देशों की बात करें तो इराक लंबे समय से भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। इसके बाद सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश आते हैं। वहीं गैस के मामले में कतर भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण साझेदार है, जहां से बड़ी मात्रा में एलएनजी आयात की जाती है। इन देशों से आने वाला तेल भारत की रिफाइनरियों में प्रोसेस होकर पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदलता है, जिनका उपयोग देशभर में परिवहन, उद्योग और घरेलू रसोई गैस के रूप में होता है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया में किसी भी तरह की राजनीतिक या सैन्य अस्थिरता भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर असर डाल सकती है।
होरमुज जलडमरूमध्य की रणनीतिक अहमियत
पश्चिम एशिया से भारत आने वाले तेल का बड़ा हिस्सा होरमुज जलडमरूमध्य के रास्ते से होकर गुजरता है। यह दुनिया का सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग माना जाता है, जहां से रोजाना लाखों बैरल कच्चा तेल वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है। भारत के लिए यह मार्ग इसलिए भी अहम है क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। अगर किसी सैन्य तनाव, नाकेबंदी या समुद्री सुरक्षा संकट के कारण यह मार्ग प्रभावित होता है तो वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है और कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
क्या भारत में भी बन सकती है गैस और एलपीजी की कमी
पश्चिम एशिया में किसी बड़े संकट की स्थिति में यह सवाल भी उठने लगता है कि क्या भारत में पाकिस्तान जैसी गैस या एलपीजी की कमी हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल भारत की स्थिति पाकिस्तान से काफी अलग है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा आयात के स्रोतों को विविध बनाया है और अब वह रूस, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से भी बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है। इसके अलावा भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी बनाए हैं, ताकि आपातकालीन स्थिति में कुछ समय तक घरेलू जरूरतों को पूरा किया जा सके।
फिर भी क्यों बनी रहती है चिंता
इसके बावजूद ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि पश्चिम एशिया में लंबे समय तक अस्थिरता रहने पर भारत पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। अगर तेल आपूर्ति में बाधा आती है या कीमतें अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं तो इसका असर भारत में महंगाई, परिवहन लागत और घरेलू ईंधन कीमतों पर दिखाई दे सकता है। यही वजह है कि भारत लगातार ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार और रणनीतिक भंडार बढ़ाने पर जोर दे रहा है, ताकि भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट का असर कम से कम हो।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत की नई रणनीति
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए भारत सरकार कई स्तरों पर काम कर रही है। एक तरफ देश में सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ विदेशी ऊर्जा साझेदारियों का विस्तार भी किया जा रहा है। भारत अब केवल खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहता और इसी कारण रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से भी तेल आयात बढ़ाया गया है। इस रणनीति का उद्देश्य यही है कि किसी एक क्षेत्र में संकट होने पर देश की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो।
अर्थात भारत की ऊर्जा जरूरतों में पश्चिम एशिया की भूमिका अभी भी बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि भारत ने आयात के स्रोतों में विविधता लाकर जोखिम कम करने की कोशिश की है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में किसी बड़े युद्ध या समुद्री मार्ग बाधित होने की स्थिति में तेल और गैस की वैश्विक कीमतों में उछाल का असर भारत पर भी पड़ सकता है। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा आने वाले समय में भारत की आर्थिक और रणनीतिक नीति का अहम हिस्सा बनी रहेगी।




