Home » Business » भारत की ऊर्जा नीति भारत में ही तय होनी चाहिए : डीज़ल अब भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी

भारत की ऊर्जा नीति भारत में ही तय होनी चाहिए : डीज़ल अब भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | नई दिल्ली | 7 मार्च 2026

भारत की ऊर्जा नीति भारत की जरूरतों के हिसाब से बननी चाहिए, न कि यूरोप और पश्चिमी देशों के बनाए नियमों के अनुसार। अमीर और विकसित देशों के लिए बनाए गए कार्बन लक्ष्य भारत जैसे विकासशील देश पर उसी तरह लागू नहीं किए जा सकते। भारत अभी विकास की राह पर है और यहां ऊर्जा की जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं, इसलिए यहां की परिस्थितियां पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग हैं।

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने यह दिखा दिया कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा कितनी कमजोर है। संभावित संकट को देखते हुए सरकार ने तेल कंपनियों से कहा कि वे रिफाइंड ईंधन के निर्यात को रोकें, उद्योगों को सप्लाई कम करें और घरों के लिए एलपीजी की उपलब्धता सुनिश्चित करें। इससे यह सवाल उठता है कि अगर दुनिया में तेल की सप्लाई अचानक रुक जाए तो भारत कितने दिन तक अपनी जरूरतें पूरी कर पाएगा।

सच्चाई यह है कि भारत के पास एलपीजी का भंडार बहुत सीमित है। देश में करीब 21 दिनों का एलपीजी स्टॉक है और कच्चे तेल का भंडार लगभग 70-75 दिनों का है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति या युद्ध जैसी घटनाओं का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। रणनीतिक भंडार भी बहुत ज्यादा नहीं है, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा हमेशा जोखिम में रहती है।

इस स्थिति के पीछे एक वजह यह भी है कि कई बार भारत ने पश्चिमी देशों की ऊर्जा नीतियों की नकल करने की कोशिश की है, जबकि वे नीतियां भारत की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुकूल नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) जैसे संस्थान अक्सर ऐसे नियम और सुझाव देते हैं जो अमीर देशों के लिए तो ठीक हो सकते हैं, लेकिन विकासशील देशों की समस्याओं को पूरी तरह नहीं समझते।

यूरोप के देशों जैसे जर्मनी और फ्रांस ने लगभग दो सौ साल तक कोयला, तेल और गैस का इस्तेमाल करके अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया। आज उनकी आय बहुत ज्यादा है, ऊर्जा की मांग स्थिर है और उनका ढांचा भी मजबूत है। इसलिए वे अब महंगे विकल्पों जैसे इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी और कार्बन टैक्स अपना सकते हैं। लेकिन भारत अभी उस स्थिति में नहीं है।

भारत में डीज़ल अभी भी अर्थव्यवस्था का आधार है। देश में लगभग 70 प्रतिशत माल की ढुलाई डीज़ल से चलने वाले ट्रकों से होती है। खेती में ट्रैक्टर और सिंचाई के पंप डीज़ल से चलते हैं। बसें, जनरेटर और कई उद्योग भी डीज़ल पर निर्भर हैं। इसलिए डीज़ल को अचानक खत्म करने की बात व्यावहारिक नहीं है।

आज का डीज़ल पहले की तुलना में काफी साफ हो चुका है। 2020 में भारत ने भारत स्टेज-VI मानक लागू किए, जो यूरोप के यूरो-6 मानकों के बराबर हैं। इसके बाद ईंधन में सल्फर की मात्रा बहुत कम हो गई है और प्रदूषण भी काफी घटा है। नए डीज़ल इंजन पुराने पेट्रोल इंजनों की तुलना में कई मामलों में कम प्रदूषण फैलाते हैं।

डीज़ल की एक और खासियत इसकी दक्षता है। एक लीटर डीज़ल पेट्रोल की तुलना में लगभग 10 से 15 प्रतिशत ज्यादा उपयोगी ऊर्जा देता है और माइलेज भी ज्यादा होता है। ट्रक, बस और ट्रैक्टर जैसे भारी वाहनों के लिए यह बहुत जरूरी है। जब परिवहन की लागत कम होती है तो खाने-पीने की चीजों, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा के सामान की कीमतें भी नियंत्रित रहती हैं।

डीज़ल के मुद्दे में विदेशी मुद्रा का पहलू भी महत्वपूर्ण है। भारत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है लेकिन उसे देश में ही रिफाइन करता है और उससे कई तरह के पेट्रोलियम उत्पाद बनाता है। इससे देश को ज्यादा आर्थिक फायदा मिलता है।

भारत की रिफाइनरियां हर साल 10 करोड़ टन से ज्यादा डीज़ल बनाती हैं, जो कुल उत्पादन का लगभग 43 प्रतिशत है। देश की कुल रिफाइनिंग क्षमता 25 करोड़ टन से अधिक है। इंडियन ऑयल, रिलायंस और भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियां न सिर्फ घरेलू जरूरतें पूरी करती हैं बल्कि एशिया, अफ्रीका और यूरोप को भी बड़ी मात्रा में डीज़ल निर्यात करती हैं।

इस पूरे ढांचे को अचानक इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरियों से बदलना आसान नहीं है। इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए लिथियम, कोबाल्ट और कई दुर्लभ खनिजों की जरूरत होती है, जिन्हें भारत को विदेशों से ही खरीदना पड़ता है। बड़े पैमाने पर बिजली आधारित व्यवस्था खड़ी करने के लिए भारी निवेश और मजबूत बिजली नेटवर्क भी जरूरी है।

बैटरियों के निर्माण और उनके निपटान से जुड़े पर्यावरणीय सवाल भी हैं। लिथियम और कोबाल्ट की खदानों का खनन पर्यावरण पर असर डालता है और दुनिया में अभी बैटरी रीसाइक्लिंग की व्यवस्था भी बहुत सीमित है।

ऊर्जा बदलाव तभी सफल होता है जब नए विकल्प सस्ते, भरोसेमंद और बड़े पैमाने पर उपलब्ध हों। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक जीवाश्म ईंधन — खासकर डीज़ल — भारत की विकास यात्रा में अहम भूमिका निभाते रहेंगे।

भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी भी पश्चिमी देशों से काफी कम है और यहां ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में अगर वही कड़े कार्बन नियम लागू किए जाएं तो इससे घरों के लिए एलपीजी महंगा हो सकता है, किसानों के लिए डीज़ल और परिवहन महंगा हो सकता है और छोटे उद्योगों के लिए बिजली भी महंगी हो सकती है। इससे विकास की गति धीमी पड़ सकती है।

इसलिए ऊर्जा नीति को नैतिक संदेश देने के बजाय आर्थिक वास्तविकताओं के आधार पर बनाना चाहिए। भारत के लिए सबसे जरूरी बातें हैं — सस्ती ऊर्जा, भरोसेमंद सप्लाई और मजबूत ऊर्जा सुरक्षा।

पर्यावरण संरक्षण जरूरी है, लेकिन बदलाव धीरे-धीरे होना चाहिए। रेलवे, मेट्रो और शहरों के छोटे रूटों में बिजली का इस्तेमाल बढ़ाया जा सकता है। लेकिन माल ढुलाई, खेती और भारी उद्योगों के लिए अभी भी डीज़ल जैसे उच्च ऊर्जा वाले ईंधन की जरूरत बनी रहेगी।

भारत को अपनी ऊर्जा नीति बनाते समय अपनी अर्थव्यवस्था, जनसंख्या और विकास की जरूरतों को ध्यान में रखना होगा। पश्चिमी देशों के मॉडल को बिना सोचे-समझे अपनाना सही नहीं होगा। दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था भले धीरे-धीरे बदल रही हो, लेकिन भारत जैसे विकासशील देश के लिए आने वाले कई वर्षों तक पारंपरिक ईंधन भी उतने ही जरूरी रहेंगे।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments