अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 2 अप्रैल 2026
अमेरिका की राजनीति और न्याय व्यवस्था इन दिनों एक ऐसे संवेदनशील और ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है, जहां कानून, संविधान और राजनीतिक विचारधाराएं आमने-सामने नजर आ रही हैं। जन्मसिद्ध नागरिकता (बर्थराइट सिटिजनशिप) से जुड़े इस बहुचर्चित मामले ने पूरे देश में गहरी बहस छेड़ दी है। इस मामले में भारतीय मूल की वकील स्मिता घोष एक महत्वपूर्ण चेहरा बनकर उभरी हैं, जो Donald Trump प्रशासन के फैसलों को चुनौती देने वाले पक्ष की कानूनी रणनीति का अहम हिस्सा हैं।अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई उस समय और भी ज्यादा सुर्खियों में आ गई, जब खुद डोनाल्ड ट्रंप अदालत में मौजूद रहे। यह घटना अपने आप में असाधारण मानी जा रही है, क्योंकि किसी पूर्व राष्ट्रपति का इस तरह सीधे अदालत में उपस्थित होना बेहद दुर्लभ है। उनकी मौजूदगी ने न केवल कानूनी प्रक्रिया को और अधिक गंभीर बना दिया, बल्कि इस मामले को राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया।
इस पूरे विवाद का मूल अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन है, जो यह सुनिश्चित करता है कि अमेरिका की धरती पर जन्म लेने वाला हर व्यक्ति स्वतः नागरिक माना जाएगा। ट्रंप प्रशासन ने अपने कार्यकाल के दौरान एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से इस प्रावधान को सीमित करने की कोशिश की थी। प्रस्तावित बदलाव के अनुसार, यदि बच्चे के माता-पिता अमेरिकी नागरिक या ग्रीन कार्ड धारक नहीं हैं, तो ऐसे बच्चों को नागरिकता देने से इनकार किया जा सकता है। इसी निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई है, जो अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।
इस कानूनी लड़ाई में स्मिता घोष की भूमिका बेहद रणनीतिक और प्रभावशाली मानी जा रही है। वे कॉन्स्टिट्यूशनल अकाउंटेबिलिटी सेंटर से जुड़ी एक वरिष्ठ अपीलीय वकील हैं और 14वें संशोधन की मूल भावना की रक्षा के लिए मजबूत तर्क प्रस्तुत कर रही हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उनका दृष्टिकोण न केवल विधिक रूप से सशक्त है, बल्कि अमेरिकी संवैधानिक इतिहास और परंपराओं की गहरी समझ पर आधारित है।
दिलचस्प बात यह है कि इतनी बड़ी और हाई-प्रोफाइल कानूनी लड़ाई का हिस्सा होने के बावजूद स्मिता घोष ने खुद को प्रचार और मीडिया की सुर्खियों से दूर रखा है। वे एक लो-प्रोफाइल व्यक्तित्व के रूप में जानी जाती हैं, जो अपनी पहचान से ज्यादा अपने काम को महत्व देती हैं। यही वजह है कि उन्हें “कम बोलने वाली लेकिन प्रभाव छोड़ने वाली” वकील के तौर पर देखा जा रहा है।
इस मामले का प्रभाव बेहद व्यापक हो सकता है। यह केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं है, बल्कि इससे अमेरिका की इमिग्रेशन नीति, नागरिकता की परिभाषा और लाखों प्रवासी परिवारों का भविष्य जुड़ा हुआ है। अनुमान के मुताबिक हर साल करीब ढाई लाख बच्चों के नागरिकता अधिकार इस फैसले से प्रभावित हो सकते हैं, जिनमें बड़ी संख्या भारतीय मूल के परिवारों की भी शामिल है, जो अमेरिका में काम या पढ़ाई के लिए रह रहे हैं।
अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि जन्मसिद्ध नागरिकता की अवधारणा को बरकरार रखा जाएगा या उसमें बदलाव किया जाएगा। यह निर्णय न केवल अमेरिकी कानून व्यवस्था को प्रभावित करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी नागरिकता और प्रवास से जुड़े विमर्श को नई दिशा दे सकता है।
यह मामला अब महज एक अदालत की सुनवाई नहीं रह गया है, बल्कि यह अमेरिका के संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक सिद्धांतों और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच चल रहे गहरे संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। आने वाला फैसला इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज हो सकता है।




