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मोदी काल में भारतीय पत्रकारिता: शोर से सत्ता तक, और नैतिकता के पतन की कहानी

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मोदी काल में भारतीय पत्रकारिता का जो चेहरा उभरा है, वह केवल ऊँची आवाज़, तेज़ संगीत और सनसनीखेज़ ब्रेकिंग न्यूज़ का प्रतीक नहीं है, बल्कि एक गहरी नैतिक गिरावट का भी संकेत है। यह वह दौर है जब मीडिया के बड़े हिस्से ने अपनी बुनियादी जिम्मेदारी—जनता की आवाज़ बनना, सत्ता से सवाल पूछना और सच्चाई के साथ खड़ा रहना—धीरे-धीरे त्याग दी। उसकी जगह सत्ता की गोद में बैठकर तालियाँ बजाने वाली पत्रकारिता ने ले ली।

‘गोदी मीडिया’ शब्द यूँ ही प्रचलन में नहीं आया। यह उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें कई बड़े चैनल और चर्चित चेहरे सरकार की हर नीति को बिना सवाल किए सही ठहराते नज़र आए, जबकि असहमति या आलोचना करने वालों को तुरंत ‘राष्ट्र-विरोधी’ करार दे दिया गया। बहसें सवालों पर नहीं, नीयत पर होने लगीं। पत्रकार जज बन बैठे और स्टूडियो अदालतों में फैसले पहले सुनाए जाने लगे, जांच बाद में—या कभी नहीं।

यह सच है कि मीडिया की सत्ता-परस्ती कोई नई बीमारी नहीं है। कांग्रेस के दौर में भी मीडिया पर सत्ता के करीब होने के आरोप लगते रहे हैं। लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं को रेल हादसों में सैकड़ों मौतों के बावजूद ‘मिनिस्टर ऑफ द ईयर’ जैसे तमगे मिलना इसी संस्कृति का हिस्सा था। फर्क यह है कि मोदी काल में यह प्रवृत्ति बिखरी हुई नहीं रही, बल्कि संस्थागत रूप में सामने आई। टीआरपी की दौड़ ने पत्रकारिता को नफरत, ध्रुवीकरण और आधी-अधूरी सच्चाइयों का औज़ार बना दिया।

2020 के दिल्ली दंगों की कवरेज इसका भयावह उदाहरण है, जहाँ कुछ चैनलों ने तथ्यों की जगह अफवाहों और उकसावे को तरजीह दी। खबरें आग बुझाने के बजाय उसमें घी डालने का काम करती दिखीं। यह सिर्फ पेशेवर चूक नहीं थी, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी से पलायन था।

इस नैतिक पतन की सबसे दर्दनाक तस्वीर कोरोना महामारी के दौरान सामने आई। जब अस्पतालों के बाहर कतारें थीं, ऑक्सीजन के लिए लोग तड़प रहे थे, श्मशानों में जगह नहीं बची थी और प्रवासी मजदूर भूखे-प्यासे सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर थे—तब भी कई बड़े चैनल सत्ता की ‘सफलता गाथा’ सुनाने में व्यस्त रहे। सवाल पूछने वालों को डराया गया, आंकड़ों पर बहस करने वालों को बदनाम किया गया। मानवीय संवेदना, जो पत्रकारिता की आत्मा होनी चाहिए थी, स्क्रीन से गायब थी।

इसी दौर में सुशांत सिंह राजपूत की मौत को जिस तरह महीनों तक तमाशा बनाया गया, उसने यह साफ कर दिया कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जनदुख से ज़्यादा राजनीतिक स्क्रिप्ट और टीआरपी को महत्व दे रहा है। महामारी, बेरोजगारी और आर्थिक संकट जैसे मुद्दे हाशिए पर चले गए, जबकि शोर और आरोपों ने प्राइम टाइम पर कब्जा कर लिया।

इलेक्टोरल बॉन्ड जैसे गंभीर मुद्दों पर भी यही रवैया दिखा। जब सवाल उठने चाहिए थे कि राजनीति और कॉरपोरेट के रिश्ते कैसे लोकतंत्र को प्रभावित कर रहे हैं, तब इसे ‘पारदर्शिता’ का नाम देकर आगे बढ़ा दिया गया। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे आम आदमी से जुड़े सवाल बहस से गायब होते चले गए।

फिर भी, यह कहना ईमानदारी नहीं होगी कि समस्या केवल एक राजनीतिक खेमे तक सीमित है। सत्ता चाहे जिसकी भी रही हो, मीडिया का एक हिस्सा हमेशा उसके करीब रहा है। लेकिन मोदी युग में धार्मिक ध्रुवीकरण को जिस खुलापन और आक्रामकता के साथ टीआरपी का हथियार बनाया गया, उसने हालात को और गंभीर कर दिया। वायु प्रदूषण, सार्वजनिक स्वास्थ्य या सामाजिक असमानता जैसे मुद्दे रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं, फिर भी वे अक्सर हेडलाइन बनने से चूक जाते हैं।

मीडिया का यह इको-चेंबर बन जाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। जब हर चैनल एक-सा बोलने लगे, जब असहमति को गाली और सवाल को साज़िश कहा जाए, तब समाज भी टूटने लगता है—हिंदू-मुस्लिम, अमीर-गरीब, सत्ता-विपक्ष के खांचों में। पत्रकार जब सत्ता से दोस्ती जोड़ लेते हैं, तो वे जनता से दूर हो जाते हैं, और इसी दूरी से विश्वास का संकट पैदा होता है।

उम्मीद की किरण वहाँ दिखाई देती है जहाँ डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र पत्रकार मुख्यधारा की चुप्पी को तोड़ते हैं। जब लोग वैकल्पिक मीडिया की ओर रुख करते हैं, तो यह संकेत होता है कि जनता अब केवल शोर नहीं, सवाल चाहती है। लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब बड़े मीडिया संस्थान भी आत्ममंथन करें—जब वे समझें कि सच्ची देशभक्ति सत्ता की तारीफ में नहीं, बल्कि सच बोलने के साहस में है।

‘गोदी मीडिया’ की कहानी दरअसल सिर्फ पत्रकारिता की कहानी नहीं है; यह हमारे लोकतंत्र की सेहत का आईना है। अगर मीडिया सवाल पूछना छोड़ देगा, तो सत्ता निरंकुश हो जाएगी। और अगर मीडिया फिर से जनता के साथ खड़ा हो जाए, तो अंधकार कितना भी गहरा हो, रोशनी की शुरुआत वहीं से होगी।

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