नई दिल्ली, 30 अक्टूबर | विशेष रिपोर्ट
विदेशों में बढ़ती धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से भारत की छवि पर असर, कई देशों में बढ़ी सतर्कता
भारत की विदेश नीति के इतिहास में यह विचार सदैव केंद्रीय रहा है कि भारतीयता का प्रसार केवल सभ्यता, सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक संवाद के माध्यम से होना चाहिए, न कि किसी वैचारिक वर्चस्व या राजनीतिक विस्तार के रूप में। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत की विदेश नीति को “नॉन-अलाइनमेंट” और “कल्चरल रिस्पेक्ट” के सिद्धांतों पर स्थापित किया था। उनका स्पष्ट मत था कि विदेशों में बसे भारतीय अपने कर्म, आचरण और नैतिकता के माध्यम से भारत की छवि को मज़बूत करें, न कि किसी धर्म या विचारधारा के प्रचार से। आज जब भारतीय प्रवासी समुदाय विश्व के अनेक देशों में आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक रूप से एक प्रभावशाली शक्ति बन चुका है, नेहरू की यह सीख पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है। उनका यह दृष्टिकोण कि भारतीय संस्कृति का प्रसार शालीनता और सहिष्णुता के माध्यम से होना चाहिए, अब अंतरराष्ट्रीय संबंधों और प्रवासी राजनीति के संदर्भ में पुनः मूल्यांकन की मांग कर रहा है।
वर्तमान समय में भारत की प्रवासी कूटनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है। यह केवल “सॉफ्ट पावर” या सांस्कृतिक पहचान का प्रदर्शन भर नहीं रह गई है, बल्कि अब यह वैश्विक राजनीति के संवेदनशील विषयों में से एक बन चुकी है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में प्रवासी भारतीय समुदाय अब केवल आर्थिक योगदान या रोजगार सृजन तक सीमित नहीं है, बल्कि वे सांस्कृतिक आयोजनों, धार्मिक उत्सवों और भारतीय परंपराओं के भव्य प्रदर्शन के माध्यम से अपनी पहचान को सार्वजनिक रूप से स्थापित कर रहे हैं। दीपावली, गणेशोत्सव, स्वतंत्रता दिवस, और हिंदू नववर्ष जैसे आयोजनों के दौरान स्थानीय स्तर पर भारतीय समुदायों का अभूतपूर्व उत्साह देखने को मिलता है। किंतु अब कई देशों में यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या ये आयोजन केवल सामुदायिक और सांस्कृतिक उत्सव हैं या इनके पीछे किसी राजनीतिक एजेंडे या वैचारिक प्रचार का भाव छिपा है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कुछ हिस्सों में स्थानीय मीडिया ने हाल के वर्षों में इन आयोजनों को ‘धार्मिक प्रदर्शन’ और ‘राजनीतिक निष्ठा की अस्पष्टता’ के संदर्भ में देखना शुरू कर दिया है। यह स्थिति भारत की विदेश नीति के लिए चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि एक ओर प्रवासी भारतीय अपनी पहचान को गर्वपूर्वक प्रस्तुत करना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर, मेजबान देश इन गतिविधियों को अपनी सामाजिक स्थिरता और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संभावित खतरे के रूप में देखने लगे हैं।
कनाडा के एडमोंटन में हाल ही में दीपावली के दौरान हुई घटना ने इस विमर्श को और गहरा कर दिया है। दो घरों में आग लगने और तीन लोगों की गिरफ्तारी के बाद स्थानीय प्रशासन ने सख्त बयान जारी करते हुए कहा, “अपना घर सजाइए, पड़ोसी की छत नहीं।” यह कथन प्रतीकात्मक रूप से प्रवासी भारतीयों को यह चेतावनी देता प्रतीत हुआ कि उत्सवों में सांस्कृतिक आक्रामकता या धार्मिक अति-उत्साह स्थानीय समाज की सीमाओं से टकरा सकता है। इस घटना के बाद ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में सार्वजनिक आयोजनों पर निगरानी बढ़ाई गई है। अब आतिशबाज़ी, झांकियों और धार्मिक रैलियों से जुड़े नियम और अधिक सख्त हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब सांस्कृतिक आत्म-अभिव्यक्ति “अति-उत्सव” में बदल जाती है, तब वह स्थानीय समाज के मूल्यों और पर्यावरणीय चिंताओं से टकराने लगती है। यह भी देखा जा रहा है कि कुछ प्रवासी समूह अपने धार्मिक आयोजनों में राजनीतिक भाषणों या राष्ट्रवादी नारों को शामिल कर रहे हैं, जिससे ‘सांस्कृतिक आत्मविश्वास’ और ‘सांस्कृतिक हस्तक्षेप’ के बीच की रेखा धुंधली पड़ रही है। यह स्थिति न केवल प्रवासी समुदायों के लिए बल्कि भारत की वैश्विक साख के लिए भी चिंता का विषय बन गई है।
यही कारण है कि पंडित नेहरू की वह चेतावनी आज पुनः अत्यंत प्रासंगिक लगती है, जिसमें उन्होंने कहा था — “एक बार जब आप भारतीय नागरिकता छोड़कर किसी दूसरे देश की नागरिकता लेते हैं, तो उस देश के प्रति वफादार रहिए। यही किसी भी चर्चा का आरंभिक बिंदु होना चाहिए।” नेहरू का यह कथन मूलतः भारतीयता की आत्मा को समझाने का प्रयास था — कि भारत की संस्कृति सीमाओं से परे है, लेकिन भारतीय नागरिकता एक दायित्व है। आज जब कुछ प्रवासी संगठन और लॉबी समूह भारत के राजनीतिक या वैचारिक एजेंडे को विदेशों में आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, तब यह चेतावनी पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। कनाडा में खालिस्तानी गतिविधियों के विरोध में भारत समर्थक रैलियाँ हों या अमेरिका और ब्रिटेन में राष्ट्रवादी भावनाओं से भरे विशाल प्रवासी सम्मेलन — ये सब भारत की छवि को एक तरफ़ राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो दूसरी तरफ़ यह भी भय उत्पन्न करते हैं कि कहीं यह धार्मिक राष्ट्रवाद का अंतरराष्ट्रीय रूप न बन जाए।
1990 के दशक से शुरू होकर हिंदुत्व विचारधारा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रसार धीरे-धीरे प्रवासी भारतीय समुदायों में जड़ें जमाने लगा था, परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद इस प्रवृत्ति ने नई ऊँचाई प्राप्त की। उनके विदेश दौरों पर आयोजित विशाल डायस्पोरा कार्यक्रम, जैसे न्यूयॉर्क, लंदन और सिडनी में हुए, भारत की नई आत्मविश्वासी और आक्रामक पहचान का प्रतीक बने। लाखों प्रवासी भारतीयों ने इन आयोजनों को भारत के पुनर्जागरण के रूप में देखा, परंतु कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने इन्हें भारत की घरेलू राजनीति के वैचारिक विस्तार के रूप में चिन्हित किया। पश्चिमी देशों में यह चिंता भी बढ़ी कि भारतवंशियों की यह एकजुटता कहीं उनकी स्थानीय राजनीति या नीतिगत निर्णयों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालने का माध्यम न बन जाए। विशेष रूप से ऐसे समय में जब रूस और चीन जैसे देशों पर विदेशी हस्तक्षेप के गंभीर आरोप लग चुके हैं, भारतीय समुदाय की राजनीतिक सक्रियता पर निगरानी बढ़ना स्वाभाविक है।
अमेरिका, कनाडा और यूरोप में अब विदेशी प्रभावों को लेकर सतर्कता पहले से कहीं अधिक है। भारतीय मूल के सांसदों, दानदाताओं और लॉबी समूहों की बढ़ती सक्रियता एक ओर भारतीय समुदाय की सफलता और राजनीतिक परिपक्वता का संकेत देती है, वहीं दूसरी ओर, इन गतिविधियों को कभी-कभी “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विस्तार” के रूप में भी देखा जाने लगा है। पारदर्शिता, निष्ठा और स्थानीय नागरिकता के प्रति वफादारी जैसे प्रश्न अब वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन गए हैं। इन हालात में भारत और उसके प्रवासी समुदाय — दोनों को अपनी रणनीति और आचरण में अधिक जिम्मेदारी और संयम दिखाने की आवश्यकता है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने प्रवासी समुदाय को सांस्कृतिक गर्व और भारतीय विरासत से जोड़े रखते हुए भी स्थानीय समाज की संवेदनशीलताओं का पूर्ण सम्मान सुनिश्चित करे। यदि विदेशों में भारतीय त्योहार और सांस्कृतिक आयोजन राजनीतिक या वैचारिक रंग लेने लगेंगे, तो वहाँ के समाजों में विभाजन और अविश्वास का वातावरण बन सकता है, जिससे अंततः भारत की प्रतिष्ठा और उसके हितों को ही नुकसान पहुँचेगा। इसलिए भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रवासी नीति केवल “भावनात्मक कूटनीति” तक सीमित न रहे, बल्कि एक जिम्मेदार और समावेशी वैश्विक साझेदारी का माध्यम बने।
नेहरू की वही सीख आज फिर प्रासंगिक लगती है — “निष्ठा उसी देश के प्रति होनी चाहिए जिसकी नागरिकता आपने चुनी है।” यही दृष्टिकोण भारत की साख, प्रवासी भारतीयों के सम्मान और विश्व में उसकी सांस्कृतिक विश्वसनीयता की रक्षा कर सकता है। भारतीयता की आत्मा हमेशा उदार, संवादशील और सार्वभौमिक रही है — यही वह मूल विचार है जो भारत को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के युग में फिर से एक नैतिक नेतृत्व की भूमिका निभाने का अवसर दे सकता है।




