सऊदी अरब लंबे समय तक उस देश के रूप में देखा गया जहां लोग सिर्फ काम की तलाश में आते थे—तेल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने लाखों प्रवासियों को आकर्षित किया, और अधिकांश को सीमित अधिकारों तथा कठोर नियमों के बीच काम करने का अनुभव रहा। लेकिन बदले हुए दौर में, खासकर विज़न 2030 के तहत, सऊदी अरब में प्रवासियों को लेकर दृष्टिकोण तेजी से बदल रहा है। अब राज्य स्वयं स्वीकार कर रहा है कि 32.2 मिलियन की कुल आबादी में से 44.4% प्रवासियों ने देश की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा और अवसंरचना को खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन्हीं प्रवासियों के योगदान के प्रति सम्मान जताने के लिए सऊदी अरब के सूचना मंत्रालय ने ‘ग्लोबल हार्मनी’ नामक पहल की शुरुआत की—और इसके केंद्र में रखा इंडिया वीक, जो 2 से 10 नवंबर तक रियाध के सुवैदी पार्क में शानदार रूप से आयोजित हुआ।
2.7 मिलियन भारतीयों के विशाल समुदाय को धन्यवाद देने के उद्देश्य से यह आयोजन सिर्फ सांस्कृतिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उस भावनात्मक स्वीकार का प्रतीक था कि भारतीयों ने सऊदी विकास की कहानी को अपनी मेहनत और प्रतिबद्धता से आकार दिया है। रियाध सीज़न का उद्घाटन लगातार दूसरे वर्ष ‘इंडिया वीक’ से होना यह दर्शाता है कि भारतीय समुदाय अब सऊदी समाज और उसके सांस्कृतिक-कूटनीतिक प्रयासों का अभिन्न हिस्सा माना जा रहा है। इस पूरे सप्ताह में भारतीय संगीत, नृत्य, भोजन, लोककला, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक परेड का जादू रियाध की हवा में घुला रहा। कनिका कपूर, जान कुमार, DJ श्रेया जैसे कलाकारों ने मंच संभाला और भारतीय डांस ट्रूप की रोज़ाना की परेड ने पार्क में मौजूद हर व्यक्ति को भारत की विविधता का अहसास कराया।
सऊदी अरब की जनरल एंटरटेनमेंट अथॉरिटी के कंटेंट एवं प्लानिंग डेवलपमेंट एक्जीक्यूटिव सैरी शाबान के अनुसार इस वर्ष दर्शकों की संख्या पिछले साल की तुलना में 60% अधिक रही। रोज़ाना शाम 4 बजे से आधी रात तक पार्क में सैलानियों, स्थानीय नागरिकों, भारतीय परिवारों और बच्चों की अभूतपूर्व भीड़ उमड़ती रही। लोग भारतीय व्यंजनों के स्टॉल पर कतार में दिखाई दिए, वहीं हस्तशिल्प की दुकानों पर पारंपरिक भारतीय कला की खूबसूरती ने स्थानीय लोगों को भी आकर्षित किया। भीड़ का यह उत्साह स्पष्ट संकेत देता है कि सऊदी समाज भारतीय संस्कृति को केवल “विदेशी” के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी धारा के रूप में देख रहा है जिसके साथ वह स्वाभाविक रूप से जुड़ सकता है।
सैरी शाबान ने बड़े अर्थपूर्ण शब्दों में कहा “यह कनेक्शन की बात है। न रंग मायने रखता है, न विश्वास। यह उन समुदायों को वापस कुछ देने का प्रयास है जिन्होंने सऊदी अरब को अपना दूसरा घर बनाया है।”
उनका यह बयान सऊदी अरब के सामाजिक परिवर्तन की दिशा को उजागर करता है—जहाँ मनोरंजन, पर्यटन, खेल और संस्कृति के माध्यम से समाज में अधिक सहभागिता, अधिक खुलापन और अधिक पारिवारिक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। यही विज़न 2030 का मूल भी है, जो नागरिकों और प्रवासियों दोनों के लिए जीवन-स्तर और जीवन-गुणवत्ता को बेहतर बनाने पर केंद्रित है।
इस कार्यक्रम की एक खास बात यह रही कि 3,500 से अधिक सऊदी नागरिकों ने ‘ग्लोबल हार्मनी’ आयोजन में प्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया—आयोजन प्रबंधन, लॉजिस्टिक्स, तकनीकी कार्य और सांस्कृतिक संयोजन में स्थानीय लोग सक्रिय रूप से शामिल रहे। इससे न केवल दो समुदायों के बीच अधिक जुड़ाव पैदा हुआ, बल्कि इसने यह संदेश भी दिया कि सऊदी अरब भारतीय समुदाय को महज प्रवासी श्रमिकों की तरह नहीं देखता, बल्कि एक साझेदार, एक सांस्कृतिक पुल और एक सहयोगी शक्ति के रूप में देखता है।
इंडिया वीक के दूसरे अंतिम दिन भारत के पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने सुवैदी पार्क का दौरा किया। उन्होंने आयोजन की जमकर सराहना की और कहा कि यह मॉडल भारत समेत कई देशों में अपनाया जा सकता है।
“यह कार्यक्रम यहाँ रह रहे भारतीयों को उनकी जड़ों से जोड़ता है—वह भी पूरे परिवार के साथ। यह सराहनीय और अनुकरणीय पहल है,” उन्होंने कहा।
भीड़ के उत्साह और भारतीय-सऊदी सांस्कृतिक सहयोग की बढ़ती गर्माहट को देखते हुए अब यह माना जा रहा है कि इंडिया वीक रियाध के सांस्कृतिक कैलेंडर का स्थायी हिस्सा बन सकता है। रियाध सीज़न 20 दिसंबर तक चलेगा और इसमें 14 प्रमुख प्रवासी समुदायों को समर्पित ‘वीक’ भी शामिल होंगे—जिससे यह साबित होता है कि सऊदी अरब सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देने की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता मजबूत कर चुका है।
अंत में, इंडिया वीक सिर्फ एक त्योहार नहीं रहा—यह दो देशों, दो संस्कृतियों और दो समाजों के बीच रिश्तों की नई गर्माहट का उत्सव बन गया। यह वह मोड़ है जहाँ प्रवासी भारतीयों के दशकों से किए गए योगदान को औपचारिक और सार्वजनिक रूप से सम्मान मिला है। यह संकेत है कि सऊदी अरब अब एक बदलते हुए सामाजिक युग में कदम रख चुका है—जहाँ भारतीय सिर्फ कामगार नहीं, बल्कि संस्कृति, सहयोग और साझेदारी के दूत के रूप में देखे जा रहे हैं।




