एबीसी डेस्क 24 नवंबर 2025
सोशल मीडिया पर इन दिनों खान सर का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे भारत के अरबपतियों और अमेरिकी अरबपतियों के बनने की प्रक्रिया की तुलना करते हुए बेहद विवादित और बहस छेड़ देने वाले बयान दे रहे हैं। वीडियो में खान सर साफ तौर पर कहते दिख रहे हैं कि भारत में कोई भी अरबपति टैलेंट या इनोवेशन के दम पर नहीं बना है, बल्कि पांच प्रमुख कारणों के आधार पर अमीर हुआ है—बैंकों से भारी-भरकम लोन लेना, केंद्र सरकार से हितैषी नीतियां बनवाना, राज्य सरकारों से मुफ्त या सस्ते दर पर जमीन हासिल करना, विदेशों से तैयार टेक्नोलॉजी लाना और सरकारी ठेकेदारी के ज़रिये अपने व्यापार का विस्तार करना। उनके अनुसार यह मॉडल भारत के उद्योग जगत की बुनियाद बन चुका है, जहां मेहनत और शोध के बजाय राजनीतिक पहुंच और आर्थिक नेटवर्किंग सफलता की कुंजी बन गए हैं।
खान सर के इस तर्क का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि वे इसे अमेरिकी अरबपतियों के विकास मॉडल से तुलना करते हैं। वीडियो में वे उदाहरण देते हैं—जेफ बेजोस जिन्होंने अमेज़न जैसी ई-कॉमर्स क्रांति की शुरुआत की, बिल गेट्स जिन्होंने माइक्रोसॉफ्ट के माध्यम से कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम की दुनिया बदल दी, एलन मस्क जिन्होंने टेस्ला और स्पेसएक्स के जरिये इलेक्ट्रिक वाहन और अंतरिक्ष क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाए, मार्क जुकरबर्ग जिनकी फेसबुक ने सोशल नेटवर्किंग का नया युग खड़ा किया, और स्टीव जॉब्स जिन्होंने एप्पल के जरिये तकनीकी नवाचार को नए आयाम दिए। खान सर का कहना है कि ये सभी नाम इसलिए अरबपति बने क्योंकि उन्होंने दुनिया को कुछ नया दिया, ऐसी चीजें बनाईं जिनकी वैश्विक स्तर पर जरूरत थी और जिनसे मानव जीवन की दिशा बदल गई।
इसके उलट, खान सर भारतीय अरबपतियों के मॉडल को “ठेकेदारी आधारित” बताते हैं। उनका दावा है कि भारत का उद्योग जगत बड़े पैमाने पर शोध और इनोवेशन में निवेश नहीं करता। कंपनियां अपनी पूंजी का बहुत कम हिस्सा रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च करती हैं, जबकि मुनाफे का बड़ा हिस्सा सरकारी प्रोजेक्ट्स, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और नीतिगत लाभों से आता है। वे कहते हैं कि भारत में अरबपति बनने के लिए नई तकनीक विकसित करने या वैज्ञानिक योगदान देने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सही राजनीतिक संपर्क, सरकारी अनुदान, भूमि आवंटन और विदेशी तकनीक के आयात से ही उद्योग खड़े किए जाते हैं।
खान सर का यह बयान भारतीय आर्थिक मॉडल पर एक गहरी बहस को जन्म दे रहा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय उद्योग जगत में वास्तव में रिसर्च और इनोवेशन की कमी लंबे समय से एक बड़ी समस्या रही है। भारत आज भी पेटेंट, नवाचार, वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी निर्माण के मामलों में वैश्विक रैंकिंग में पीछे है, जबकि संपत्ति निर्माण के मामले में भारतीय अरबपतियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आलोचकों के अनुसार यह दिखाता है कि आर्थिक विकास के लाभ सीमित हाथों में संकेन्द्रित हो रहे हैं और उद्योग संरचना अभी भी संसाधन-आधारित और राज्य-निर्भर है, न कि ज्ञान-आधारित।
वीडियो पर लोगों की प्रतिक्रियाओं में विभाजन स्पष्ट दिखाई दे रहा है। कुछ लोग खान सर के इस विश्लेषण को कड़वी लेकिन सच्ची हकीकत बताते हुए समर्थन कर रहे हैं, जबकि कई लोगों का कहना है कि भारत में भी उद्योगपति जोखिम उठाते हैं, रोजगार पैदा करते हैं और देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं। हालांकि बहस का केंद्रीय मुद्दा यही बना हुआ है कि क्या भारत का उद्योग जगत वास्तव में नवाचार और वैज्ञानिक अनुसंधान को महत्व देता है या फिर आर्थिक सफलता अभी भी राजनीतिक और संरचनात्मक लाभों पर आधारित है।
खान सर का यह वीडियो सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि भारत के विकास मॉडल, उद्योग नीति और आर्थिक भविष्य पर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है—क्या भारत भी कभी उन देशों की तरह इनोवेशन आधारित अर्थव्यवस्था बन पाएगा, जिसने दुनिया को बदलने वाले उत्पाद और तकनीकें दीं, या फिर ठेकेदारी और सरकारी सहयोग पर आधारित यह व्यवस्था ही आगे बढ़ती रहेगी? यह बहस अब सोशल मीडिया से निकलकर आर्थिक और राजनीतिक विमर्श तक पहुंच चुकी है।




