महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 17 नवंबर 2025
भारतीय अर्थव्यवस्था में जब भी मौद्रिक नीति, बैंकिंग सुधार या एनपीए संकट की गंभीरता पर बहस छिड़ती है, रघुराम राजन का नाम एक बेंचमार्क की तरह सामने आता है। सितंबर 2013 से सितंबर 2016 तक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रहे राजन अपनी सख्त नीतियों, डेटा-आधारित फैसलों और राजनीतिक दबावों के आगे न झुकने वाले व्यक्तित्व के लिए जाने जाते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव में उनकी सोच और नीतियाँ हमेशा एक विकल्प की तरह पहचानी जाती हैं—कि अगर राजन आज RBI में होते, तो निर्णय किस दिशा में जाते? खासकर जब हाल के वर्षों में नोटबंदी, एनपीए, लोन माफी और RBI के सरप्लस ट्रांसफर जैसे फैसलों ने व्यापक बहस को जन्म दिया है। इसी परिप्रेक्ष्य में यह विश्लेषण बताता है कि राजन की संभावित नीति कैसी होती—तथ्यों, उनके वक्तव्यों और उनके कार्यकाल की वास्तविक उपलब्धियों के आधार पर।
सबसे पहले जब हम नोटबंदी को देखते हैं, तो स्पष्ट रूप से राजन की सोच कभी भी इस दिशा में नहीं थी। 2014 में ही उन्होंने बड़े नोट बंद करने को “अप्रभावी” और “सीमित असर वाला” बताया। उन्होंने कहा था कि काला धन कैश में नहीं, बल्कि संपत्तियों और विदेशों में पार्क होता है, इसलिए नोट बदलने से इसका समाधान संभव नहीं। 2016 में संसदीय कमिटी के सामने उनका बयान इससे भी स्पष्ट था—“Short-term costs outweigh long-term benefits”—अर्थात नोटबंदी की हानि उसके संभावित लाभों से कहीं अधिक। अगर राजन गवर्नर होते, तो देश 8 नवंबर 2016 की रात 500 और 1000 के नोटों को अमान्य घोषित होते हुए कभी न देखता। राजन आर्थिक मजबूती डिजिटल ट्रांजैक्शन, UPI जैसे नवाचारों, और टैक्स इंटेलिजेंस पर आधारित करते, न कि एक झटके वाली नीति पर। बाद में जब RBI रिपोर्ट ने बताया कि 99.3% पुराने नोट वापस बैंकिंग सिस्टम में लौट आए, तब राजन का विश्लेषण पूरी तरह सही साबित हुआ।
एनपीए और बैंकिंग संकट पर राजन की भूमिका सबसे अधिक प्रशंसित और सबसे विवादित रही है। उन्होंने 2015 में “Asset Quality Review” (AQR) लॉन्च किया—एक ऐसा कदम जिसने छुपे हुए या कृत्रिम रूप से स्वस्थ दिखाए जा रहे लोन को उजागर कर दिया। कई बैंक सालों से “evergreening” कर रहे थे—खराब लोन को नया लोन देकर उन्हें अच्छा दिखाना। राजन ने इस पूरे खेल को खत्म कर दिया। नतीजा यह हुआ कि एनपीए 4.3% से बढ़कर 11.2% तक पहुंच गए, लेकिन यह वृद्धि वास्तविक स्थिति को सामने लाने की वजह से थी, न कि बढ़े हुए जोखिम की वजह से। राजन की नीति बिल्कुल स्पष्ट थी—“Promoters should not be bailed out at taxpayers’ expense।” यानी उद्योगपतियों के खराब फैसलों का बोझ टैक्सपेयर पर नहीं डाला जाएगा। यही कारण है कि उनके रहते बड़े उद्योगपतियों को माफी, राइट-ऑफ या राजनीतिक संरक्षण नहीं मिला।
वर्तमान राजनीति में जिस “20 लाख करोड़ लोन माफी” का दावा किया जाता है, वह तथ्यात्मक रूप से टिकता नहीं। RBI, वित्त मंत्रालय और IBC रिपोर्ट्स के अनुसार—कुल write-offs लगभग 12–14 लाख करोड़ के बीच हैं, लेकिन write-off का मतलब माफी नहीं होता; recovery जारी रहती है। IBC में कंपनियों के रेज़ॉल्यूशन के दौरान haircuts 40–60% तक होते हैं, पर बैंक अपनी वसूलियां जारी रखते हैं। किसान लोन माफी की कुल राशि लगभग 3 लाख करोड़ बैठती है, पर वह राज्य सरकारों का फैसला था। उद्योगपतियों के लिए कोई आधिकारिक “माफी” नहीं हुई है। इस पूरे परिदृश्य में यह साफ है कि अगर राजन होते, तो bailouts की गुंजाइश बिल्कुल नहीं छोड़ी जाती। वे promoters की personal guarantees, संपत्तियों और कानूनी जिम्मेदारी को सुनिश्चित करते, ताकि बैंकिंग सिस्टम में अनुशासन बना रहे।
RBI के surplus transfer पर भी राजन की नीति दृढ़ थी। उनके कार्यकाल में सरकार ने लगातार दबाव बनाया कि RBI अधिक डिविडेंड ट्रांसफर करे, लेकिन राजन ने इसका विरोध किया। उनका स्पष्ट मत था कि RBI की बैलेंस शीट देश की वित्तीय स्थिरता की सुरक्षा का ढाल है, न कि सरकार के fiscal deficit की भरपाई का साधन। 2018-19 में 1.76 लाख करोड़ रुपये का सरप्लस ट्रांसफर, जो बिमल जालान कमिटी की सिफारिशों के बाद हुआ, राजन की नीतिगत सोच के बिल्कुल विपरीत था। उनके रहते RBI सरकार को इतना बड़ा सरप्लस कभी नहीं देता। वे मानते थे कि RBI को “Lender of Last Resort” की क्षमता बनाए रखने के लिए मजबूत बैलेंस शीट ज़रूरी है। उनके रहते सरकार को बाजार से कर्ज लेकर deficit पूरा करना पड़ता, RBI के खजाने से नहीं।
अगर अनुमान लगाया जाए कि राजन 2016 के बाद गवर्नर रहते, तो भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा कुछ अलग ही होती। मौद्रिक नीति inflation-targeting पर आधारित रहती। 2022–23 की उच्च मुद्रास्फीति के समय वे और अधिक आक्रामक rate hikes करते। बैंकिंग सुधारों में PSU बैंक प्राइवेटाइजेशन को गति मिलती—क्योंकि राजन का मानना था कि राजनीतिक हस्तक्षेप PSU बैंकों का सबसे बड़ा रोग है। NPA cleanup और भी सख्त होता, IBC को तेज़ और असरदार बनाया जाता। सरकार की फिस्कल पॉलिसी पर नियंत्रण कम होता—RBI अधिक स्वतंत्र भूमिका निभाता। और सबसे महत्वपूर्ण, राजन किसी भी आर्थिक सुधार—चाहे GST हो, Digital India हो या फिनटेक—को झटके (shock therapy) की बजाय मजबूती और स्थिरता पर आधारित करते।
रघुराम राजन की सोच यह थी कि अर्थव्यवस्था का विकास अल्पकालिक राजनीतिक लाभ से नहीं चलता—यह भरोसे, पारदर्शिता, और दीर्घकालिक स्थिरता पर आधारित होता है। उनकी संभावित नीतियाँ आज की कई विवादित आर्थिक कार्रवाइयों से बिल्कुल अलग होतीं। न तो नोटबंदी जैसी अनिश्चितता, न उद्योगपतियों की कथित “माफियाँ”, न RBI के खजाने का इतना व्यापक उपयोग। राजन की दृष्टि का सार यह था—भारत को टिकाऊ विकास चाहिए, तेज़ लेकिन खोखले विकास का भ्रम नहीं।




