डॉ. शालिनी अली, समाजसेवी | नई दिल्ली | 25 नवंबर 2025
देश में हाल ही में जो घटनाएं हुई हैं—दिल्ली के लाल किले के पास कार ब्लास्ट और कश्मीर के थाने में हुआ विस्फोट—वे सिर्फ आतंकी घटनाएं नहीं हैं, यह भारत के खिलाफ खुला युद्ध है। यह साफ संदेश है कि आतंकवादी अब सिर्फ डर नहीं फैलाना चाहते, बल्कि भारतीय राज्य, उसकी सुरक्षा व्यवस्था, उसकी संप्रभुता और उसकी राष्ट्रीय मनोवृत्ति को कमजोर करना चाहते हैं। सवाल यह है कि हम कब तक मोमबत्ती जलाकर, ट्वीट करके और बयानबाजी करके इस लड़ाई को टालते रहेंगे? कितने शव और देखने हैं हमें? कितनी माताओं को रोते देखना है? कितनी बेटियों के भविष्य को लहूलुहान होते देखना है? अब समय आ गया है कि भारत केवल जवाब देने की बात न करे, बल्कि निर्णायक प्रहार करे। यह लड़ाई अब आत्मरक्षा की नहीं, अस्तित्व की है।
10 नवंबर 2025 को लाल किले के पास हुआ कार बम धमाका एक साधारण आतंकी कृत्य नहीं था। यह भारत की राजधानी, उसके गौरव, उसकी प्रतीकात्मक पहचान और उसकी सुरक्षा व्यवस्थाओं को निशाना बनाकर किया गया हमला था। 15 लोग मारे गए, 30 से अधिक घायल हुए—लेकिन असली चोट भारत के गर्व पर की गई। दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की गई कि भारत की राजधानी में भी आतंकवादी आसानी से अपना नेटवर्क चला सकते हैं और सुरक्षा एजेंसियों को चकमा दे सकते हैं। जांच में यह तथ्य सामने आ चुका है कि इस हमले की योजना भारत के भीतर बैठकर नहीं बनाई गई थी, बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ द्वारा संचालित साजिश थी, जिसमें कश्मीर आधारित मॉड्यूल और चीन में प्रशिक्षित व्यक्ति की भूमिका सामने आई है। जब आतंकवाद इस स्तर पर संगठित हो चुका है, तो क्या भारत सिर्फ कड़े शब्दों की निंदा करता रहेगा? यह कमजोरी नहीं तो और क्या है?
दिल्ली ब्लास्ट के तुरंत बाद कश्मीर के एक थाने में किया गया विस्फोट यह दर्शाता है कि आतंकवादियों का उद्देश्य सिर्फ भीड़ को मारना नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा संरचना की रीढ़ तोड़ना है। पुलिस स्टेशन पर हमला करना मतलब कानून लागू करने वाली संस्था के मनोबल पर हमला करना। यह एक स्पष्ट रणनीति है—पहले जनता में डर फैलाओ, फिर सुरक्षा बलों को असुरक्षित महसूस कराओ, और फिर पूरा सिस्टम पंगु कर दो। यह हमला दिखाता है कि आतंकवादी नेटवर्क न केवल सक्रिय है, बल्कि पूरी तरह संगठित होकर भारत के भीतर अपना विस्तार कर रहा है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है और इस पर सिर्फ बैठकों, प्रेस कॉन्फ्रेंसों और बयानों से नियंत्रण नहीं होगा।
इन घटनाओं के पीछे अल-फलाह जैसे संदिग्ध नेटवर्कों का नाम सामने आना और भी चिंताजनक है। चाहे यह संगठन वास्तविक हो या किसी बड़े नेटवर्क का मुखौटा, इसका लगातार आतंकी संदर्भों में सामने आना अपने आप में खतरे की घंटी है। यदि यह सच है, तो देश के भीतर स्लीपर सेल्स की जड़ें हमारी कल्पना से कहीं अधिक गहरी हैं। यदि यह अफवाह है, तो यह उतना ही घातक है क्योंकि यह निर्दोष मुसलमानों को निशाना बनाकर आतंकवादियों के एजेंडे को मजबूती देता है। इन दोनों स्थितियों में एक चीज़ स्पष्ट है—भारत को अब आधे-अधूरे उपायों, कागजी सूचनाओं और धीमी जांच पर निर्भर रहना बंद करना होगा। आतंकवादी नेटवर्कों की पहचान, ध्वस्तीकरण और समाप्ति के लिए कठोर, तीव्र और आक्रामक कार्रवाई समय की मांग है।
एक मुसलमान होने के नाते मैं यह साफ कहना चाहती हूँ कि आतंकवाद इस्लाम विरोधी है। जो लोग धर्म के नाम पर हिंसा करते हैं, वे सबसे बड़े अपराधी हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि हम मुसलमानों को खुलकर यह कहना होगा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हम पीछे नहीं हटेंगे। हम पीड़ित की भूमिका निभाकर नहीं चल सकते। हमें आगे आकर यह साबित करना होगा कि भारत का हर नागरिक, चाहे उसका मज़हब कुछ भी हो, राष्ट्र के साथ खड़ा है। मदरसों और मस्जिदों पर निगरानी होनी चाहिए, फंडिंग की जांच होनी चाहिए और कट्टरपंथी गतिविधियों को जड़ से खत्म करना होगा। लेकिन साथ ही निर्दोष मुसलमानों को बदनाम करने की राजनीति भी बंद होनी चाहिए, क्योंकि इससे केवल आतंकवादी मजबूत होते हैं।
भारत को अब यह स्पष्ट निर्णय लेना होगा कि आतंकवाद का जवाब सिर्फ सुरक्षा बढ़ाने से नहीं मिलेगा, बल्कि आतंक के स्रोतों पर सीधे प्रहार करके मिलेगा। आतंकियों को वर्षों तक जेलों में पालने की जरूरत नहीं—तेज न्याय, कठोर सजा और फांसी जैसे नतीजे ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोक सकते हैं। सीमा पार से फंडिंग हो, डिजिटल नेटवर्क हो, या देश के भीतर छिपे स्लीपर सेल—इन सभी पर युद्ध स्तर पर कार्रवाई की आवश्यकता है। अब “जीरो टॉलरेंस” का अर्थ केवल भाषणों में नहीं, जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
भारत को यह समझना होगा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अब चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व का सवाल है। या तो हम अब निर्णायक कदम उठाएं, या फिर आने वाली पीढ़ियाँ हमें कायर और कमजोर राष्ट्र के रूप में याद करेंगी। देश ने बहुत सहा। अब नहीं। अब समय है प्रहार का—सीधा, तेज और अंतिम।
अगर भारत सुरक्षित रहेगा, तभी हमारी पहचान, हमारा धर्म, हमारा समाज और हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा। आतंकवाद के खिलाफ अब समझौते की नहीं, कार्रवाई की जरूरत है। और वह अभी चाहिए।




