एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 3 मार्च 2026
भारत और Iran के बीच तेल व्यापार का एक ऐसा अध्याय है, जिसे कूटनीतिक संतुलन और आर्थिक व्यावहारिकता का उदाहरण माना जाता है। यह घटनाक्रम खासतौर पर 2010 से 2015 के बीच का है, जब United States और यूरोपीय संघ ने ईरान पर उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे।
जब डॉलर में भुगतान मुश्किल हो गया
उस दौर में भारत, ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता था। 2010-11 तक ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था और भारत की कुल जरूरतों का लगभग 10-12 प्रतिशत तेल वहीं से आता था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद डॉलर में भुगतान लगभग असंभव हो गया। पहले इस्तेमाल होने वाला बैंकिंग माध्यम, जैसे तुर्की की Halkbank, भी बंद हो गया।
भारत ने निकाला ‘रुपया रास्ता’
ऐसे हालात में भारत और ईरान ने एक वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था बनाई। भारत ने तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर की जगह भारतीय रुपये में करना शुरू किया। यह राशि कोलकाता स्थित UCO Bank में ईरान के खातों में जमा की जाती थी। कुछ मामलों में IDBI बैंक का भी उपयोग हुआ।
ईरान इन रुपयों का इस्तेमाल भारत से सामान खरीदने में करता था। इसमें दवाइयाँ, चावल, गेहूं, चाय और अन्य कृषि उत्पाद शामिल थे। इस तरह प्रतिबंधों के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार जारी रहा।
कितनी थी जमा राशि?
विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, उस समय ईरान के खातों में जमा राशि भारतीय मुद्रा में लगभग ₹60,000 करोड़ तक बताई गई। हालांकि कुछ स्रोतों में इससे कम या ज्यादा आंकड़े भी सामने आए, लेकिन आम तौर पर यही सीमा चर्चित रही। यह राशि ‘फ्रीज’ नहीं थी, बल्कि ईरान के ही खातों में जमा थी। रुपये में होने के कारण ईरान इसे वैश्विक बाजार में सीधे इस्तेमाल नहीं कर सकता था, इसलिए भारत से ही सामान खरीदना उसके लिए व्यावहारिक विकल्प था।
दोनों देशों को हुआ फायदा
इस व्यवस्था से भारत को स्थिर तेल आपूर्ति मिलती रही और विदेशी मुद्रा की बचत भी हुई। वहीं ईरान को प्रतिबंधों के बावजूद जरूरी वस्तुएं मिलती रहीं। उस समय यह मॉडल प्रतिबंधों के बीच व्यावहारिक समाधान के रूप में देखा गया।
बाद में 2015-16 में परमाणु समझौते (JCPOA) के बाद कुछ प्रतिबंधों में ढील मिली। लेकिन 2018-19 में अमेरिका द्वारा दोबारा सख्ती किए जाने पर भारत ने ईरान से तेल आयात काफी कम कर दिया।
यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि कठिन वैश्विक परिस्थितियों में भी भारत और ईरान ने संतुलित और व्यावहारिक रास्ता निकालकर व्यापारिक संबंध बनाए रखे। इसे दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही आर्थिक और कूटनीतिक साझेदारी का अहम अध्याय माना जाता है।




