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ओडिशा में अपराध दर में बढ़ोत्तरी: विधानसभा में उठी चिंता, महिलाओं की सुरक्षा बनी प्राथमिक चुनौती

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जनवरी 2025 में ओडिशा की राजनीति और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन गया वह आंकड़ा, जो मुख्यमंत्री मोहन मांझी ने 18 जनवरी को राज्य विधानसभा में प्रस्तुत किया। यह कोई साधारण अपराध रिपोर्ट नहीं थी, बल्कि राज्य की सामाजिक संरचना में हो रहे गंभीर परिवर्तन और कानून व्यवस्था की नींव को डगमगाते हुए दर्शाने वाला आईना था। मुख्यमंत्री ने सदन में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि राज्य में अपराध दर में चिंताजनक वृद्धि हुई है, और सबसे पीड़ादायक तथ्य यह कि इस वृद्धि का बड़ा हिस्सा महिलाओं और बच्चों को केंद्र में रखे हुए है। 

रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 के पहले पंद्रह दिनों में ही ओडिशा में सड़क अपराधोंजैसे छेड़छाड़, मोबाइल स्नैचिंग, चोरी और लूटमें 23% तक वृद्धि दर्ज की गई। लेकिन इससे भी गंभीर पहलू यह रहा कि राज्य में दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के मामलों में भी भारी उछाल देखा गया है। महिला आयोग और हेल्पलाइन 181 पर प्राप्त शिकायतों की संख्या में 30% की बढ़ोत्तरी राज्य के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में भी दर्ज की गई, जिससे स्पष्ट होता है कि यह संकट केवल शहरी दायरे तक सीमित नहीं है। कोरापुट, बालासोर और कटक जैसे जिलों में दहेज के लिए महिलाओं के उत्पीड़न के मामले सबसे अधिक सामने आए हैं, जो राज्य की सामाजिक चेतना के लिए गंभीर प्रश्नचिह्न हैं। 

राज्य सरकार की इस स्वीकारोक्ति पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप महांती ने कहा कि आँकड़ों की घोषणा तब तक बेमानी है जब तक जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई न हो।उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि कई अपराधों में राजनीतिक संरक्षण या पुलिस की निष्क्रियता के कारण पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने राज्य में क्राइम कंट्रोल मिशनकी माँग उठाई है, जिसके तहत न केवल अपराधियों पर कार्रवाई हो, बल्कि महिला सुरक्षा के लिए विशेष टास्क फोर्स, पंचायत स्तर पर निगरानी समितियाँ और न्यायिक फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसी व्यवस्थाएं लागू की जाएं। 

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जो चिंताएं उठी हैं, वे केवल आँकड़ों तक सीमित नहीं रहीं। सामाजिक संगठनों और महिला कार्यकर्ताओं ने यह चिंता जताई है कि पीड़ित महिलाएं अभी भी थानों में न्याय के लिए संघर्ष कर रही हैं और कई बार उन्हें एफआईआर दर्ज कराने में हफ्तों लग जाते हैं। थानों में महिला डेस्क की संख्या सीमित है और कई ग्रामीण क्षेत्रों में तो अब भी यह सुविधा सैद्धांतिक स्तर तक ही सीमित है। राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री ने यह स्वीकार किया कि केवल पुलिसिंग से यह समस्या हल नहीं होगीइसके लिए सामाजिक स्तर पर संवेदनशीलता और कानूनी जागरूकता दोनों को समान रूप से बढ़ावा देना होगा। 

मुख्यमंत्री मोहन मांझी ने अंत में यह स्पष्ट किया कि सरकार अब तीन मोर्चों पर काम करेगीएक, पुलिस तंत्र को तकनीकी रूप से मजबूत करना ताकि अपराधों की रियल टाइम मॉनिटरिंग हो सके; दो, ग्राम पंचायत स्तर पर महिला सुरक्षा समितियाँ गठित कर लोगों को प्रत्यक्ष निगरानी में जोड़ा जाए; और तीन, स्कूलों व कॉलेजों में जागरूकता अभियानचलाए जाएं ताकि किशोरवय से ही संवेदनशील समाज का निर्माण हो सके। इसके अतिरिक्त, राज्य सरकार जल्द ही विशेष अदालतों की स्थापना की दिशा में भी कदम उठाएगी, जिससे दहेज, घरेलू हिंसा और यौन शोषण जैसे मामलों का तीन माह के भीतर निपटारा सुनिश्चित किया जा सके। 

जनवरी 2025 का यह घटनाक्रम यह साबित करता है कि अपराध केवल कानून का विषय नहीं, समाज की संवेदनशीलता, न्याय प्रणाली की तत्परता और शासन की प्रतिबद्धता का सामूहिक परीक्षण है। अगर ओडिशा को सुरक्षित, सशक्त और न्यायपूर्ण बनाना है, तो यह कार्य केवल पुलिस या सरकार का नहीं बल्कि पूरे समाज का है। यही वह समय है जब राज्य को एकजुट होकर यह तय करना होगा कि भय, हिंसा और अन्याय को नहीं, बल्कि सम्मान, समानता और सुरक्षा को अपनी पहचान बनाना है। 

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