नई दिल्ली
29 जुलाई 2025
संसद के मॉनसून सत्र में मंगलवार का दिन तीखे राजनीतिक तंजों, गूंजते नारों और गंभीर राष्ट्रीय मुद्दों की बहस के नाम रहा। इस बीच समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बयान चर्चा का केंद्र बन गया। उन्होंने सरकार की विदेश नीति, आतंकी घटनाओं पर प्रतिक्रिया, और भीतरघात जैसे संवेदनशील विषयों पर सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए एक काव्यात्मक तंज कसा — “मैं दुनिया को मनाने में लगा हूं, मेरा घर मुझसे रूठा जा रहा है।” यह वाक्य, बार-बार दोहराकर, उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की कथनी और करनी पर सवाल उठाए।
अखिलेश यादव ने पहलगाम में हाल ही में हुए आतंकी हमले और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की चर्चा के दौरान कहा कि जब देश एक गंभीर आतंकी चुनौती से गुजर रहा था, तब सरकार की ओर से कोई स्पष्ट और निर्णायक नीति सामने नहीं आई। उन्होंने पूछा कि आखिर सीजफायर का ऐलान किसके कहने पर किया गया? तंज कसते हुए उन्होंने कहा, “इनकी मित्रता बहुत है, इन्होंने अपने मित्र से ही कह दिया कि आप ही सीजफायर की घोषणा कर दीजिए, हमारा तो कोई काम ही नहीं है।” उनका इशारा स्पष्ट रूप से पाकिस्तान और कुछ वैश्विक ताकतों के प्रति सरकार की नर्म नीति की ओर था।
उन्होंने कहा कि जब ऑपरेशन चल रहा था, तब कुछ न्यूज़ चैनलों ने अति उत्साह में यहां तक कह दिया कि ‘कराची हमारा हो गया’, तो किसी ने दावा कर दिया कि ‘हमने दुश्मन को पकड़ लिया’। अखिलेश ने इस प्रचारवादी रवैये की आलोचना करते हुए इसे “राष्ट्रीय सुरक्षा पर मनोरंजन का आवरण” बताया और कहा कि सेना की सच्ची वीरता को इस तरह के ड्रामे में उलझाना निंदनीय है।
सपा प्रमुख ने अपने संबोधन में पुलवामा हमले में खुफिया तंत्र की विफलता का मुद्दा भी उठाया और सवाल किया कि “आखिर ये जिम्मेदारी किसकी है?” उन्होंने कहा कि बार-बार खुफिया नाकामी सामने आ रही है और सरकार इससे कोई सबक नहीं ले रही। विपक्ष की भूमिका की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “जब सरकार कुछ नहीं करती, तब हम पूछते हैं, तो हमें देशद्रोही कहा जाता है, लेकिन सवाल पूछना देशप्रेम है।”
अखिलेश ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि बनाने में लगी है, जबकि घरेलू मोर्चे पर आम जनता, किसान, बेरोजगार युवा, व्यापारी और यहां तक कि सहयोगी दल भी सरकार से नाखुश हैं। उन्होंने कहा, “आजादी के अमृतकाल का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि देश के भीतर आर्थिक असमानता और असुरक्षा की स्थिति बढ़ रही है।”
उन्होंने सरकार से यह भी जवाब मांगा कि पाकिस्तान के पीछे आखिर कौन-सी ताकतें खड़ी हैं, और चीन जैसे विषयों पर वह कितनी तैयारी और गंभीरता से काम कर रही है? अखिलेश ने आरोप लगाया कि देश की सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्थिरता के तीनों मोर्चों पर सरकार विफल साबित हो रही है।
विपक्ष का हल्ला, सत्ता पक्ष की घेराबंदी
अखिलेश यादव के इस भाषण के बाद विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी हमलावर रुख अपनाया, वहीं सत्ता पक्ष ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि विपक्ष राष्ट्रहित के मुद्दों को भी राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रहा है। हालांकि अखिलेश के तंज ने यह जरूर सिद्ध किया कि संसद में सरकार को अब हर मोर्चे पर जवाबदेही से गुजरना होगा।
अखिलेश यादव का यह बयान महज एक शेर नहीं था, बल्कि एक गहरी राजनीतिक चेतावनी थी — कि भारत सरकार को अब केवल वैश्विक मंचों पर भाषण देने से नहीं, बल्कि अपने ही देश की जनता की अपेक्षाओं और पीड़ाओं को सुनने, समझने और उसका समाधान करने की ओर ध्यान देना चाहिए। संसद के इस सत्र में एक और बात स्पष्ट हुई — सवाल पूछे जा रहे हैं, और अब जवाब देने का वक्त है।




