नई दिल्ली, 25 अक्टूबर 2025
आज का भारत “सबका साथ, सबका विकास” के दावों के बीच उस कड़वे सच से गुजर रहा है जहाँ मुसलमान सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गया है, लेकिन सत्ता की भागीदारी से वंचित है। वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा का यह सवाल — “क्या इस देश में किसी मुसलमान का मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री बनना अब भी संभव है?” — उस लोकतांत्रिक ढांचे की आत्मा पर चोट करता है, जो समानता और प्रतिनिधित्व पर टिका हुआ था। यह सवाल केवल किसी एंकर की बहस या किसी पार्टी की नीति का विरोध नहीं, बल्कि उस सड़ी हुई राजनीतिक मानसिकता की पोल खोलता है, जिसने मुसलमान को नागरिक नहीं, सांकेतिक आंकड़ा बना दिया है — एक ऐसा आंकड़ा जो वोट देने तक तो स्वीकार्य है, मगर सत्ता में बैठने के लायक नहीं समझा जाता। यह वही “नॉन-बायोलॉजिकल राज” है — जहाँ लोकतंत्र शरीर से तो जिंदा है, पर आत्मा से मर चुका है; जहाँ संविधान किताबों में है, लेकिन समान अवसर अब धर्म की दीवारों में कैद हैं।
एक वो समय था….
एक समय था जब यह देश मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे शिक्षा मंत्री, फ़ख़रुद्दीन अली अहमद जैसे राष्ट्रपति, या ज़ाकिर हुसैन जैसे उप-राष्ट्रपति से लेकर मोहम्मद यूनुस सलीम जैसे विधि मंत्री, या मोहम्मद शफ़ी क़ुरैशी जैसे रेल मंत्री तक पर गर्व करता था। यह वह भारत था जिसने ए.आर. अंतुले और अब्दुल गफूर जैसे शक्तिशाली मुस्लिम मुख्यमंत्रियों को देखा, जिन्होंने न केवल मुस्लिम दलितों, आदिवासियों और गरीबों के लिए ठोस कार्य किए। लेकिन आज, उसी देश में, यह सवाल पूछना पड़ रहा है कि क्या सत्ता की शीर्ष सीढ़ियों पर उनके लिए कोई जगह बची है? यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि एक समुदाय का राजनीतिक नरसंहार है।
‘कभी नहीं देंगे’: सत्ताधारी पार्टी का खुलेआम बहिष्कार और लोकतांत्रिक विश्वासघात
जब सत्ता के गलियारों से यह भयानक सच खुलेआम गूंजता है, तो देश के आम मुसलमान पर क्या बीतती होगी? राष्ट्रीय जनता दल की प्रवक्ता प्रियंका भारती ने जो खुलासा किया, वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मनाक है। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने भाजपा प्रवक्ताओं से पूछा कि “मुसलमानों को कितने टिकट दिए?”, तो जवाब मिला — “कभी नहीं देंगे, क्योंकि ये समुदाय हमें वोट नहीं करता।” यह केवल एक चुनावी रणनीति या जवाब नहीं था, यह करोड़ों नागरिकों को दी गई सामूहिक सज़ा थी। एक पूरी आबादी को, जो इस देश की मिट्टी की उपज है, यह कहकर ठुकरा देना कि ‘तुम हमें वोट नहीं देते, इसलिए तुम प्रतिनिधित्व के हकदार नहीं हो’ — यह किस संविधान की बात करता है? यह नागरिकता को वोट के बदले मिलने वाले अनुबंध में बदल देने का घिनौना प्रयास है।
नीरजा जैसी सोशलिस्टों का कहना सही है कि जब सत्ताधारी पार्टी खुलेआम मुसलमानों को टिकट न देने की घोषणा करती है, तो यह स्पष्ट है कि उन्हें कैसा लोकतंत्र चाहिए — जिसमें सब हों, मगर बराबरी न हो! आज मुसलमान वोट डाल सकता है, कर चुका सकता है, सीमा पर शहीद हो सकता है, लेकिन सत्ता में उनकी मौजूदगी को लगभग गायब कर दिया गया है — हर जगह एक ‘अनदेखी का सन्नाटा’ पसरा है। यह राजनीतिक पतन हमें उस देश से दूर ले जा रहा है जिसे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने धर्मनिरपेक्षता के स्तंभों पर खड़ा किया था, और यह एक पूरी कौम को ‘सेकेंड क्लास सिटिजन’ घोषित करने जैसा है।
नफरत के सौदागर और प्रधानमंत्री का ‘कपड़ों से पहचानो’ का ज़हर
आज देश की राजनीति में नफरत के सौदागरों का बोलबाला है, जो खुलेआम ज़हर उगलते हैं। गिरिराज सिंह जैसे नेता जब “मुसलमान देश दुश्मन हैं” कहते हैं, देवेश ठाकुर जब “हमें मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए, क्योंकि वो गद्दार हैं” कहते हैं, या अनुराग ठाकुर जब “देश के गद्दारों को गोली मारो…” जैसे हिंसक नारे लगवाते हैं, तो यह सिर्फ जुबान की फिसलन नहीं होती — यह सत्ता द्वारा प्रायोजित सामूहिक घृणा का प्रदर्शन होता है। और सबसे निंदनीय तब होता है जब चुनावों में इन्हीं मुसलमानों से ये नेता “एकता” और “विकास” की बात करने का ढोंग करते हैं। किस विकास की बात? किसकी एकता की बात? जब देश का प्रधानमंत्री खुद सार्वजनिक मंचों से “कपड़ों से पहचानने” की बात करता है, तो फिर बाकी नेताओं से इंसाफ की उम्मीद करना खुद के साथ मज़ाक करना है।
यह बताता है कि सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे लोग भी मुस्लिम समुदाय को दूसरे दर्जे का नागरिक मानते हैं। सोशल मीडिया पर एक शख्स की यह पीड़ा बिल्कुल सच्ची है: “जब हमारे प्रधानमंत्री और उनके साथी हमारे वजूद का मज़ाक उड़ाते हैं, हमारी मौत पर ठहाके लगाते हैं, तो फिर वे किस मुंह से हमारे वोट मांगने आएंगे?” यह सवाल किसी गुस्से से नहीं, बल्कि गहरी पीड़ा और टूटे हुए विश्वास से उठा है, क्योंकि एक इंसान को बार-बार यह जताने से कि वह ‘कमतर’ है, उसका भरोसा नहीं, उसका दिल और राष्ट्र पर उसका अधिकार टूटता है।
भारत किसी की जागीर नहीं: डर नहीं, अब शर्म महसूस करने का वक्त
यह लड़ाई किसी एक पार्टी या धर्म के लिए नहीं है; यह सीधे तौर पर इस देश की आत्मा और इसके लोकतांत्रिक भविष्य के लिए है। भारत किसी एक धर्म या जाति की जागीर नहीं है; यह एक साझा मिट्टी है, जिसकी ताकत उसकी अंतर्निहित विविधता में है। यह वही महान देश है जहाँ सदियों से मंदिर की घंटी और मस्जिद की अज़ान एक ही गली में गूंजती रही है, जहाँ सूफी और संतों ने साथ मिलकर इंसानियत का फूल खिलाया।
आज़ादी की लड़ाई में हजारों मुसलमानों ने अपनी जान दी — शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ान, मौलाना हसरत मोहानी, डॉ. सैफ़ुद्दीन किचलू जैसे अनगिनत नाम हैं। फिर आज वही लोग सवालों के घेरे में क्यों हैं? यह वक्त है कि हम एक राष्ट्र के रूप में आईना देखें — और डर नहीं, बल्कि शर्म महसूस करें। अगर आज कोई नागरिक यह कह रहा है कि “मैं मुसलमान हूँ, इसलिए मुझे मौका नहीं मिलेगा” तो इसका सीधा अर्थ है कि हमने अपने लोकतंत्र की रूह को बेच दिया है और अपने संविधान को मलबे में बदल दिया है। उम्मीद अभी भी बाकी है, क्योंकि भारत अभी मरा नहीं है। यह दर्द ही वह उम्मीद की चिंगारी है जो लोगों को सवाल पूछने, बोलने और जवाब मांगने पर मजबूर कर रही है।
शी लोकतंत्र की अंतिम लड़ाई: जब एक-दूसरे की आवाज़ बनेंगे नागरिक
अगर आज कोई एंकर अपने चैनल पर यह सवाल पूछ रहा है कि “क्या मुसलमान मुख्यमंत्री बन सकता है?” तो यह सवाल ही हमारे लोकतांत्रिक पतन का सबसे बड़ा सबूत है। इस सवाल का जवाब केवल एक होना चाहिए, और वह भी दहाड़ के साथ — “हाँ, क्यों नहीं! अगर यह भारत है, तो हर नागरिक को प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री बनने का उतना ही अधिकार है जितना किसी और को।” लोकतंत्र तब तक जीवित नहीं रह सकता जब तक हम एक समुदाय को चुप कराने पर ताली बजाते रहेंगे।
लोकतंत्र तभी बचेगा, जब हम एक-दूसरे की आवाज़ बनेंगे, और किसी समुदाय को राजनीतिक रूप से अपंग बनाने की कोशिशों का डटकर विरोध करेंगे। अगर इस स्पष्ट, संवैधानिक जवाब को सुनकर किसी सत्ताधारी या उसके समर्थक को तकलीफ़ होती है, तो यह समझ लेना चाहिए कि बीमारी मुसलमानों में नहीं, बल्कि उनकी संकीर्ण, घृणित और राष्ट्र-विरोधी सोच में है। यह सोच देश के भविष्य के लिए कैंसर के समान है, जिसे आज ही उखाड़ फेंकने की ज़रूरत है।




