मनोज कुमार राय | रांची 24 दिसंबर 2025
झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) की लगभग 9.65 एकड़ कीमती सरकारी ज़मीन आज एक ऐसे विवाद के केंद्र में है, जिसने न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही बल्कि दशकों से चले आ रहे तंत्र के भ्रष्ट और सुस्त चेहरे को भी बेनकाब कर दिया है। मंदिर, बाजार, अपार्टमेंट और कच्चे-पक्के मकानों के रूप में फैला यह अतिक्रमण अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे करीब 60 साल की चुप्पी, ढिलाई और मिलीभगत की कहानी छिपी है।
रिम्स की नींव वर्ष 1960 में रखी गई थी और यह संस्थान 1965 से अस्तित्व में आया। वर्ष 2002 में इसे अपग्रेड कर RIMS बनाया गया, जो आज पूरे झारखंड ही नहीं, आसपास के राज्यों के मरीजों के लिए जीवनरेखा है। लेकिन जिस ज़मीन पर यह संस्थान खड़ा है, उसी ज़मीन के एक बड़े हिस्से को लेकर अब झारखंड हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाईकोर्ट ने दिसंबर 2025 में सख्त आदेश देते हुए अवैध कब्जे हटाने और जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
पहला दोषी: सिस्टम की शुरुआती चूक
1960 से 1968 के बीच रिम्स के लिए ज़मीन का कानूनी अधिग्रहण किया गया था। बिहार सरकार (तत्कालीन) ने जमीन चिन्हित कर अधिग्रहण किया और जमीन मालिकों को मुआवजा भी दिया—किसी को 500 रुपये, किसी को 1000 रुपये। कागजों में जमीन रिम्स को सौंप दी गई, लेकिन हकीकत यह है कि रिम्स प्रशासन ने उस जमीन पर कभी वास्तविक कब्जा ही नहीं लिया।
डीआईजी ग्राउंड और आसपास की जमीन को लेकर पत्राचार तो हुआ, लेकिन वह फाइलों में ही दबकर रह गया। न घेराबंदी हुई, न सीमांकन और न ही निगरानी। नतीजा यह हुआ कि जिन गांवों की जमीन अधिग्रहित हुई थी, वहां के लोग मुआवजा लेकर फिर से खेती करने लगे और रहने लगे—बिल्कुल वैसे ही, जैसे कभी बोकारो के तेतुलिया में हुआ था।
दूसरा दोषी: समय और पीढ़ियों की लापरवाही
समय बीतता गया। जमीन देने वाले परिवारों की तीन पीढ़ियां गुजर गईं। रिम्स उस जमीन को कभी अपने नियंत्रण में नहीं ले सका। नतीजतन, करीब 75 प्रतिशत जमीन पर लोगों ने घर बना लिए, खेती होती रही और कब्जा मजबूत होता गया। इसी बीच, कुछ लोगों ने मौके का फायदा उठाते हुए करीब 25 प्रतिशत जमीन बेच दी।
तीसरा दोषी: कागज़ी खेल और प्रशासनिक मंजूरी
क्योंकि जमीन का टाइटल और जमाबंदी अब भी मूल जमीन मालिकों के नाम पर चल रही थी, इसलिए 25 प्रतिशत जमीन की रजिस्ट्री कराना आसान हो गया।
2019-20 में दाखिल-खारिज के लिए आवेदन संख्या 2101/2019-20 दी गई। बड़गाईं अंचल के तत्कालीन अंचल अधिकारी श्लेष सिन्हा ने 17 फरवरी 2020 को इस आवेदन को खारिज कर दिया।
लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी। इसके खिलाफ अपील डीसीएलआर मनोज कुमार रंजन के यहां की गई, जहां 20 मार्च 2020 को दाखिल-खारिज को स्वीकृति दे दी गई और म्यूटेशन निर्गत हो गया। सवाल यह है कि जब जमीन अधिग्रहित थी, तो यह स्वीकृति किस आधार पर दी गई?
इसके बाद खाता संख्या 107, प्लॉट संख्या 1693 को लेकर जमीन मोराबादी क्षेत्र में मान ली गई। नगर निगम ने म्यूटेशन, रसीद और क्षेत्रफल का हवाला देते हुए 2021 में नक्शा पास कर दिया, और यहीं से अपार्टमेंट और पक्के निर्माण का रास्ता पूरी तरह खुल गया।
हाईकोर्ट का सख्त संदेश
झारखंड हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि जिन लोगों के पूर्वजों ने मुआवजा ले लिया था, उन्हें उस जमीन पर रहने या कब्जा बनाए रखने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे निर्माण तोड़ दिए जाएंगे और जमीन खाली करानी होगी, बिना किसी अतिरिक्त मुआवजे के।
जो लोग जमीन बेचकर निकल चुके हैं और जहां अपार्टमेंट बन चुके हैं, उनके मामले में सरकार जांच के बाद मुआवजा देने पर विचार करेगी—लेकिन यह पैसा भी उन्हीं दोषियों से वसूला जाएगा, जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर यह पूरा खेल रचा।
अब जांच के घेरे में अधिकारी और बिल्डर
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब इस पूरे मामले में एसीबी (भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो) जांच करेगी। दाखिल-खारिज, रजिस्ट्री, नक्शा पास, नगर निगम की भूमिका—हर बिंदु की जांच होगी। दोषी अधिकारियों और बिल्डरों पर एफआईआर दर्ज होगी, और एसीबी की रिपोर्ट के बाद सरकार आगे मुआवजा और कार्रवाई पर फैसला लेगी। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि यदि जरूरत पड़ी तो सीबीआई जांच का विकल्प भी खुला रहेगा।
रिम्स की 9.65 एकड़ जमीन का यह मामला सिर्फ अतिक्रमण का नहीं, बल्कि सिस्टम की सामूहिक विफलता का आईना है—जहां सरकार, प्रशासन और संस्थान की लापरवाही ने मिलकर सरकारी संपत्ति को निजी फायदे का जरिया बना दिया। अब देखना यह है कि हाईकोर्ट की सख्ती और एसीबी की जांच इस जमीन घोटाले में कितनी बड़ी मछलियों को पकड़ पाती है। अगली सुनवाई जनवरी 2026 में होगी, और तब शायद इस सवाल का जवाब भी साफ होगा—आखिर रिम्स की जमीन के इस खेल का असली दोषी कौन है?




