दिल्ली सरकार पर शिक्षा के भगवाकरण का आरोप अब नारा नहीं, सच्चाई बन चुका है। जिस सरकार ने कभी खुद को “शिक्षा मॉडल” की मिसाल बताया था, वही अब आरएसएस के “राष्ट्रनीति पाठ्यक्रम” को लागू कर शिक्षा के मंदिरों को विचारधारा के अखाड़े में बदल रही है। यह वही सरकार है जो कल तक बच्चों को “वैज्ञानिक सोच” सिखाने की बात करती थी, और आज उन्हीं बच्चों के मस्तिष्क में “संघ की शाखा” का पाठ भरने पर आमादा है। छात्र संगठन SFI (Students’ Federation of India) ने इस कदम को लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला बताते हुए दिल्ली सरकार की नीतियों को “फासीवादी एजेंडा” करार दिया है।
शिक्षा नहीं, ब्रेनवॉश की फैक्ट्री बना रही है दिल्ली सरकार
SFI का साफ कहना है कि दिल्ली सरकार शिक्षा के नाम पर वैचारिक गुलामी फैला रही है। ‘राष्ट्रनीति’ नाम का यह कोर्स, सुनने में जितना राष्ट्रवादी लगता है, असल में उतना ही जहरीला है। इसमें बच्चों को जिज्ञासा, विज्ञान और सत्य की जगह भ्रम, अंधभक्ति और झूठा गौरव पढ़ाया जाएगा। यह कोर्स विद्यार्थियों को सोचने वाला नागरिक नहीं, आदेश मानने वाला अनुयायी बनाने की साजिश है। SFI ने कहा — “शिक्षा का अर्थ है सवाल करना, लेकिन दिल्ली सरकार अब चाहती है कि बच्चे सिर्फ वही सुनें जो संघ सुनाना चाहता है।”
यह फैसला केवल पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं, भारत के भविष्य पर कब्ज़े की रणनीति है। जब बच्चों को RSS की चश्मे से इतिहास दिखाया जाएगा, तो वे यह नहीं जान पाएंगे कि RSS ने कभी भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया, संविधान का विरोध किया, और त्रिरंगा झंडा फहराने से इनकार किया। यही असली उद्देश्य है — इतिहास को विकृत करना, ताकि सच का कोई निशान न बचे। संघ जिस माफीवीर का गुणगान करती है वो सावरकर वही हैं जिन्होंने 6 बार अंग्रेजों से माफी मांगी और जेल से छूटने के बाद अंग्रेजों से 60 रुपए महिने की पेंशन खाते रहे।
सावरकर का नाम “माफीवीर” के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर रहेगा जिसने अंग्रेजों के आगे घुटने टेके, उनके पैसे पर जीवन बिताया और देश का विभाजन कराया। सावरकर ने टू नेशन थ्योरी के माध्यम से कट्टरवादी हिन्दुओं को भड़काया और अंत में नैतिक रूप से सावरकर गांधी के हत्यारों के पीछे का मस्तिष्क के तौर पर जाने गए। कपूर आयोग ने साफ कहा था कि “It is proved that the murder of Mahatma Gandhi was conceived in the mind of Vinayak Damodar Savarkar.”(Justice J.L. Kapur Commission Report, 1969)
RSS की “पाठशाला” बनते स्कूल — SFI का तीखा हमला
SFI ने दिल्ली सरकार को सीधा निशाने पर लेते हुए कहा कि यह पूरी योजना RSS और संघ परिवार के इशारे पर तैयार की गई है। इस “राष्ट्रनीति” के नाम पर बच्चों के दिमागों में एक विचारधारा का बीज बोया जा रहा है जो संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है।
SFI ने सवाल उठाया — क्या दिल्ली सरकार बताएगी कि “राष्ट्रनीति” पढ़ाने वाले शिक्षक कौन हैं? क्या ये वही लोग हैं जो गांधी की हत्या करने वाले विचारों का गुणगान करते हैं? क्या अब बच्चों को यह सिखाया जाएगा कि सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगना देशभक्ति है और गांधी का सत्याग्रह देशद्रोह?
SFI का बयान स्पष्ट है — “यह शिक्षा नहीं, यह विचारों की हत्या है। यह पाठ्यक्रम बच्चों को सोचने से रोकने और उन्हें संघ की शाखा में बदलने की कोशिश है। दिल्ली सरकार अब शिक्षा नहीं, संघ का एजेंडा चला रही है।”
दिल्ली सरकार बन गई RSS की सेवा समिति
SFI ने रेखा गुप्ता सरकार पर सबसे गंभीर आरोप लगाया है कि वह अब RSS की “राजनीतिक प्रयोगशाला” में बदल चुकी है। SFI ने कहा — “RSS का उद्देश्य हमेशा से ही भारत के संविधान की आत्मा को बदलना रहा है। और अब दिल्ली सरकार उसी एजेंडे को लागू कर रही है, जिसका लक्ष्य है धर्मनिरपेक्षता को खत्म करना और हर कक्षा में ‘हिंदू राष्ट्र’ का नारा गूंजाना।”
SFI की चेतावनी — “हम सड़कों पर उतरेंगे”
SFI ने साफ कहा है कि वह इस कोर्स को किसी भी कीमत पर लागू नहीं होने देगा। छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों से अपील की गई है कि वे इस “शिक्षा की आड़ में विचारधारा के ज़हर” के खिलाफ आवाज़ उठाएं।
छात्र संगठन ने कहा — “हम हर स्कूल, हर कक्षा, हर गली में जाकर यह बताएंगे कि RSS की सच्चाई क्या है। जब तक यह कोर्स वापस नहीं लिया जाता, हमारा आंदोलन जारी रहेगा। हम अपने बच्चों को संघ का प्रचारक नहीं बनने देंगे। शिक्षा, प्रचार नहीं — यह हमारा संघर्ष है।”
SFI ने यह भी कहा कि यदि दिल्ली सरकार ने “राष्ट्रनीति” वापस नहीं ली, तो आंदोलन राजधानी से निकलकर देशव्यापी होगा। “हम यह लड़ाई सिर्फ पाठ्यक्रम के लिए नहीं, भारत के संविधान और बच्चों के स्वतंत्र विचार के अधिकार के लिए लड़ेंगे,” SFI नेताओं ने कहा।
शिक्षा की हत्या का ब्लूप्रिंट तैयार हो चुका है
दिल्ली सरकार का यह फैसला सिर्फ एक पाठ्यक्रम का बदलाव नहीं, बल्कि पूरे भविष्य की दिशा बदलने की साजिश है। जब बच्चों के दिमागों में विचारधारा के रंग भरे जाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ सवाल पूछना भूल जाएँगी। यही फासीवाद की असली जीत होगी — जब किताबें प्रचार बन जाएँ और शिक्षा “सेवा” का नहीं, “समर्पण” का पाठ पढ़ाने लगे।
दिल्ली सरकार को याद रखना चाहिए —भारत के स्कूल संविधान की भूमि पर खड़े हैं, संघ के मंच पर नहीं।
और अगर यह पाठ्यक्रम वापस नहीं लिया गया, तो SFI और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले हर नागरिक की कलम, सड़क और आवाज़ मिलकर इस वैचारिक आक्रमण को ध्वस्त करेगी।




