Home » Entertainment » “मैं भगवान में नहीं मानता”—राजामौली के बयान पर FIR, आस्था बनाम अभिव्यक्ति की जंग

“मैं भगवान में नहीं मानता”—राजामौली के बयान पर FIR, आस्था बनाम अभिव्यक्ति की जंग

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

सुमन कुमार | हैदराबाद 18 नवंबर 2025

फिल्म निर्देशक एस. एस. राजामौली, जो भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े नामों में शुमार हैं और जिनकी फिल्में बाहुबली और RRR भारतीय पौराणिक सौंदर्य, वीरगाथाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों की वैश्विक पहचान बन चुकी हैं, अब एक बड़े धार्मिक–सामाजिक विवाद के केंद्र में आ गए हैं। वाराणसी में अपनी नई फिल्म के प्रमोशनल कार्यक्रम के दौरान उन्होंने एक मंच पर कहा—“मैं भगवान में विश्वास नहीं करता”। यह वाक्य, जो संभवतः एक सहज वक्तव्य और व्यक्तिगत दार्शनिक दृष्टिकोण का हिस्सा था, कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया से लेकर धार्मिक समूहों तक में तूफ़ान की तरह फैल गया। विशेष रूप से इसलिए कि यह बात उस व्यक्ति के मुंह से आई है जिसकी फिल्मों में देवताओं, महापुरुषों, वीरों और पौराणिक तत्वों की भव्य प्रस्तुति देखी जाती रही है। जैसे ही यह बयान वायरल हुआ, धार्मिक संगठनों ने इसे “हनुमान जी के प्रति अनादर” और “हिंदू आस्था का अपमान” बताते हुए सख़्त आपत्ति जतानी शुरू कर दी, जिसके बाद इसके खिलाफ FIR दर्ज हो गई।

राजामौली ने अपने बयान में यह भी जोड़ते हुए कहा कि उनके पिता ने अक्सर उन्हें यह कहकर प्रोत्साहित किया कि “हनुमान तुम्हारे पीछे खड़े हैं, वे तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहे हैं”, लेकिन वह कभी इस बात को व्यक्तिगत रूप से सत्य नहीं मान पाए। उन्होंने कहा—“मेरी पत्नी हनुमान की भक्त है, वह उनसे प्रेम से बात करती है, लेकिन मैं कभी इस विश्वास का हिस्सा नहीं बना।” यह कथन धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोपों में बदल गया। कई संगठनों ने शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि राजामौली ने न केवल भगवान में अविश्वास जताया, बल्कि हनुमान से जुड़े भक्तिभाव और आध्यात्मिक संवेदना का मज़ाक उड़ाया। इन संगठनों का तर्क है कि कोई भी व्यक्ति निजी रूप से नास्तिक हो सकता है, लेकिन यदि वह सार्वजनिक मंच पर किसी भगवान या धार्मिक परंपरा को चुनौती देता है, तो यह सामुदायिक भावनाओं को आहत करने के दायरे में आता है। शिकायतकर्ताओं ने IPC की धारा 295A के तहत कार्रवाई की मांग की है, जिसका उपयोग अक्सर “जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने” के मामलों में किया जाता है।

मामले की गंभीरता इस वजह से और बढ़ गई है कि राजामौली पिछले एक दशक से भारतीय सांस्कृतिक कथा–परंपरा को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने वाले सबसे प्रभावशाली फिल्मनिर्माताओं में से एक माने जाते हैं। बाहुबली में शिव–भक्ति के दृश्य, RRR में राम–हनुमान प्रतीकवाद, और उनके सिनेमाई ब्रह्मांड में धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी दृश्यावली ने यह छवि स्थापित की है कि राजामौली भारतीय मिथक और संस्कृति के प्रति श्रद्धा से प्रेरित कहानीकार हैं। ऐसे में जब वही व्यक्ति सार्वजनिक मंच पर कहता है कि वह “भगवान में विश्वास नहीं रखता”, तो यह विवाद केवल व्यक्तिगत आस्था का नहीं, बल्कि उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व और कथात्मक जिम्मेदारियों का भी बन जाता है। विरोधियों का कहना है कि यह “दोहरी मानसिकता” है—फिल्मों में भगवान बेचकर पैसा कमाना और मंच पर भगवान को नकार देना। जबकि समर्थकों का कहना है कि कला और व्यक्तिगत आस्था अलग चीजें हैं और एक कलाकार का अधिकार है कि वह अपनी आत्मिक मान्यताओं को अलग रखकर मिथकीय कहानियाँ रचे।

यह विवाद भारत के उस पुराने सवाल को फिर से गर्म कर देता है जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक संवेदनशीलता आमने–सामने खड़ी हो जाती हैं। क्या किसी व्यक्ति को यह कहने का अधिकार है कि वह ईश्वर में विश्वास नहीं करता? जी हाँ, संविधान की दृष्टि से यह अधिकार मूलभूत है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सार्वजनिक मंच पर ऐसा कथन धार्मिक भावनाओं को भड़काने या आघात पहुंचाने की श्रेणी में आता है? भारतीय न्यायालयों ने अतीत में कई ऐसे मामलों में कहा है कि “नास्तिक होना अपराध नहीं”—लेकिन “ईश्वर या धार्मिक प्रतीकों का अपमान” अपराध हो सकता है, यदि उसमें जानबूझकर अपमान का भाव हो। यही वजह है कि राजामौली की बात पर पुलिस ने शिकायत तो दर्ज कर ली है, लेकिन अब यह जांच का विषय बनेगा कि क्या उनका बयान “निजी राय” था या “धार्मिक आस्था पर चोट पहुँचाने का जानबूझकर किया गया प्रयास”।

फिल्म इंडस्ट्री के कई लोगों ने माना है कि यह विवाद एक बड़ा सांस्कृतिक बहस का रूप ले सकता है। एक तरफ वे लोग हैं जो मानते हैं कि कलाकारों को अपनी निजी मान्यताएँ व्यक्त करने का अधिकार है, चाहे वे धर्म में विश्वास रखें या नहीं। दूसरी ओर वह वर्ग है जो कहता है कि भारत जैसे देश में जहाँ धर्म सामाजिक संरचना का आधार है, वहां सार्वजनिक मंच पर किसी भी देवता या आस्था के प्रति अविश्वास या तिरस्कार की भाषा उपयोग करने से समाज में तनाव पैदा हो सकता है। राजामौली का मामला इसलिए और बड़ा हो जाता है क्योंकि वह सिर्फ़ “एक आम व्यक्ति” नहीं हैं—बल्कि करोड़ों दर्शकों की भावनाओं को प्रभावित करने वाले, पैन–इंडिया और अब वैश्विक स्तर पर सम्मानित फिल्मकार हैं।

अब पूरा देश इस घटना पर एक बड़े सांस्कृतिक निर्णय का इंतज़ार कर रहा है—क्या यह मामला “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक भावनाओं” का एक और अध्याय बनेगा? क्या यह FIR आगे बढ़ेगी या अदालत इसे “व्यक्तिगत राय” कहकर खारिज कर देगी? क्या राजामौली इस बयान पर सफाई देंगे या इसे कला और निजी मान्यताओं के बीच के अंतर के रूप में देखेंगे? फिलहाल इतना साफ है कि एस. एस. राजामौली अब सिर्फ़ फिल्मों की वजह से नहीं, बल्कि आस्था और अभिव्यक्ति की लड़ाई के नए प्रतीक के रूप में सुर्खियों में हैं।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments