एबीसी डेस्क 9 जनवरी 2026
गुजरात की राजधानी गांधीनगर से सामने आई एक गंभीर और चिंताजनक खबर ने प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर में दूषित पेयजल के सेवन से टाइफाइड के मरीजों की संख्या में अचानक तेज़ बढ़ोतरी की रिपोर्ट के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस मामले का स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लिया है। आयोग ने इसे आम नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का गंभीर उल्लंघन मानते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। गांधीनगर में हाल में बिछाई गई नई जल पाइपलाइन नेटवर्क में कई जगहों पर लीकेज पाए गए हैं। इन लीकेज के कारण सीवेज का गंदा पानी पीने के पानी की सप्लाई में मिल गया, जिससे बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ गए। खास तौर पर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में टाइफाइड के लक्षण तेज़ी से सामने आए हैं। स्थानीय अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में टाइफाइड के मरीजों की संख्या में असामान्य इजाफा दर्ज किया गया है।
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने गुजरात के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया है। आयोग ने निर्देश दिया है कि दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपी जाए। यह रिपोर्ट केवल औपचारिक नहीं, बल्कि तथ्यों पर आधारित और जवाबदेही तय करने वाली होनी चाहिए। आयोग ने साफ किया है कि नागरिकों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना राज्य की मूल जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
NHRC ने अपनी मांगों में स्पष्ट किया है कि रिपोर्ट में टाइफाइड से पीड़ित मरीजों की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति, अब तक किए गए इलाज की जानकारी, और यह भी शामिल हो कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। साथ ही आयोग ने यह भी जानना चाहा है कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए प्रशासन ने क्या ठोस और दीर्घकालिक योजनाएं बनाई हैं।
यह मामला सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और बुनियादी सुविधाओं की कमजोर निगरानी का भी आईना दिखाता है। गांधीनगर जैसे राजधानी शहर में अगर पीने के पानी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही, तो यह पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार इस नोटिस का क्या जवाब देती है और क्या वास्तव में ज़मीनी स्तर पर सुधार के ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं। मानवाधिकार आयोग की इस सख्त पहल को आम नागरिकों के लिए एक उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है, ताकि स्वच्छ पानी और सुरक्षित जीवन का उनका संवैधानिक अधिकार सिर्फ कागज़ों तक सीमित न रह जाए।





