एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 2 मार्च 2026
कांग्रेस काल से अब तक गुजिया की लागत में बड़ा उछाल, त्योहार की मिठास पर महंगाई का असर
नई दिल्ली। होली का जिक्र होते ही रंग, गुलाल और गुजिया की खुशबू एक साथ याद आती है। एक पुराना भोजपुरी लोकगीत कहता है—“कैसे बनी कैसे बनी फुलौरी बिन चटनी कैसे बनी”, यानी पकवान के बिना त्योहार अधूरा लगता है। ठीक उसी तरह आज कई परिवारों के बीच यह सवाल गूंज रहा है—गुजिया बिन होली कैसे मनी? कारण है रसोई से जुड़ी वस्तुओं की बढ़ती कीमतें, जिन्होंने इस बार त्योहार की तैयारियों को पहले से कहीं अधिक महंगा बना दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल एक तुलना में 2013 और 2026 के बीच गुजिया बनाने में उपयोग होने वाली सामग्री के दामों में बड़ा अंतर दिखाया गया है, जिससे महंगाई की बहस फिर तेज हो गई है।
यदि वर्ष 2013 के औसत खुदरा बाजार भाव को आधार मानें, तो उस समय मैदा करीब 28 रुपये प्रति किलो, घी 300 रुपये किलो, खोया 100 रुपये किलो, सूजी 25 रुपये किलो, पिसी चीनी 30 रुपये किलो, सूखा नारियल 50 रुपये किलो, बादाम 500 रुपये किलो, मूंगफली तेल 150 रुपये लीटर और इलायची 557 रुपये किलो के आसपास उपलब्ध थी। इन दरों पर यदि एक परिवार एक किलो मैदा, आधा किलो खोया, लगभग 200 से 250 ग्राम घी, 250 ग्राम चीनी, थोड़ी सूजी, नारियल और सीमित मात्रा में मेवे लेकर गुजिया बनाता था, तो लगभग 40 से 50 मध्यम आकार की गुजिया तैयार हो जाती थीं। उस समय कुल सामग्री लागत लगभग 1,500 से 2,000 रुपये के बीच बैठती थी और प्रति गुजिया खर्च 30 से 50 रुपये के बीच रहता था। त्योहार की तैयारी में यह खर्च सामान्य माना जाता था और अधिकांश घरों में गुजिया बनाना एक सहज परंपरा थी।
अब 2026 के दामों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी बदल चुकी है। मैदा 60 रुपये किलो, घी 950 रुपये किलो, खोया 600 रुपये किलो, सूजी 60 रुपये किलो, पिसी चीनी 140 रुपये किलो, सूखा नारियल 450 रुपये किलो, बादाम 1500 रुपये किलो, मूंगफली तेल 250 रुपये लीटर और इलायची 3500 रुपये किलो तक बताई जा रही है। इन्हीं अनुपातों में यदि सामग्री खरीदी जाए तो कुल खर्च 4,000 से 6,000 रुपये या उससे भी अधिक पहुंच सकता है। ऐसे में प्रति गुजिया लागत 120 से 180 रुपये के बीच बैठती है, जो पहले की तुलना में लगभग तीन से चार गुना अधिक है। यदि मेवे और घी की मात्रा अधिक रखी जाए तो यह लागत और बढ़ सकती है।
महंगाई की यह चर्चा केवल एक मिठाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक आर्थिक बदलाव का संकेत देती है। खाद्य तेल, डेयरी उत्पाद, सूखे मेवे और मसालों की कीमतों में पिछले कुछ वर्षों में निरंतर वृद्धि देखी गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव, ईंधन की कीमतें, परिवहन खर्च और उत्पादन लागत में वृद्धि जैसे कई कारकों ने इन दरों को प्रभावित किया है। हालांकि अलग-अलग राज्यों और शहरों में वास्तविक कीमतों में अंतर हो सकता है, फिर भी घरेलू बजट पर दबाव बढ़ना एक सामान्य अनुभव बन चुका है।
राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर बयानबाजी जारी है। विपक्ष महंगाई को सरकार की आर्थिक नीतियों से जोड़कर देख रहा है, जबकि सरकार वैश्विक परिस्थितियों और राहत योजनाओं का हवाला दे रही है। लेकिन आम परिवारों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि त्योहार की मिठास को सीमित बजट में कैसे समेटा जाए। कई घरों में इस बार गुजिया की संख्या कम करने, मेवों की मात्रा घटाने या बाजार से कम खरीदने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।
होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि रिश्तों और परंपराओं की मिठास का प्रतीक है। गुजिया उस परंपरा का अभिन्न हिस्सा रही है। ऐसे में बढ़ती लागत के बीच यह सवाल फिर उभरता है—फुलौरी बिन चटनी कैसे बनी, और गुजिया बिन होली कैसे मनी? त्योहार की भावना कायम है, लेकिन रसोई का हिसाब पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है।





