एबीसी नेशनल न्यूज | 31 जनवरी 2026
नई दिल्ली। देश में उच्च शिक्षा को लेकर बजट की प्राथमिकता पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। बीते एक दशक के बजटीय आंकड़े बताते हैं कि कुल केंद्रीय बजट में उच्च शिक्षा के हिस्से में लगातार गिरावट आई है। इसी आधार पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या उच्च शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में पीछे चली गई है। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2013–14 में केंद्रीय बजट का लगभग 2.52 प्रतिशत हिस्सा उच्च शिक्षा के लिए निर्धारित था। वहीं 2024–25 में यह घटकर करीब 0.91 प्रतिशत रह गया। यानी कुल बजट में हिस्सेदारी के लिहाज से उच्च शिक्षा को मिलने वाला हिस्सा 55 प्रतिशत से अधिक घट गया। इसी कमी को लेकर आलोचक सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
हालांकि, सरकार इस दावे से सहमत नहीं है। उसका कहना है कि राशि के रूप में उच्च शिक्षा पर खर्च घटा नहीं है। वर्ष 2014–15 में जहां उच्च शिक्षा के लिए लगभग 23 से 26 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान था, वहीं 2024–25 में यह बढ़कर 47,620 करोड़ रुपये और 2025–26 में करीब 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
आलोचकों का तर्क है कि सिर्फ बजट राशि बढ़ना पर्याप्त नहीं है। महंगाई, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रों की बढ़ती संख्या, नए संस्थानों की जरूरत और शिक्षा की गुणवत्ता सुधार को देखते हुए यह बढ़ोतरी नाकाफी मानी जा रही है। कुछ वर्षों में वास्तविक जरूरतों के मुकाबले बजट में कटौती जैसी स्थिति भी सामने आई है।
यदि कुल शिक्षा खर्च की बात करें तो केंद्र और राज्यों को मिलाकर भी शिक्षा पर खर्च जीडीपी के 3 से 4.5 प्रतिशत के बीच ही रहा है, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसे 6 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
कुल मिलाकर, यह साफ है कि 55 प्रतिशत की गिरावट का दावा कुल बजट में हिस्सेदारी के संदर्भ में सही माना जा सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उच्च शिक्षा पर खर्च की कुल राशि उतनी ही घट गई है। असल बहस इस बात की है कि बढ़ते बजट और जरूरतों के बीच उच्च शिक्षा को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है—और यही सवाल आज चर्चा के केंद्र में है।




