आलोक कुमार । नई दिल्ली 29 नवंबर 2025
भारत की मुख्यधारा मीडिया में नवंबर 2025 की शुरुआत से लेकर 17 नवंबर तक जो कुछ हुआ, वह दक्षिण एशिया की राजनीति और पत्रकारिता दोनों के लिए अभूतपूर्व, अस्थिर करने वाला और कई स्तरों पर चौंकाने वाला था। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और 2024 में अपने ही देश के जनविरोध से गिर चुकी शेख हसीना—जो 5 अगस्त 2024 से भारत में ‘गुप्त ठिकाने’ में रह रही थीं—उनके मौत की सज़ा सुनाए जाने के ठीक 12 दिन पहले भारत के आठ प्रमुख मीडिया संस्थानों ने उनसे “एक्सक्लूसिव इंटरव्यू” प्रकाशित किए। यह मीडिया कवरेज न सिर्फ़ समान भाषा और समान प्रश्नों से भरा हुआ था, बल्कि एक ही नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाला था—एक ऐसा नैरेटिव जो किसी सोची-समझी रणनीति, किसी महंगे PR ब्लिट्ज और राजनीतिक मंशा की गवाही देता दिखा। 7 से 17 नवंबर के बीच भारतीय मीडिया की सबसे बड़ी संस्थाओं—इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, द टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिंदू, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, आनंद बाजार पत्रिका, NDTV ऑनलाइन और प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया—ने हसीना को मंच दिया, वह भी सवालों की उसी तय स्क्रिप्ट पर, जिनमें कठिन सवाल गायब थे।
यह “मीडिया सुनामी” तब आई जब ढाका की अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण हसीना के खिलाफ गवाही पूरी कर चुकी थी और 1,400 से अधिक प्रदर्शनकारियों की हत्या में उनकी भूमिका को लेकर मौत की सज़ा तय मानी जा रही थी। ऐसे नाजुक समय में इंडियन मीडिया द्वारा हसीना को बार-बार, एक जैसी भाषा और एक जैसी नीति-प्रधान बातों के साथ मंच देना बांग्लादेश में कई लोगों को यह संदेश दे गया कि यह एक प्राकृतिक पत्रकारिता प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत की मिट्टी पर तैयार किया गया एक राजनीतिक अभियान है। ढाका ने आधिकारिक रूप से भारत से विरोध भी दर्ज कराया और इसे “हसीना के लिए मीडिया स्पेस उपलब्ध कराने की अनुचित सुविधा” बताया।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा विवाद यह था कि भारतीय पत्रकारों ने हसीना से वह सवाल नहीं पूछे जो ज़मीन पर सबसे महत्वपूर्ण थे। न उनसे पूछा गया कि 5 अगस्त 2024 को उन्होंने भारत आने की अनुमति किससे मांगी थी, न यह कि क्या उनके संपर्क प्रधानमंत्री मोदी, विदेश मंत्री जयशंकर या NSA अजित डोभाल से हुए। न यह कि “कुछ समय के लिए” भारत में रुकने की अनुमति आखिर 16 महीने तक कैसे खिंचती चली गई। न यह कि क्या उन्होंने UK या दूसरे देशों से राजनीतिक शरण के लिए प्रयास किया था और क्या वे असफल हुए। न पूछा गया कि हसीना ने जुलाई–अगस्त 2024 में होते जनाक्रोश को कम करने के लिए दिल्ली की सलाह मानी या नज़रअंदाज़ की। और तो और, उनके पलायन की चौंकाऊ कहानी—क्या वे अपने पालतू जानवर भी गणभवन में छोड़ आई थीं—जैसे मानवीय लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न भी हवा में गायब रहे।
हसीना ने सभी आठ इंटरव्यू में वही स्क्रिप्ट दोहराई—अपने ऊपर लगे जनसंहार के आरोपों से पल्ला झाड़ा, मरते हुए लोकतंत्र के लिए Nobel laureate मोहम्मद यूनुस को दोषी बताया, कहा कि चुनाव फर्जी होंगे क्योंकि अवामी लीग पर प्रतिबंध है, और हिंदुओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाकर भारत तथा पश्चिम को चेताया कि इस्लामी चरमपंथ फिर उभर रहा है। साथ ही उन्होंने भारत को खुले तौर पर धन्यवाद दिया कि उसने उन्हें सुरक्षित पनाह दी। यह सब कहना उनका अधिकार था, लेकिन पत्रकारों का दायित्व था कि वे प्रतिप्रश्न करते—जो उन्होंने नहीं किया।
इस प्रोपेगेंडा-सरीखे मीडिया अभियान के चलते बांग्लादेश ने भारतीय राजनयिक पवन बादे को तलब कर विरोध जताया, जबकि ढाका के प्रवक्ता शफीकुल आलम ने भारतीय पत्रकारों को “बूटलिकर्स” कहा—जिसके बाद भारत में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने उनसे माफी मांगने की मांग की। यह विवाद इस बात की ओर इशारा करता है कि हसीना इंटरव्यूज़ सिर्फ़ पत्रकारिता का अनुपस्थित विवेक नहीं थे, बल्कि दक्षिण एशियाई भू-राजनीति के भीतर एक बेहद संगठित कदम थे।
निकारागुआ के मशहूर पत्रकार फ़ैब्रिस ले लॉस, जो Q&A शैली के बड़े समर्थक हैं, कहते हैं कि अच्छा इंटरव्यू पाठकों के लिए मार्गदर्शक दस्तावेज होता है। लेकिन हसीना के आठों इंटरव्यू पत्रकारिता के इतिहास में एक काली घटना की तरह दर्ज रहेंगे—जहां सवाल नहीं पूछे गए, जहां शक्ति को चुनौती नहीं दी गई, जहां पत्रकारिता विज्ञापन में बदल गई।
शेख हसीना भारत में कब तक रहेंगी? उनकी राजनीतिक शरण किस देश में संभावित है? बांग्लादेश में उनका भविष्य क्या है? भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर इसका क्या असर होगा?—इन सभी सवालों के जवाब अभी भी धुंध में हैं। लेकिन यह साफ हो गया है कि भारतीय मीडिया में दिखा यह सामूहिक इंटरव्यू अभियान दक्षिण एशियाई राजनीति के इतिहास में “सबसे संगठित मीडिया नैरेटिव इंजीनियरिंग” के रूप में याद किया जाएगा—जहां पत्रकारिता नहीं, स्क्रिप्ट चली; जहां सवाल नहीं, संदेश बोले गए; और जहां खबर नहीं, प्रचार हावी रहा।




