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भाषा में बारूद : मोदी के ‘कट्टा’ बयान से बिहार की सियासत में आग

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नई दिल्ली/पटना 3 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनावों के बीच राजनीतिक बयानबाज़ी ऐसी दिशा में मुड़ गई है, जहाँ विकास और मुद्दों की जगह भय और बारूदी भाषा ने सेंटर स्टेज ले लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपने एक चुनावी भाषण में विपक्ष के लिए इस्तेमाल किए गए वाक्य — “कनपटी पर कट्टा रखकर तेजस्वी को सीएम चेहरा बनाया गया” — ने पूरे देश में राजनीतिक हलचल मचा दी है। यह बयान न सिर्फ़ राजनीतिक विरोधियों पर तंज था, बल्कि यह संकेत भी कि सत्ता की भाषा अब उम्मीद की नहीं, हथियार और धमकी की होती जा रही है। इस एक पंक्ति ने चुनावी थियेटर में आग लगा दी, जिसे विपक्ष ने तेज़ी से हवा भी दे दी — और वह भी तथ्यों, तंज और तिरस्कार के साथ।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस बयान को “झूठ और बौखलाहट का नमूना” बताते हुए कहा कि मोदी अब नौ साल की कार्यकाल की नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए डर का नैरेटिव बना रहे हैं। उनका कहना है: “प्रधानमंत्री अपना हिसाब देने के बजाय ‘कट्टा’ और अपराध की भाषा बोल रहे हैं। यह देश की राजनीति को खतरनाक मोड़ पर ले जाता है। बिहार की जनता बंदूक का नाम सुनकर वोट नहीं डालती — वह काम देखकर फैसला करती है।” उधर तेजस्वी यादव ने और भी तीखा पलटवार करते हुए कहा कि “मोदी जी बताएं — यह कौन-सी प्रधानमंत्री पद की भाषा है? क्या रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की बात खत्म हो चुकी है, जो अब चुनाव ‘कट्टा’ दिखाकर जीता जाएगा?”

राजनीति के सबसे अनुभवी विश्लेषकों का कहना है कि यह बदलाव सिर्फ़ बयानबाज़ी का स्तर गिरना नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के चरित्र पर हमला है। आज जो भाषा चुनाव अभियान में सुनाई दे रही है, वह यह दर्शाती है कि कितना माहौल बदल गया है। जिस भारत ने कभी “जय जवान, जय किसान” और “गरीबी हटाओ” जैसे जन-प्रेरक नारे दिए, वहाँ अब मंचों से ऐसे शब्द गूँज रहे हैं जो लोगों को देश के सुनहरे भविष्य की जगह अंधेरी गलियों की याद दिलाते हैं। यह सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है कि क्या अब चुनावी राजनीति भय पर आधारित जनमत बनाने लगी है? क्या यह मानसिकता है कि “जिन्हें डराओगे, वे ही वोट देंगे!”?

सत्तापक्ष का बचाव यह कहकर किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री का इशारा “अपराध के पुराने दौर” की तरफ़ था, लेकिन विपक्ष इसे सुनियोजित दुष्प्रचार और जनमानस में डर बिठाने की कोशिश बता रहा है। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि बिहार में राजनीतिक बहस को जानबूझकर हथियार संस्कृति की याद दिलाकर भाजपा विपक्ष के खिलाफ अपराध का माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। विपक्ष का जवाब भी उतना ही तीखा: “अगर अपराध की बात होगी — तो फिर सवाल 10 साल की आपकी सरकारों पर भी उठेंगे — क्यों न उठें?”

इस चुनावी तापमान में एक बड़े और असहज सवाल को अनदेखा नहीं किया जा सकता — क्या भाषणों की भाषा हमारे लोकतंत्र का तापमान तय करेगी? अगर सत्ता ही धमकी के प्रतीक को अपने शब्दों में स्थान देने लगे, तो फिर समाज किस दिशा में आगे बढ़ेगा? लोकतंत्र तब तक मजबूत रहता है, जब तक संवाद में सम्मान और सत्ता में जिम्मेदारी मौजूद हो। जब राजनीति बंदूक की भाषा उधार लेने लगे — तो उसके परिणाम कभी भी लोकतांत्रिक नहीं होते।

बिहार की राजनीति एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। यह चुनाव एक संकेत है —क्या जनता सत्ता की धमकी के सामने झुकेगी? या वह अधिकार और अपेक्षा की आवाज़ बुलंद रखेगी? क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ़ वोट की नहीं —

वोट की गरिमा और मतदाता की अस्मिता की भी है।

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