नई दिल्ली, 8 दिसंबर 2025 | आलोक कुमार
लोकसभा का माहौल उस समय तना हुआ और असाधारण रूप से गंभीर हो गया, जब कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ‘वंदे मातरम्’ पर चल रही ऐतिहासिक बहस के बीच बोलने के लिए उठे। सदन में सन्नाटा छा गया और गोगोई ने अपनी बात की शुरुआत बंगाल की पवित्र भूमि को नमन करते हुए की—वह भूमि जिसने भारत को क्रांतिकारी विचार दिए, जिसने राष्ट्रनिर्माण की आत्मा को शब्दों में ढाला। उन्होंने विद्यासागर, राजा राममोहन रॉय, बंकिम चंद्र चटर्जी, विवेकानंद, अरबिंदो, खुदीराम बोस, कवि नज़्रुल, रवींद्रनाथ टैगोर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस का नाम लेते हुए कहा कि बंगाल ही वह शक्तिपीठ है जहाँ राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों जन्मे। इसी ऊर्जस्वित विरासत ने लाखों स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेज़ी दमन के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिया।
गोगोई ने ‘वंदे मातरम्’, टैगोर की कविता Where the mind is without fear, ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’, ‘करो या मरो’, ‘जय हिंद’ और ‘भारत छोड़ो’ जैसे ऐतिहासिक नारों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन शब्दों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा को प्राणवायु दी। उन्होंने विस्तार से बताया कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी अत्याचारों के बीच बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1872 में ‘वंदे मातरम्’ की वे दो पंक्तियां लिखीं, जो आज राष्ट्रगीत का हिस्सा हैं। बंगाल विभाजन (1905) के समय यही गीत नारा बन गया—एक ऐसा नारा जिसने भारत के स्वदेशी आंदोलन को निर्णायक जनविद्रोह में बदल दिया। पैम्फलेट, गीत, सभाओं और अनुवादों ने ‘वंदे मातरम्’ को बंगाल से पंजाब, महाराष्ट्र, मद्रास तक राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध की गर्जना बना दिया।
उन्होंने कहा कि यह नारा ब्रिटिश साम्राज्य के दिल में डर पैदा करता था, पर इसके ठीक उलट “BJP-RSS के राजनीतिक पूर्वज इस संघर्ष में कहां थे?” यह सवाल गोगोई ने तीखे स्वर में उठाया। सदन में हलचल फैल गई। उनके शब्दों में—“स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्यधारा में शामिल न होने वालों को आज राष्ट्रवाद का ठेकेदार बनने से पहले इतिहास में झांकना चाहिए।” उन्होंने याद दिलाया कि 1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने ‘वंदे मातरम्’ को हर राष्ट्रीय सभा में गाने का निर्णय लिया था, जबकि मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनों ने इसका विरोध किया। फिर भी कांग्रेस जनता की भावना के साथ खड़ी रही।
गोगोई ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की चर्चा करते हुए पूछा—“जब देश जेलों में बंद होकर अंग्रेजों की नींव हिला रहा था, तब BJP के वैचारिक पूर्वजों ने क्यों कहा था—भारत छोड़ो आंदोलन में भाग न लें?” उन्होंने कहा, आज जो लोग राष्ट्रवाद की ऊंची-ऊंची बातें करते हैं, वे अपने अतीत पर एक बार नजर डालें। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा उसकी विविधता, उसकी भाषाओं और उसके संविधान में बसती है—और यही संविधान आज सत्ता के दबाव में खतरे में है। उनके आरोप सीधे थे—मोदी सरकार वोट का अधिकार, सोचने का अधिकार, प्रेम करने का अधिकार, आलोचना करने का अधिकार—सब छीनने में जुटी है; और यह बंकिम चंद्र के सपने के विरुद्ध है।
इसके बाद गोगोई ने वर्तमान मुद्दों पर हमला तेज किया। उन्होंने कहा कि सरकार वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ मना रही है, पर देश की राजधानी में बम विस्फोट हो जाए और प्रधानमंत्री उस पर एक शब्द न कहें—यह कैसी संवेदनहीनता है? उन्होंने सुरक्षा पर तीखा सवाल उठाते हुए कहा—“न हवा सुरक्षित है, न करेंसी, न सीमा और न ही राजधानी। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोग भी असुरक्षित हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री भाषणों में जनता की समस्याओं को जगह नहीं देते, जबकि इंडिगो की मोनोपॉली जैसी समस्याओं पर सवाल उठाने भर से BJP के सांसद विरोध में खड़े हो जाते हैं।
गोगोई ने कहा कि यदि सचमुच वंदे मातरम् की 150वीं जयंती मनानी है तो नागरिकों को वास्तविक सुरक्षा देनी होगी—आर्थिक, सामाजिक, भौतिक और संवैधानिक। उन्होंने कटाक्ष किया कि BJP ‘वंदे मातरम्’ का प्रयोग प्रोपेगैंडा की तरह करती है, जबकि कांग्रेस ने टैगोर, नेहरू और राष्ट्रवादी चिंतकों के साथ मिलकर इसके मूल सौंदर्य और समावेशी भावना को आगे बढ़ाया। उन्होंने याद दिलाया कि नेहरू ने कहा था—“The words ‘Vande Mataram’ became a slogan of power which inspired our people.”
इतिहास के एक और अध्याय पर प्रहार करते हुए गोगोई ने कहा—“जब पूरे देश ने ‘जन-गण-मन’ को राष्ट्रगान स्वीकार कर लिया, तब BJP के वैचारिक पूर्वजों ने 52 वर्षों तक अपनी शाखाओं में न तिरंगा फहराया और न राष्ट्रगान गाया। ऐसे लोग आज राष्ट्र की बात करते हैं!” उनके इस वक्तव्य ने सदन में गहरी राजनीतिक खामोशी पैदा कर दी।
अपने भाषण के अंतिम हिस्से में गोगोई ने रवींद्रनाथ टैगोर की पूरी कविता Where the mind is without fear सदन में पढ़कर सुनाई—एक ऐसी कविता जो स्वतंत्रता, तर्क, मानवता और निडरता की दिशा बताती है। उन्होंने कहा कि जब तक यह कविता जिंदा है, भारत न डर के आगे झुकेगा, न विभाजन की राजनीति के आगे। उनका संदेश स्पष्ट था—यह लड़ाई इतिहास की व्याख्या की नहीं, भारत के वर्तमान और भविष्य की लड़ाई है; और जब सत्ता नागरिकों की आवाज दबाने लगे, तब ‘वंदे मातरम्’ का वास्तविक अर्थ याद किया जाना चाहिए—मां भारती की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा।
अंत में उन्होंने दोहराया—“जिस मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम् का बहिष्कार मांगा था, उसे संविधान सभा ने करारा जवाब दिया। हमने कहा—हम ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत घोषित करेंगे, और किया भी। आज भी उस संकल्प की रक्षा जरूरी है।” गोगोई के भाषण के बाद सदन में गूंज केवल एक थी—इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, राजनीति के चरित्र में भी झलकता है।




