Home » Business » कचरे से कमाई तक: नारियल के खोल से ‘ग्रीन गोल्ड’ बना रहे शहर

कचरे से कमाई तक: नारियल के खोल से ‘ग्रीन गोल्ड’ बना रहे शहर

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

एबीसी नेशनल न्यूज | तिरुवनंतपुरम | 18 फरवरी 2026

शहरी कचरे की नई पहचान: ‘ग्रीन वेस्ट’ से संसाधन तक

भारत के तटीय राज्यों, विशेषकर केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के शहरों में नारियल दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है। मंदिरों में चढ़ावा, घरों में भोजन, बाजारों में थोक बिक्री और सड़कों पर नारियल पानी की दुकानों से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में इसके खोल और रेशे निकलते हैं। लंबे समय तक यह सारा कचरा नगर निकायों के लिए सिरदर्द बना रहा, क्योंकि नारियल का खोल कठोर होता है और सामान्य जैविक कचरे की तुलना में बहुत धीरे-धीरे गलता है। परिणामस्वरूप डंपिंग ग्राउंड में इसका ढेर लगता गया, जिससे जगह की कमी, दुर्गंध और पर्यावरणीय दबाव जैसी समस्याएं बढ़ीं। अब स्थिति बदल रही है। कई शहरी स्थानीय निकायों ने इस ‘ग्रीन वेस्ट’ को अलग श्रेणी में रखकर इसके वैज्ञानिक प्रबंधन की शुरुआत की है, जिससे कचरे की समस्या को संसाधन में बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।

संग्रहण से प्रसंस्करण तक: एक संगठित और टिकाऊ व्यवस्था

नगर निगमों ने वार्ड स्तर पर नारियल कचरे के पृथक संग्रहण की व्यवस्था लागू की है। मंदिरों, होटलों, विवाह स्थलों और थोक मंडियों से सीधे स्रोत पर ही अलग कलेक्शन किया जाता है। इसके बाद इस कचरे को स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों तक पहुंचाया जाता है, जहां आधुनिक मशीनों की मदद से खोल को तोड़ा जाता है और उससे कॉयर फाइबर, कोकोपीट तथा अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। कठोर खोल से सक्रिय चारकोल और ईंधन ब्रिकेट्स भी बनाए जा रहे हैं, जिनकी औद्योगिक मांग बढ़ रही है। इस पूरी प्रक्रिया को स्थानीय स्तर पर संचालित करने से परिवहन लागत कम होती है और उत्पादन चक्र तेज़ होता है। कई शहरों में सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत निजी उद्यमियों और सहकारी समितियों को भी जोड़ा गया है, जिससे यह पहल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती जा रही है।

स्थानीय रोजगार का सशक्त माध्यम: महिला समूहों की अहम भूमिका

नारियल कचरे के पुनर्चक्रण ने स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। स्वयं सहायता समूहों, विशेषकर महिला समूहों, को नारियल रेशे से रस्सियां, डोरमैट, मैटिंग, हैंडीक्राफ्ट और सजावटी वस्तुएं बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हुई है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण को भी बढ़ावा मिला है। तिरुवनंतपुरम और आसपास के क्षेत्रों में कई छोटे उद्यम कोकोपीट की पैकेजिंग कर उसे देश के अन्य हिस्सों और विदेशों तक भेज रहे हैं। युवा उद्यमियों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से इन उत्पादों की बिक्री शुरू की है, जिससे यह पहल पारंपरिक कचरा प्रबंधन से आगे बढ़कर सूक्ष्म और लघु उद्योग का रूप ले चुकी है।

पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में बड़ा कदम

नारियल कचरे के वैज्ञानिक उपयोग से पर्यावरणीय लाभ भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। लैंडफिल में जाने वाले कचरे की मात्रा कम हुई है, जिससे डंपिंग स्थलों पर दबाव घटा है। कोकोपीट का उपयोग पौधशालाओं, ग्रीनहाउस और शहरी बागवानी में बड़े पैमाने पर हो रहा है, जो मिट्टी की नमी बनाए रखने और पौधों की वृद्धि में सहायक है। इससे रासायनिक उर्वरकों और सिंथेटिक माध्यमों पर निर्भरता कम हो रही है। नारियल के खोल से तैयार चारकोल और बायो-ईंधन उत्पाद पारंपरिक कोयले के विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में मदद मिल रही है। इस तरह यह पहल केवल कचरा प्रबंधन तक सीमित नहीं, बल्कि हरित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा को मिलता नया आयाम

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को देश के सभी प्रमुख शहरों में व्यवस्थित रूप से लागू किया जाए, तो यह बड़े आर्थिक क्षेत्र में बदल सकता है। एक मध्यम आकार का शहर प्रतिमाह कई टन नारियल कचरे का प्रसंस्करण कर सकता है, जिससे नगर निकायों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। इससे कचरा प्रबंधन पर होने वाला व्यय घटेगा और राजस्व सृजन का नया स्रोत बनेगा। यह पहल ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा को व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जहां कचरा बोझ नहीं बल्कि आर्थिक अवसर के रूप में देखा जाता है।

बदलती सोच, बदलते शहर

भारत के शहरों में नारियल कचरे के पुनर्चक्रण की यह पहल एक व्यापक परिवर्तन का संकेत है। यह दर्शाता है कि यदि योजना, तकनीक और सामुदायिक भागीदारी को साथ लेकर चला जाए, तो साधारण प्रतीत होने वाला कचरा भी बड़ी आर्थिक और पर्यावरणीय उपलब्धि में बदल सकता है। जो खोल कभी बेकार समझे जाते थे, वही आज हरित विकास और स्थानीय आत्मनिर्भरता के प्रतीक बन रहे हैं। यह बदलाव केवल सफाई अभियान नहीं, बल्कि सोच और व्यवस्था के स्तर पर हो रहा परिवर्तन है—जहां हर त्यागी गई वस्तु में संभावना देखी जा रही है और शहर आत्मनिर्भर, स्वच्छ और आर्थिक रूप से सशक्त बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments