यह तस्वीर भारतीय राजनीति के इतिहास में एक गहरा और असहज सवाल छोड़ती है — “पंजाब बचाओ, फौज भिजवाओ।” उस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से यह मांग कर रहे थे भारतीय जनसंघ के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी। पर यह मांग सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं थी, बल्कि उस दोहरे चरित्र की प्रतीक थी जिसने पंजाब को धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हिंसा के सबसे भयानक दौर में झोंक दिया। चौदह साल पहले यही राजनीतिक तबका पंजाब की आग की पहली चिंगारी लगाने में सक्रिय था।
पंजाब का संकट अचानक पैदा नहीं हुआ था। यह भाजपा (तब जनसंघ) और अकाली राजनीति के गठजोड़ से निकला हुआ वह जटिल समीकरण था जिसमें धर्म, राजनीति और सत्ता की भूख का मिश्रण था। 1971 में जब इंदिरा गांधी ने “गरीबी हटाओ” के नारे पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की, विपक्ष पूरी तरह से पराजित हो चुका था। कांग्रेस के सामने कोई सशक्त राजनीतिक चुनौती नहीं बची थी। ऐसे में विपक्षी दलों को एक नया एजेंडा और नई ज़मीन की तलाश थी — एक ऐसा मुद्दा जो उन्हें दोबारा राष्ट्रीय परिदृश्य में ला सके। यही वह दौर था जब आनंदपुर साहिब प्रस्ताव सामने आया।
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के जरिए अकाली दल ने केंद्र और राज्य के रिश्ते को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की। इन मांगों में कहा गया कि पंजाब के सभी पंजाबी भाषी क्षेत्र एकजुट किए जाएं, पंजाब की नदियों का पानी किसी अन्य राज्य को न दिया जाए, राज्य के राजस्व का उपयोग केवल राज्य में हो, और केंद्र को पंजाब के संसाधनों में दखल देने का अधिकार न हो। सतह पर ये मांगें प्रशासनिक लग सकती थीं, लेकिन इनके भीतर छिपा संदेश था — “पंजाब, भारत के भीतर एक स्वतंत्र इकाई बने।” यह वस्तुतः संघीय ढांचे के भीतर से अलगाव की बुनियाद थी।
विडंबना यह रही कि भाजपा, जो आगे चलकर अनुच्छेद 370 जैसे विशेष प्रावधानों का विरोध करने वाली पार्टी बनी, उस समय अकाली दल की राष्ट्रीय सहयोगी थी और आनंदपुर साहिब प्रस्तावों का समर्थन कर रही थी। यानी, जिस पार्टी ने बाद में “एक राष्ट्र, एक संविधान, एक कानून” का नारा बुलंद किया, वही पार्टी पंजाब में उस वक्त ऐसी मांगों का समर्थन कर रही थी जो “एक राष्ट्र के भीतर दो प्रणालियों” की दिशा में जाती थीं। यह राजनीतिक अवसरवाद का सबसे नग्न रूप था, और इसमें अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी दोनों की भूमिका प्रमुख थी।
जब इंदिरा गांधी ने इन मांगों में से कुछ को मान लिया और कुछ को अस्वीकार कर दिया, तो आंदोलन भड़क उठा। पंजाब की राजनीति धार्मिक रंग में ढल गई। गुरुद्वारा कमेटियों के जरिए यह आंदोलन कट्टरपंथी दिशा में जाने लगा। मुख्यमंत्री जैल सिंह ने इस उग्रता को संतुलित करने के लिए भिंडरवाले को आगे किया — यह सोचकर कि वह अकाली दल का संतुलन बिगाड़ देंगे। लेकिन वही भिंडरवाले आगे चलकर कट्टरपंथ का चेहरा बन गए। उन्होंने राजनीतिक धार्मिकता को हथियारबंद आंदोलन में बदल दिया और पंजाब धीरे-धीरे हिंसा की आग में झुलसने लगा।
इसी दौरान संघ समर्थित अख़बार ‘पंजाब केसरी’ ने हिंदू और सिखों के बीच तनाव की खाई को और गहरा किया। संपादकीय पृष्ठों और रिपोर्टों में ऐसी भाषा और तर्क गढ़े गए, जिनसे दोनों समुदायों में अविश्वास और घृणा बढ़ी। जब अख़बार के संपादक की हत्या हुई, तो यह पंजाब में हिंसा के उस दौर की शुरुआत थी, जिसमें न तो किसी सरकार का नियंत्रण रहा और न ही किसी राजनीतिक दल का विवेक। पंजाब आग में जल रहा था और दिल्ली में सत्ता के गलियारों में राजनीति के समीकरण गढ़े जा रहे थे — जहां अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता “पंजाब बचाओ, फौज भिजवाओ” के नारे लगाते दिखे।
और फिर वह तस्वीर सामने आई जिसने भारतीय राजनीति की यादों में स्थायी स्थान बना लिया — अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी, दोनों इंदिरा गांधी से सेना भेजने की मांग कर रहे हैं। नारा था — “पंजाब बचाओ, फौज भिजवाओ।” लेकिन कुछ ही महीनों बाद जब इंदिरा गांधी ने सेना भेजी और ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू किया, तो यही लोग इसे “सिख-विरोधी” कहने लगे। वही नेतृत्व जो पहले “कठोर कार्रवाई” की मांग कर रहा था, बाद में उसी कार्रवाई को “साजिश” बताने लगा। यही है राजनीति का वह चेहरा, जो हर आग में अपना प्रतिबिंब ढूंढता है, लेकिन कभी राख की ज़िम्मेदारी नहीं लेता।
कश्मीर, पंजाब और असम — इन तीनों राज्यों की अस्थिरता के इतिहास में यह समानता दिखाई देती है कि जब-जब सांप्रदायिक या जातीय असंतोष की चिंगारी भड़की, वहां कहीं-न-कहीं संघ, जनसंघ, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की राजनीतिक रेखाएं मौजूद थीं। असम में नेल्ली नरसंहार का सिलसिला भी अटल बिहारी वाजपेयी की उस भड़काऊ रैली के बाद शुरू हुआ जिसमें बांग्लादेशी घुसपैठ के नाम पर स्थानीय लोगों की भावनाओं को भड़काया गया था।
इतिहास गवाही देता है कि भारत में जहां भी हिंसा और अलगाव की आग भड़की, वहां राजनीति ने अपने लिए “खाद-पानी” डाला। पंजाब का संकट सिर्फ एक धार्मिक संघर्ष नहीं था, बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं की राजनीतिक पाखंड और दोहरे चरित्र की उपज थी। आज जब हम “पंजाब बचाओ, फौज भिजवाओ” की वह पुरानी तस्वीर देखते हैं, तो समझ आता है कि किस तरह सत्ता के लालच ने इंसानियत, धर्म और लोकतंत्र — तीनों को एक साथ जला डाला। यह तस्वीर सिर्फ एक नारा नहीं, सच्चाई है — कि जो लोग आग लगाते हैं, वही बाद में खुद को दमकलकर्मी बताने लगते हैं।




