शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री
नई दिल्ली 25 अक्टूबर 2025
दीवाली का पर्व भारतीय संस्कृति में केवल त्योहार नहीं, बल्कि रौनक, उल्लास, और बड़े आर्थिक लेन-देन का पर्याय है। इस अवसर पर घरों में सोना, नए कपड़े, मिठाइयाँ और पटाखों का भारी खर्च होता है, जिससे बाज़ार का व्यापार अपने चरम पर पहुँच जाता है। घरों से लेकर व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक, हर जगह रोशनी, रंगोली और दीयों की कतारें धन की देवी महालक्ष्मी के स्वागत के लिए सजती हैं। लक्ष्मी पूजन के साथ ही, धन-संपदा का एक बड़ा प्रवाह औपचारिक और अनौपचारिक दोनों तरीकों से शुरू हो जाता है। हालाँकि, यह चमक केवल दीयों तक सीमित नहीं रहती; इसी रोशनी भरे मौसम में, कई दफ़्तरों के भीतर “उपहार” या “टोकन” के नाम पर लिफाफ़ों का लेनदेन चुपचाप होता है, जो दर्शाते हैं कि त्यौहार की पवित्रता के बीच भी जेबें “रोशन” करने की एक काली परंपरा मौजूद है।
₹6.05 लाख करोड़ का दीवाली बाज़ार और ‘अपेक्षाओं की इनवॉइस’
दीवाली गिफ्टिंग मार्केट भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका सटीक आँकड़ा लगाना मुश्किल है। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के अनुसार, 2025 में दीवाली गिफ्ट मार्केट रिकॉर्ड ₹6.05 लाख करोड़ ($80 अरब) तक पहुँच गया, जो अब तक का सबसे बड़ा उत्सवी खर्च है। हालांकि, FICCI, CII या ASSOCHAM जैसे प्रमुख संगठन इस आंकड़े से सहमत नहीं दिखते और वर्तमान में रोज़गार की कमी, घटती आमदनी और महंगाई के कारण ऐसे बड़े अनुमान लगाने से बच रहे हैं। बदलते समय के साथ गिफ्ट्स की प्रकृति भी बदल गई है; अब मिठाइयों और सूखे मेवों के साथ-साथ इंपोर्टेड चॉकलेट्स, गोल्ड कॉइन, वाइन, हैंडमेड प्रोडक्ट्स और आर्टिसनल चॉकलेट्स तक शामिल हैं, जिनकी पहुँच अब गाँवों तक भी हो चुकी है। यह गिफ्ट इकोनॉमी, एक तरफ तो बाज़ार को गति देती है, पर दूसरी ओर, इसके पीछे “त्योहारी गिफ्ट्स” की एक ऐसी “काली परंपरा” चलती है जिसके साथ अक्सर “अपेक्षाओं की इनवॉइस” जुड़ी होती है, जिससे उपहार का अर्थ सौदा बन जाता है।
डिजिटल युग में ₹32 लाख करोड़ की नकद अर्थव्यवस्था का फैलाव
भारत में डिजिटल भुगतान के बढ़ने के बावजूद, नकद अर्थव्यवस्था (Cash Economy) तेजी से फल-फूल रही है, जो एक चिंताजनक विरोधाभास है। 2016 में नोटबंदी के समय संचलन में मुद्रा (Currency in Circulation) लगभग ₹15 लाख करोड़ थी, जो अब बढ़कर ₹32 लाख करोड़ से अधिक हो गई है। यह वृद्धि यह दर्शाती है कि अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अभी भी नकद लेन-देन पर निर्भर है, जिसका सीधा संबंध अक्सर अनौपचारिक और अवैध भुगतानों से होता है। “सुविधा शुल्क” नामक एक नया सामान्य शब्द अब उस राशि का प्रतीक बन गया है जो लोग वैध काम को तेज़ी से करवाने के लिए चुपचाप देते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनी की वरिष्ठ अधिकारी शिखा त्यागी के अनुसार, “मिठाई, चाय-पानी, सुविधा — ये सब अब भ्रष्टाचार के मीठे नाम हैं। दरें बीते दशक में सौ गुना तक बढ़ चुकी हैं,” जिससे यह पता चलता है कि व्यापार और प्रशासन में अब भ्रष्टों को “कानूनी” या “सामाजिक रूप से स्वीकार्य” तरीके से ‘उपहार’ देने का चलन बन गया है।
महालक्ष्मी के पर्व पर काली कमाई की आराधना और वैश्विक भ्रष्टाचार
यह एक बड़ी विडंबना है कि धन की देवी महालक्ष्मी के पर्व के दौरान ही अवैध धन का प्रवाह सबसे अधिक होता है। त्यौहार की आड़ में बहने वाला यह काला धन और भ्रष्टाचार अब देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले सामने आए हैं; जैसे अमेरिका में भारत के एक शीर्ष उद्योगपति पर सौर ऊर्जा अनुबंधों से जुड़े मामले में $265 मिलियन (लगभग ₹2,200 करोड़) की रिश्वत और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगे हैं। अमेरिका ने भारत में रिश्वत के मामलों को लेकर कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया है, जिससे यह समस्या वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को प्रभावित कर रही है। लॉ फर्म Foley & Lardner की रिपोर्ट के अनुसार, Cognizant को चेन्नई में एक अधिकारी को दी गई रिश्वत के लिए $25 मिलियन का जुर्माना भरना पड़ा, और Embraer, Mondelez/Cadbury, Oracle, Diageo जैसी कंपनियों ने कुल $77.8 मिलियन की रिश्वतें दीं, जो भारतीय बाज़ार में अवैध लेन-देन की गहराई को दर्शाती है।
भारत में भ्रष्टाचार का रोज़मर्रा का चेहरा और ‘दीवाली टोकन’
भारत में भ्रष्टाचार अब कोई अपवाद नहीं रहा, बल्कि यह रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन गया है। इसकी जड़ें पेंशन पास कराने से लेकर विश्वविद्यालय ग्रेडिंग तक में फैल चुकी हैं। छत्तीसगढ़ में एक विधवा से उसकी पेंशन और ग्रेच्युटी पास करवाने के लिए ₹2.8 लाख की रिश्वत मांगी गई, जिसे नैतिक पतन (moral turpitude) का मामला बताते हुए हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार कर दिया। गुवाहाटी में NHIDCL के प्रबंध निदेशक कृष्ण कुमार ₹10 लाख की रिश्वत लेते पकड़े गए और पंजाब में DIG के घर से भारी नकदी और सोना बरामद हुआ। लोक निर्माण विभाग (PWD) के छोटे अधिकारी भी ठेकेदारों के बिल पास करने के लिए ₹7,000 से ₹30,000 तक की रिश्वत की माँग करते हैं। दीवाली के मौसम में यह भ्रष्टाचार एक संगठित रूप ले लेता है, जिसे “दीवाली टोकन” कहा जाता है। NCR-UP के वरिष्ठ पत्रकार सतीश मिश्रा के अनुसार, “अब बिना रिश्वत के कारोबार असंभव है,” और यह टोकन कृतज्ञता नहीं, बल्कि कृत्य का बाज़ार बन गया है, जहाँ हर काम के बदले में ‘उपहार’ के नाम पर रिश्वत देना एक स्थापित नियम बन चुका है।
चौंकाने वाले आँकड़े और डिजिटल युग में “डिजिटल घूस” का उदय
भ्रष्टाचार के फैलाव को 2024 के LocalCircles सर्वे के आँकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं, जिसके अनुसार 66% भारतीय व्यवसायों ने पिछले साल रिश्वत दी, जिनमें से 72% सरकारी अधिकारियों को दी गई थी। इन भुगतानों में 83% नकद में किए गए थे, जबकि बाकी को “गिफ्ट्स” या एजेंटों के माध्यम से “सुविधा” के रूप में दिया गया। इस साल, कई लोगों की “दीवाली पेमेंट” इसलिए रुकी रही क्योंकि “प्रतिशत के बँटवारे” को लेकर अधिकारियों के बीच विवाद था, जो यह सिद्ध करता है कि रिश्वतखोरी अब संगठित कमीशनखोरी का रूप ले चुकी है। इतना ही नहीं, डिजिटल युग में रिश्वत देने के तरीकों में भी बदलाव आया है। अब “डिजिटल घूस” का चलन बढ़ रहा है, जहाँ रिश्वत देने के लिए सॉफ्टवेयर सिस्टम और मल्टीपल बैंक अकाउंट्स का गुप्त उपयोग हो रहा है। इसके जवाब में, सरकार भी सक्रिय हुई है; वित्त मंत्रालय ने सरकारी धन से गिफ्ट देने पर रोक लगाई है, और राजस्थान ACB के साथ-साथ गुजरात और तमिलनाडु में भी निगरानी टीमें गठित की गई हैं जो कैश-भरे मिठाई डिब्बों की ट्रैकिंग कर रही हैं, ताकि इस अवैध चलन पर रोक लगाई जा सके।
संस्कृति की आड़ में सौदा और “घूसखोरी का धार्मिक उत्सव”
कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि गिफ्ट देना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है, लेकिन जब एक मिठाई का डिब्बा किसी फाइल को “पास करवाने की याद” बन जाए, तो वह उदारता नहीं, बल्कि सीधे तौर पर रिश्वत बन जाता है। Moneylife पत्रिका के अनुसार, “रिश्वत वह हर पेशकश, वादा, मांग या स्वीकार है जो किसी अनैतिक, अवैध या भरोसे के उल्लंघन के बदले में दी जाए।” यह परिभाषा दीवाली के दौरान दिए जाने वाले अधिकांश “टोकन” पर सटीक बैठती है। यह विडंबना है कि हम अपने घरों को दीयों से सजाते हैं और दिल में उदारता का भाव रखते हैं, लेकिन कहीं न कहीं “शुभकामना का टोकन” का वास्तविक अर्थ होता है — “यह रहा आपका गिफ्ट, पूजा के बाद मेरा काम कर दीजिए।” किसी ने व्यंग्य में कहा कि दीवाली अब “घूसखोरी का धार्मिक उत्सव” बन गई है। यह व्यंग्य, शायद सच्चाई के ज्यादा करीब है, क्योंकि इस पर्व पर हर गिफ्ट अब डोर बँधे सौदे में बदल गया है, जो इस महान त्योहार की पवित्रता को धूमिल कर रहा है।
रोशनी का पर्व या रिश्वत का मौसम?
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में दीवाली का त्योहार हर साल “हश मनी” (Hush Money) के मौसम में बदलने का जोखिम उठाता है। यह पर्व, जो रोशनी, समृद्धि और ईमानदारी का प्रतीक होना चाहिए, अनैतिक लेन-देन और भ्रष्टाचार का एक सुविधाजनक माध्यम बन जाता है। लेखक के शब्दों में, मिठाई के डिब्बों में अब केवल काजू कतली नहीं, बल्कि “काले धन की खुशबू” भी बसने लगी है। यह स्थिति भारत के नैतिक और आर्थिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर चुनौती है, जहाँ एक पवित्र उत्सव की आड़ में समानांतर अर्थव्यवस्था फल-फूल रही है और भ्रष्टाचार एक सांस्कृतिक ‘उपहार’ का जामा पहन चुका है।




