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नारी से नारायणी : भारतीय संस्कृति में महिला शक्ति का गौरव

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विमला कुमारी | शारदा सूर्यवंशी | इंडियन योगिनी संगठन 

नई दिल्ली | 8 मार्च 2026

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता।”

भारतीय संस्कृति में नारी को सृष्टि की आधारशिला माना गया है। हमारे शास्त्रों और परंपराओं में स्पष्ट कहा गया है कि जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवताओं का निवास होता है। अर्थात जिस समाज में महिलाओं को सम्मान, अधिकार और समान अवसर प्राप्त होते हैं, वहां शांति, समृद्धि और विकास का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है।

विश्व स्तर पर महिलाओं की उपलब्धियों और अधिकारों को सम्मान देने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1975 में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया। इसके पश्चात दिसंबर 1977 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महिला अधिकारों और अंतर्राष्ट्रीय शांति के समर्थन में इस दिवस को औपचारिक मान्यता प्रदान की। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पूरी दुनिया में महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों के उत्सव के रूप में मनाया जाता है तथा लैंगिक समानता को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है।

भारतीय परंपरा में नारी को ईश्वर की सर्वोत्तम कृति माना गया है। वैदिक काल में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार और सम्मान प्राप्त था। वे शिक्षा, दर्शन, धर्म और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाती थीं। किंतु मध्यकाल में राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर हो गई। इसके बावजूद उन्होंने अपनी अदम्य शक्ति और साहस से समाज के हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं।

भारतीय इतिहास में रजिया सुल्तान, रानी दुर्गावती और जीजाबाई जैसी वीरांगनाओं ने साहस और नेतृत्व का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। वहीं मीराबाई ने भक्ति और आध्यात्मिकता के माध्यम से समाज को नई दिशा दी और इतिहास में अमिट स्थान प्राप्त किया।

अंग्रेजी शासन के दौरान सामाजिक सुधार आंदोलनों के परिणामस्वरूप महिलाओं की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ और उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के अवसर मिलने लगे। स्वतंत्रता संग्राम में भी अनेक महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एनी बेसेंट और विजय लक्ष्मी पंडित जैसी महान महिलाओं ने राष्ट्र की स्वतंत्रता और राजनीतिक चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

1950 में भारतीय संविधान लागू होने के बाद महिलाओं को समान अधिकार, सुरक्षा और अवसर प्रदान किए गए, जिससे समाज में उनकी भागीदारी और सशक्तिकरण को नई दिशा मिली।

भारतीय धार्मिक ग्रंथों में नारी को “नारायणी” के रूप में सम्मानित किया गया है। विशेष रूप से मातृत्व के कारण उसे देवी के समान माना गया है। वेदों और पुराणों में नारी को शक्ति, जननी और सृजन की आधारशक्ति बताया गया है।

तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है — “मातृदेवो भव”, अर्थात माता को देवता के समान सम्मान दो।

यजुर्वेद (21.5) में नारी को महाशक्तिमती और वीर संतानों की जननी कहा गया है।

पद्म पुराण में मातृत्व के महत्व का वर्णन करते हुए माता-पिता की सेवा को सर्वोच्च धर्म बताया गया है।

मार्कण्डेय पुराण में माता मदालसा की लोरियों का उल्लेख मिलता है, जो अपने पुत्रों को ज्ञान और आत्मबोध की शिक्षा देती हैं।

आज की महिलाएं राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों के साथ-साथ योग, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं। योग और आध्यात्मिक अभ्यास महिलाओं को मानसिक और शारीरिक संतुलन प्रदान करते हैं, जिससे वे जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय अधिक आत्मविश्वास के साथ ले पाती हैं।

भारतीय दर्शन में भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप स्त्री और पुरुष की समानता तथा परस्पर पूरकता का प्रतीक है। महाकवि कालिदास ने रघुवंशम् में शिव और पार्वती को शब्द और अर्थ की तरह अविभाज्य बताया है।

वैदिक साहित्य में भी नारी को अत्यंत सम्मानित स्थान प्राप्त था। उस समय कई विदुषी महिलाओं को “ब्रह्मवादिनी” या “ऋषिका” कहा जाता था। उन्हें अंगिरा, अगस्त्य और वशिष्ठ जैसे महान ऋषियों के समान सम्मान प्राप्त था। आपला, यामी, मैत्रेयी, कात्यायनी और गार्गी जैसी विदुषी महिलाएं वैदिक काल की प्रसिद्ध मंत्रद्रष्टा थीं।

भारतीय परंपरा में नारी को घर की लक्ष्मी कहा गया है। प्रसिद्ध दार्शनिक ओशो (रजनीश) ने कहा है — “जहां प्रेम और करुणा है, वहां नारी की उपस्थिति अवश्य होती है।”

स्वतंत्रता के बाद विशेषकर 1950 के दशक के पश्चात शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण शिक्षित महिलाएं घर की सीमाओं से बाहर निकलकर कार्यक्षेत्र में सक्रिय हुईं और परिवार की आर्थिक उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगीं। अनेक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता और प्रतिभा के बल पर समाज में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

आज के आधुनिक युग में पुरुष और महिलाएं दोनों समान रूप से विकास की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। किसी भी समाज या राष्ट्र की प्रगति वहां की महिलाओं की स्थिति पर निर्भर करती है। हालांकि आधुनिक जीवन में कार्य-जीवन संतुलन, वेतन असमानता और लैंगिक भेदभाव जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, किंतु #MeToo आंदोलन और महिला आरक्षण विधेयक (2023) जैसे प्रयासों ने सामाजिक परिवर्तन की नई दिशा प्रदान की है।

ग्रंथों की प्रेरणा हमें साहस देती है —

“नारी तू नारायणी, कभी न माने हार,

साहस तेरा देखकर, होती जय-जयकार।”

समाज में नारी जितनी सशक्त और सम्मानित होगी, समाज और राष्ट्र उतना ही विकसित और मजबूत बनेगा। महान विचारकों ने भी नारी के महत्व को स्वीकार किया है।

मुंशी प्रेमचंद ने लिखा — “स्त्री पुरुष से उतनी ही श्रेष्ठ है, जितना प्रकाश अंधेरे से।”

अरस्तु के अनुसार — “नारी की उन्नति और गरिमा पर ही राष्ट्र की उन्नति निर्भर करती है।”

नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा — “मुझे सौ योग्य माताएं दे दो, मैं तुम्हें एक महान राष्ट्र दूंगा।”

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का कथन है — “नारी राष्ट्र की आत्मा है।”

आज भारत की अर्थव्यवस्था में भी महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2026 तक भारत की GDP में महिलाओं का योगदान लगभग 35 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जो नारी शक्ति के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।

नारी से नारायणी की यह यात्रा निरंतर जारी है। प्राचीन ग्रंथों की प्रेरणा आज के आधुनिक समाज को भी दिशा दे रही है। जब महिलाएं सशक्त होंगी तो परिवार सशक्त होगा, और जब परिवार सशक्त होगा तो एक नए और समृद्ध समाज का निर्माण होगा।

वास्तव में नारी केवल जीवन की सहचरी ही नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति की सृजनकर्ता शक्ति है। अपने श्रम, त्याग, प्रेम और सृजनशीलता से नारी ने सदैव संसार को सुंदर और संतुलित बनाने का कार्य किया है।

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