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ऑफिस टाइम के बाहर आज़ादी: ‘राइट टू डिस्कनेक्ट 2025’ बिल पेश

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महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 7 दिसंबर 2028

भारत में जिस मुद्दे पर लाखों कर्मचारी वर्षों से अनकही लड़ाई लड़ रहे थे—ऑफिस टाइम के बाहर काम करने की मजबूरी—वह अब संसद में औपचारिक बहस का हिस्सा बनता दिख रहा है। शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में शुक्रवार को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) की सांसद सुप्रिया सुले ने एक बेहद महत्वपूर्ण Private Member’s Bill पेश किया, जिसका है ‘राइट टू डिस्कनेक्ट 2025’। यह बिल आधुनिक कार्य संस्कृति, मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तिगत समय और कार्यक्षेत्र में संतुलन के लिए एक निर्णायक हस्तक्षेप की कोशिश है। भारत जैसे तेज़ी से विकसित होते देश में 10–12 घंटे काम करना सामान्य माना जाता है, कई कॉर्पोरेट सेक्टरों में ‘वर्क फ्रॉम होम’ ने ऑफिस और घर की सीमाएं पूरी तरह खत्म कर दी हैं। लाखों कर्मचारी रोज़मर्रा में नामऑफिस टाइम के बाद आने वाली कॉल और ईमेल उठाने के लिए मजबूर होते हैं, और न उठाने पर उनके करियर और मूल्यांकन पर असर पड़ने का डर बना रहता है। इस सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता के बीच, यह बिल एक बेहद साहसिक कदम माना जा रहा है।

सुप्रिया सुले के प्रस्तावित विधेयक का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी प्रणाली बनाना है जिसमें हर कर्मचारी को यह कानूनी अधिकार मिले कि वह ऑफिस टाइम के बाद आने वाली कॉल, ईमेल और वर्क-रिक्वेस्ट को न कह सके—और यह उसे नौकरी में किसी भी प्रकार की सज़ा, निशानदेही या प्रताड़ना के डर के बिना मिल सके। बिल में स्पष्ट कहा गया है कि रात, छुट्टी, वीकेंड और डिक्लेयर्ड लीव के दौरान कर्मचारी पूरी तरह से ‘कार्य भार से मुक्त’ रहेंगे। इस बिल के अनुसार, किसी भी कर्मचारी को उसके नियमित कार्य समय के बाहर काम के लिए बाध्य करना अवैध माना जाएगा, और ऐसे मामलों को रोकने व शिकायत निवारण के लिए एक स्वतंत्र “Employees’ Welfare Authority” बनाई जाएगी। यह प्राधिकरण न सिर्फ नियम तय करेगा, बल्कि कंपनियों के आचारसंहिता की निगरानी, शिकायतों का निपटारा और कर्मचारियों की सुरक्षा का दायित्व भी निभाएगा।

इस प्रस्ताव की पृष्ठभूमि बेहद अहम है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) की 2023 रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में कार्य-समय और मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध पाया गया और बताया गया कि औसतन 27% कर्मचारी कार्यस्थल के तनाव के कारण मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते हैं—भारत में यह प्रतिशत 35% से भी ऊपर माना जाता है। LinkedIn Workforce Confidence Survey 2024 में सामने आया कि भारत में 82% प्रोफेशनल्स को “ऑफिस-टाइम के बाद भी उपलब्ध रहने का दबाव” महसूस होता है। इसी सर्वे में यह तथ्य भी आया कि भारत के IT सेक्टर में लगभग 9% कर्मचारियों को रात में 10 बजे के बाद वर्क-स्टिक्ट निर्देश मिलते हैं। यह स्थितियाँ कर्मचारी-बर्नआउट, परिवार से दूरी, खराब मानसिक स्वास्थ्य, और उत्पादकता में गिरावट का कारण बनती हैं। यानि यह बिल सिर्फ ‘कॉल न उठाने’ की बात नहीं करता, बल्कि भारतीय कार्य-संस्कृति में मौजूद एक पुरानी समस्या—“हमेशा उपलब्ध रहने की मजबूरी”—के खिलाफ खड़ा है।

बिल के आने का एक और बड़ा कारण यह है कि कई विकसित देश पहले ही “राइट टू डिस्कनेक्ट” को कानून का दर्जा दे चुके हैं। फ्रांस ने 2017 में इसे आधिकारिक तौर पर अपनाया, जिसके तहत कंपनियों को एक ‘चार्टर’ बनाना पड़ता है कि कर्मचारी किन समयों में काम से मुक्त रहेंगे। इटली, जर्मनी, नीदरलैंड्स और आयरलैंड ने भी इसी तरह के सुरक्षा कानून बनाए हैं। भारत में इसके विपरीत अब भी यह आम धारणा है कि “अगर बॉस कॉल करे तो उठाना जरूरी है”। यह बिल पहली बार कर्मचारियों को स्पष्ट संदेश देता है कि काम की सीमा तय करना अधिकार है, बगावत नहीं।

लेकिन यह पूरा मामला सिर्फ कल्याण और संवेदनशीलता का ही नहीं है—बल्कि कॉर्पोरेट सेक्टर के भीतर एक लंबे समय से चल रही बहस का हिस्सा है। कई उद्योगपति यह तर्क देते हैं कि भारत जैसी वैश्विक अर्थव्यवस्था में समय और संचार की लचीलापन ज़रूरी है। IT, BPO और डिजिटल सेक्टर में कार्य समय की अनिश्चितता को अक्सर “इंडस्ट्री नेचर” कहा जाता है। ऐसे में यह बिल कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच “कार्य सीमाओं” की एक नई सौदेबाज़ी को जन्म दे सकता है। फिर भी यह स्पष्ट है कि कर्मचारियों की संतुलित ज़िंदगी, मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक समय को प्राथमिकता दिए बिना भारत की कार्य संस्कृति टिकाऊ नहीं हो सकती। और यह बिल इसी दिशा में एक संरचनात्मक बदलाव की मांग करता है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह बिल महत्वपूर्ण है क्योंकि Private Member’s Bills शायद ही कभी कानून बन पाते हैं। लेकिन वे बहस को दिशा देते हैं और सामाजिक मुद्दों पर सरकार को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर कर सकते हैं। अगर यह बिल बहस के लिए स्वीकार होता है, तो यह भारत में कार्य-जीवन संतुलन पर पहली बड़ी संसदीय चर्चा होगी। यह ऐसे समय में हो रहा है जब भारत में कर्मचारियों के अधिकारों पर बहस बढ़ी है—चाहे वह गिग वर्कर्स का मुद्दा हो, फ्लेक्सी-वर्किंग रूल्स हो, रिमोट-वर्कर्स का ओवरटाइम हो या कॉर्पोरेट हाउसों की कठोर नीतियाँ।

आखिरकार यह बिल सिर्फ़ कॉल और ईमेल से छुटकारे का कानून नहीं है—यह भारत में बदलती जीवनशैली, मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक जीवन, व्यक्तिगत आज़ादी और कॉर्पोरेट संस्कृति के टकराव के बीच खड़े एक बड़े सवाल का उत्तर खोजने की कोशिश है: “क्या कोई कर्मचारी मशीन है या इंसान?” और शायद पहली बार भारतीय संसद में कोई राजनीतिक नेता इस मुद्दे को उठाने की हिम्मत कर रहा है।

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