महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 9 नवंबर 2025
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के नाम पर आज पूरा देश गर्व करता है, राजनीतिक दल उनसे प्रेरणा लेने की बातें करते हैं और मंचों पर उनके चित्र सजाते हैं। लेकिन इतिहास का सच इससे कहीं अधिक गहरा, जटिल और निर्णायक है—और इस सत्य के केंद्र में खड़ा है कांग्रेस का वह सक्रिय संघर्ष, जिसने इंग्लैंड की औपनिवेशिक हुकूमत के सामने बगैर डरे भगत सिंह की फांसी को रोकने की कोशिश की। यह वही दौर था जब स्वतंत्रता आंदोलन का हर क्षण घुटन, भय और क्रूर दमन से भरा हुआ था, पर इसके बावजूद कांग्रेस के चार शीर्ष नेताओं ने खुलकर भगत सिंह के समर्थन में आवाज उठाई। यह तथ्य किसी पार्टी की तारीफ नहीं, बल्कि इतिहास का मुकम्मल दस्तावेज़ी चित्रण है।
सबसे पहले आते हैं महात्मा गांधी पर—कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने वायसराय लॉर्ड इरविन से औपचारिक मुलाकात कर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी को निलंबित करने, दया दिखाने और सजा कम करने की मांग रखी। यह वह दौर था जब ब्रिटिश सरकार गांधीजी की हर मांग को राजनीतिक साज़िश समझती थी, और भगत सिंह को क्रूर आतंकवादी कहकर बदनाम करती थी। इसके बावजूद, गांधी ने प्रत्यक्ष रूप से वायसराय के सामने यह मुद्दा उठाया, जबकि हुकूमत यह उम्मीद कर रही थी कि गांधी इसे अपनी राजनीतिक बातचीत का हिस्सा नहीं बनाएँगे। यह मुलाकात सिर्फ औपचारिकता नहीं थी—यह एक नैतिक और राजनीतिक साहस का कदम था।
इसके बाद आते हैं पंडित जवाहरलाल नेहरू, जो सिर्फ देश के भावी प्रधानमंत्री नहीं थे बल्कि उस समय एक युवा, उग्र और वैचारिक रूप से प्रगतिशील नेता थे। नेहरू ने लाहौर सेंट्रल जेल जाकर भगत सिंह से मुलाकात की। यह आम राजनीतिक मुलाकात नहीं थी—यह एक ऐसे क्रांतिकारी के साथ संवाद था जिसे देश का युवा प्रतीक मान रहा था और जिसे ब्रिटिश राज ने खतरा समझ रखा था। जेल से बाहर आने के बाद नेहरू ने खुले मंच से ब्रिटिश सरकार की आलोचना की और साफ कहा कि “भगत सिंह भारत की नई चेतना का प्रतीक है”—यह बयान अंग्रेज़ों को बेहद अखरा, लेकिन नेहरू पीछे नहीं हटे।
इतिहास की इस कड़ी में तीसरा बड़ा नाम है सुभाष चंद्र बोस—कांग्रेस अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नेता और स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे दृढ़ चरित्रों में से एक। सुभाष बाबू ने भगत सिंह की फांसी को “भारत की आत्मा पर वार” कहा और कोलकाता सहित कई शहरों में विशाल सभाएँ आयोजित कीं। उन्होंने मंचों से स्पष्ट कहा कि भारत का कोई आंदोलन तब तक पूर्ण नहीं हो सकता जब तक भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी युवाओं को सम्मान नहीं मिलता। बोस की आवाज़ इतनी प्रभावशाली थी कि ब्रिटिश सरकार ने उनके भाषणों को सेंसर करने का आदेश जारी कर दिया।
चौथी कड़ी आती है सरदार वल्लभभाई पटेल की—जो सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि 1930 के दशक में संगठनात्मक शक्ति के केंद्र थे। उनके नेतृत्व में कांग्रेस के अधिवेशन में भगत सिंह के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें ब्रिटिश सरकार से फांसी पर पुनर्विचार की मांग, क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति और उनके साथ किए जा रहे अमानवीय व्यवहार पर कड़ी आपत्ति दर्ज की गई। यह प्रस्ताव कांग्रेस की आधिकारिक नीति का हिस्सा बना—जो उस दौर के लिए अत्यंत साहसिक कदम था, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ऐसे प्रस्तावों को सीधे विद्रोह की श्रेणी में देखती थी।
लेकिन अब आता है इतिहास का वह दर्दनाक और असहज हिस्सा, जिस पर आज भी सवाल उठते हैं:
जब कांग्रेस के प्रमुख नेता एक-एक करके, लगभग जोखिम उठाते हुए भगत सिंह के लिए आवाज उठा रहे थे,
जब भारत की जनता भगत सिंह की फांसी को रोकने के लिए सड़कों पर थी, जब देश का माहौल क्रांतिकारी ऊर्जा और गुस्से से भरा था— तब RSS, हिंदू महासभा और बाद में जनसंघ की वैचारिक धारा से जुड़े नेताओं की ओर से एक भी शब्द क्यों नहीं आया?
सवाल इतिहास पूछता है—और आज भी उसका जवाब नहीं मिला:
इतिहासकार कहते हैं कि उस दौर की हिंदू महासभा और RSS की प्राथमिकताएँ पूरी तरह अलग थीं—वे अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ बड़े जनांदोलनों में शामिल नहीं थे। इसलिए भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के लिए उनकी चुप्पी उस वैचारिक दूरी का प्रतीक है, जिसे आज भले ही छिपाने की कोशिश हो, पर दस्तावेज़ों में वह चुप्पी अब भी दर्ज है।
क्यों सावरकर ने भगत सिंह की फांसी पर एक भी बयान नहीं दिया?
वीर सावरकर का नाम अक्सर दक्षिणपंथी राजनीति और हिंदुत्व विचारधारा के प्रमुख स्तम्भ के रूप में लिया जाता है, लेकिन भगत सिंह की फांसी, उनकी गिरफ्तारी, उनके ट्रायल या उनके आंदोलन पर सावरकर का कोई भी समर्थन या बयान इतिहास में दर्ज नहीं मिलता। यह वह दौर था जब पूरा देश भगत सिंह की फांसी पर आक्रोश में था—प्रदर्शन हो रहे थे, सभाएँ हो रही थीं, और कांग्रेस नेतृत्व वामपंथी और समाजवादी समूह लगातार ब्रिटिश सरकार से टकरा रहे थे। इसके बावजूद सावरकर ने न तो किसी मंच से बोलना चुना और न किसी लेख या अपील में भगत सिंह के पक्ष में खड़े हुए।
इतिहासकारों का मत है कि सावरकर 1911 की क्षमा-याचनाओं के बाद ब्रिटिश सत्ता के प्रति बेहद सावधान थे और कभी भी उस प्रकार के उग्र आंदोलन का समर्थन नहीं करते थे जिसे अंग्रेज़ “राजद्रोह” या “आतंकवादी गतिविधि” मानते। इस कारण वह भगत सिंह की कार्यशैली और क्रांतिकारी हिंसा के साथ परिस्थितिजन्य दूरी बनाए रहे। यह दूरी इतनी स्पष्ट थी कि एक क्रांतिकारी की फांसी पर भी उन्होंने सार्वजनिक संवेदना नहीं जताई। यह मौन आज भी बहस और आलोचना का केंद्र है।
क्यों डॉ. हेडगेवार—RSS के संस्थापक—ने भगत सिंह के समर्थन में न सभा की, न विरोध जताया, न वक्तव्य दिया?
डॉ. के.बी. हेडगेवार उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण कर रहे थे, लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि RSS अपने आरंभिक दिनों में सीधे राजनीतिक और स्वतंत्रता आंदोलन से दूर रहने की नीति पर काम करता था। संगठन का मुख्य फोकस “हिंदू सामाजिक एकता” पर था, न कि ब्रिटिश शासन का प्रत्यक्ष प्रतिरोध। यही कारण है कि भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर उठी जनभावना के बावजूद हेडगेवार ने किसी सभा, प्रदर्शन या आधिकारिक वक्तव्य के माध्यम से अपनी स्थिति प्रकट नहीं की।
इतिहासकारों द्वारा यह भी उल्लेख है कि RSS ने स्वतंत्रता आंदोलन, औपनिवेशिक दमन, लाठी-गोली, जेल-यात्राओं या क्रांतिकारी संघर्षों में कोई सामूहिक भागीदारी नहीं की। जबकि भगत सिंह की फांसी उस युग का सबसे भावनात्मक और राजनीतिक रूप से विस्फोटक मुद्दा थी, RSS का इस पर पूर्ण मौन यह दर्शाता है कि वह क्रांतिकारी राष्ट्रवादी आंदोलनों के साथ नहीं खड़ा था। इस मौन को आलोचक “नैतिक तटस्थता” नहीं, बल्कि “राजनीतिक परहेज़” मानते हैं।
क्यों गोलवलकर ने अपने लेखन, भाषण या विचार-साहित्य में भगत सिंह को कभी उल्लेखनीय स्थान नहीं दिया?
एम.एस. गोलवलकर, जिन्हें गुरु गोलवलकर कहा जाता है, RSS के दूसरे सरसंघचालक और उसके वैचारिक संरक्षक माने जाते हैं। उनका साहित्य—“We or Our Nationhood Defined”, “Bunch of Thoughts” और अन्य प्रवचन—हिंदुत्व विचारधारा के आधिकारिक दस्तावेज़ समझे जाते हैं। लेकिन इनमें कहीं भी भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव या किसी भी क्रांतिकारी आंदोलन के प्रति सहानुभूति या समर्थन का उल्लेख नहीं मिलता।
गोलवलकर का वैचारिक ढांचा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित था, न कि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध उग्र राजनीतिक संघर्ष पर। वह कांग्रेस के जनांदोलनों, जेल-यात्राओं और क्रांतिकारी गतिविधियों दोनों से दूरी रखते थे। इसलिए उनके लेखन में भगत सिंह का अनुपस्थित होना सिर्फ “छूट जाना” नहीं बल्कि एक सुनियोजित वैचारिक चयन माना जाता है। जहां भगत सिंह का नायकत्व जनता के लिए स्वतंत्रता और विद्रोह का प्रतीक था, वहीं गोलवलकर को यह आंदोलन राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से अलग लगता था। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में भगत सिंह का सम्मानजनक उल्लेख तक नहीं मिलता।
क्यों श्यामा प्रसाद मुखर्जी—जनसंघ के संस्थापक—ने भगत सिंह के समर्थन में कोई ध्यान, बयान या अभिव्यक्ति नहीं दी?
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का राजनीतिक उदय 1930–40 के दशक में हुआ, जब भगत सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका था। उस समय मुखर्जी हिंदू महासभा में एक प्रभावशाली पद पर थे, लेकिन भगत सिंह की फांसी या उसके बाद के जनआंदोलनों पर उनका कोई भी सार्वजनिक वक्तव्य दर्ज नहीं है।
इतिहासकार बताते हैं कि हिंदू महासभा और ब्रिटिश सरकार के कई चरणों में सहयोगी संबंध रहे—विशेषकर बंगाल और अन्य प्रांतों की सरकारों के संदर्भ में। उसी दौर में मुखर्जी ब्रिटिश-समर्थित प्रांतीय मंत्रालयों में मंत्री रहे। ऐसे में भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी—जिन्हें ब्रिटिश शासन ने सबसे बड़ा “खतरा” माना—उनके समर्थन में मुखर्जी की चुप्पी उनकी राजनीतिक स्थिति और ब्रिटिश प्रशासन से समीकरणों को दर्शाती है।
यह चुप्पी आज भी आलोचकों के लिए एक बड़ा प्रश्न है—जब स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी आवाजें भगत सिंह के लिए बोल रही थीं, तब दक्षिणपंथी नेतृत्व क्यों “सुरक्षित दूरी” बनाए रहा?
साफ संदेश
कांग्रेस के चार अध्यक्ष—गांधी, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल—ने भगत सिंह के समर्थन में वायसराय से मुलाकात, जेल में जाकर उनका हाल जानना, विशाल जनसभाएँ आयोजित करना और आधिकारिक प्रस्ताव पारित करना जैसे साहसिक कदम उठाए, जो आज भी स्वतंत्रता संग्राम के दस्तावेज़ों में दर्ज हैं; इसके उलट RSS, हिंदू महासभा और जनसंघ की ओर से उस दौर में एक भी बयान, समर्थन, सभा या विरोध तक सामने नहीं आया, जिससे उनकी ऐतिहासिक चुप्पी और भी गहरी हो जाती है। आज जब राजनीतिक मंचों पर भगत सिंह के नाम का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है, तब यह प्रश्न और तीखा हो उठता है—“जब भगत सिंह को देश की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब कौन उनके साथ खड़ा था और कौन खामोश?”—क्योंकि इतिहास केवल तारीखों से नहीं, बल्कि उस वक्त दिखाई गई हिम्मत और उस वक्त की गई चुप्पी से लिखा जाता है।




