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पूर्व थलसेनाध्यक्ष नरवणे के संस्मरण से सनसनी: लद्दाख में टैंकों के सामने सेना, ऊपर से ‘कोई निर्देश नहीं’

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एबीसी नेशनल पार्क | 2 फरवरी 2026

नई दिल्ली। पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण ‘Four Stars of Destiny’ से जुड़े एक अंश ने 2020 के पूर्वी लद्दाख संकट को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संस्मरण के मुताबिक, अगस्त 2020 में रेज़िन ला (Rechin La) के पास चीनी टैंकों की तेज़ बढ़त के दौरान भारतीय सेना को शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व से स्पष्ट और ठोस निर्देश नहीं मिले। हालात ऐसे थे कि युद्ध छिड़ने की आशंका के बीच सेना नेतृत्व लगातार “स्पष्ट आदेश” मांगता रहा, लेकिन देर तक कोई निर्णायक हरी झंडी या रोक-टोक नहीं आई।

संस्मरण में बताया गया है कि 31 अगस्त 2020 की शाम उत्तरी कमान प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी को सूचना मिली कि चार चीनी टैंक पैदल सेना के समर्थन के साथ रेज़िन ला की ओर बढ़ रहे हैं। यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है, जहां हर मीटर ऊंचाई सामरिक बढ़त तय करती है। भारतीय जवानों ने चेतावनी के तौर पर इल्यूमिनेटिंग राउंड फायर किए, लेकिन चीनी टैंक नहीं रुके। स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी और टैंक कुछ ही समय में शीर्ष के बेहद करीब पहुंच गए।

जनरल नरवणे लिखते हैं कि उन्होंने रक्षा मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और अन्य शीर्ष अधिकारियों से संपर्क कर बार-बार पूछा—“मेरे आदेश क्या हैं?” ऑपरेशनल स्तर पर विकल्पों पर विचार हो रहा था, तोपखाने के इस्तेमाल की तैयारी भी थी, लेकिन चीन के साथ आर्टिलरी ड्यूल के दूरगामी और खतरनाक परिणाम हो सकते थे। सेना के पास संसाधन और तैयारी थी, पर सवाल यह था कि क्या राजनीतिक स्तर पर युद्ध जैसे कदम की अनुमति है।

संस्मरण के अनुसार, रात 9:25 बजे फिर से स्पष्ट निर्देश मांगने पर भी कोई ठोस जवाब नहीं मिला। इसी बीच चीनी पीएलए कमांडर की ओर से ‘कूलिंग डाउन’ का संदेश आया, जिसमें दोनों पक्षों के रुकने और स्थानीय कमांडरों की बैठक का प्रस्ताव था। इसे एक संभावित ‘ऑफ-रैंप’ माना गया, लेकिन तब तक चीनी टैंक आगे बढ़ते रहे। समय बीतता गया, हर मिनट तनाव बढ़ता गया।

जनरल नरवणे ने लिखा है कि 10:30 बजे रक्षा मंत्री की ओर से प्रधानमंत्री से बात होने के बाद जो निर्देश मिला, वह बेहद संक्षिप्त था—“जो उचित समझो, वो करो।” उनके अनुसार, इतने बड़े सैन्य निर्णय में यह जिम्मेदारी सेना पर छोड़ देना असामान्य था। संस्मरण में तुलना करते हुए कहा गया है कि 1962, 1971 और 1999 जैसे संघर्षों में युद्ध से जुड़े फैसले कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी में विस्तार से चर्चा के बाद लिए गए थे और सेना को स्पष्ट राजनीतिक दिशा मिली थी।

इस खुलासे के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या लद्दाख जैसे संवेदनशील मोर्चे पर राजनीतिक नेतृत्व की ओर से स्पष्टता की कमी रही? क्या “पूरी तरह सैन्य फैसला” कहकर जिम्मेदारी सेना पर डाल देना सही था? विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे हालात में अस्पष्ट निर्देश न केवल जोखिम बढ़ाते हैं, बल्कि नियंत्रण रेखा पर किसी भी गलत आकलन को बड़े संघर्ष में बदल सकते हैं।

यह संस्मरण सामने आने के बाद रक्षा और राजनीतिक हलकों में बहस तेज़ हो गई है। सरकार की ओर से अभी इस पर औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन लद्दाख संकट के दौरान निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठे ये सवाल आने वाले दिनों में राजनीतिक और सामरिक विमर्श का केंद्र बन सकते हैं।

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