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महिला को जबरन गर्भ जारी रखने को मजबूर करना उसके शरीर और मन दोनों पर हमला है: दिल्ली हाईकोर्ट

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सुमन कुमार | नई दिल्ली 8 जनवरी 2026

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और अहम मामले में साफ शब्दों में कहा है कि किसी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक स्वतंत्रता (bodily integrity) का सीधा उल्लंघन है और इससे महिला को गंभीर मानसिक पीड़ा और आघात झेलना पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि गर्भावस्था सिर्फ एक जैविक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह महिला के शरीर, मन, भावनाओं और पूरे जीवन को गहराई से प्रभावित करने वाला अनुभव है, इसलिए इस पर फैसला लेने का अधिकार सबसे पहले और सबसे ज्यादा उसी महिला का होना चाहिए।

अदालत ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें महिला ने गर्भपात की अनुमति मांगी थी। कोर्ट ने माना कि अगर किसी महिला को उसकी परिस्थितियों, मानसिक स्थिति और इच्छा के बावजूद गर्भ जारी रखने को कहा जाता है, तो यह उसके सम्मान, गरिमा और निजी फैसलों में जबरन दखल है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान हर महिला को अपने शरीर से जुड़े फैसले खुद लेने का अधिकार देता है, और राज्य या समाज को इस अधिकार में बेवजह हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

कोर्ट ने यह बात खास तौर पर रेखांकित की कि अनचाही गर्भावस्था महिला के लिए केवल शारीरिक बोझ नहीं होती, बल्कि इससे उसका मानसिक स्वास्थ्य भी बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। डर, तनाव, अवसाद और भविष्य को लेकर चिंता—ये सब उस महिला के जीवन का हिस्सा बन जाते हैं, जिसे अपनी मर्जी के खिलाफ गर्भ ढोने के लिए मजबूर किया जाता है। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में महिला की मानसिक पीड़ा को नजरअंदाज करना अमानवीय है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून का मकसद महिलाओं को सजा देना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षा और सम्मान देना है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून का उद्देश्य भी यही है कि महिलाओं को सुरक्षित, कानूनी और सम्मानजनक तरीके से फैसले लेने की आज़ादी मिले। कोर्ट ने कहा कि कानून की व्याख्या करते समय महिला के हित, उसकी सेहत और उसकी गरिमा को सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए।

यह फैसला उन लाखों महिलाओं के लिए एक मजबूत संदेश है, जो सामाजिक दबाव, पारिवारिक मजबूरी या कानूनी उलझनों के कारण अपनी आवाज़ दबाने पर मजबूर हो जाती हैं। दिल्ली हाईकोर्ट का यह रुख बताता है कि न्यायपालिका महिलाओं के शरीर पर उनके अधिकार, उनकी मानसिक शांति और सम्मानजनक जीवन के पक्ष में खड़ी है। यह फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि इंसानियत और संवेदनशीलता की एक अहम मिसाल है।

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