पुणे/ मुंबई 22 अक्टूबर 2025
पुणे से आई यह खबर न केवल महाराष्ट्र के एक किसान की व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि यह मोदी सरकार के तहत कृषि संकट और आर्थिक असमानता की भयावह तस्वीर को सामने रखती है। एक किसान ने अपनी पूरी मेहनत, उम्मीद और ₹66,000 की पूंजी झोंककर प्याज की फसल लगाई, लेकिन जब उसे बेचने की बारी आई, तो मंडी में उसे कुल आय महज ₹664 मिली। यानी, किसान की मेहनत, पसीना और पूंजी सब मिट्टी में मिल गई, और बचा सिर्फ कर्ज़ और निराशा का असहनीय बोझ। इस किसान ने अकेले ₹1,500 ट्रक किराया देकर मंडी तक पहुँचने का खर्च वहन किया था, लेकिन उसकी शुद्ध आय नकारात्मक रही। यह घटना सीधे तौर पर उस “दोगुनी आमदनी” के सरकारी नारे पर प्रश्नचिह्न लगाती है जो मोदी सरकार ने किसानों को दिखाया था।
देश की अर्थव्यवस्था के “रीढ़” कहलाने वाले किसान आज “रद्दी” समझे जा रहे हैं, जबकि एक तरफ बड़े उद्योगपतियों को रिकॉर्ड राहत पैकेज, टैक्स में भारी छूट और अरबों की सब्सिडी मिलती है, वहीं दूसरी तरफ किसान अपनी ही फसल के लिए भीख मांगने को मजबूर है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि देश में आर्थिक नीतियाँ किस दिशा में जा रही हैं: उद्योगपति ‘चाँद पर कारोबार’ करने का सपना देख रहे हैं, जबकि किसान धरती पर दाना-दाना तरस रहा है।
सरकारी उदासीनता और नीतिगत विसंगति: कृषि संकट का गहराता चक्र
किसान की यह त्रासदी केवल प्राकृतिक आपदा (जैसे अत्यधिक बारिश) का परिणाम नहीं है, बल्कि सरकारी उदासीनता और कृषि नीति में मौजूद विसंगतियों का गहरा चक्र है। एक तरफ, सरकार ने कृषि लागत जैसे डीजल, उर्वरक और कीटनाशकों पर जीएसटी बढ़ाकर किसानों का खर्च कई गुना बढ़ा दिया है, वहीं दूसरी तरफ, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी और बाज़ार हस्तक्षेप योजना पूरी तरह से विफल रही है। खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता हितों के नाम पर अक्सर प्याज जैसी फसलों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है या आयात शुल्क कम कर दिया जाता है, जिससे घरेलू बाज़ार में कीमतों में अचानक गिरावट आती है और इसका सीधा नुकसान उत्पादक किसानों को उठाना पड़ता है।
यह नीतिगत अस्थिरता किसान को न तो निश्चित मूल्य की गारंटी देती है और न ही निश्चित बाज़ार की। सरकार का मूल नारा “जय जवान, जय किसान” हुआ करता था, लेकिन आज की हकीकत “जय पूंजीपति, मरे किसान” में बदल चुकी है। कभी प्याज के दाम बढ़ने पर बीजेपी विपक्ष पर जमकर हमला करती थी, आज उन्हीं के शासन में प्याज किसानों की कमर और आत्मा दोनों टूट चुकी हैं, और सवाल अब सिर्फ प्याज के दाम का नहीं, बल्कि किसान के अस्तित्व का बन गया है।
आर्थिक असमानता का कड़वा सच: किसान की थाली खाली, उद्योगपति की तिजोरी भरी
यह घटना भारत में मौजूद गहरी होती आर्थिक असमानता का कड़वा सच है, जहाँ सरकार का पूरा ध्यान कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों के पूंजीगत विकास पर केंद्रित है, जबकि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था उपेक्षित है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की नीतियाँ उत्पादन केंद्रित होने के बजाय पूंजी केंद्रित हो गई हैं, जिससे मुनाफे का बड़ा हिस्सा किसानों से निकलकर ट्रेडर्स और बड़े कॉर्पोरेट्स की जेब में जा रहा है।
किसान को न तो उसकी लागत का सही मूल्य मिल रहा है, और न ही उसे कर्ज़ से मुक्ति मिल रही है। यह स्थिति भारत के मेहनतकश समाज की खुली लूट है, और सत्ता में बैठे लोगों की संवेदनहीनता का प्रतीक है। यह ‘अमृतकाल’ में भी किसान की थाली खाली होने का स्पष्ट सबूत है। नया भारत वह नहीं हो सकता, जहाँ उद्योगपति उड़ान भरें और किसान अपने ही खेत में दफन हो जाए। यह नैतिक और आर्थिक विसंगति देश के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है और यह एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है: क्या सरकार भारत के अन्नदाता को बचाने के लिए कोई गंभीर नीतिगत पहल करेगी, या फिर किसान इसी तरह मुनाफे की बलि चढ़ता रहेगा?




