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मोदानी मेगास्कैम का विस्फोटक खुलासा: LIC की तिजोरी खाली कर अडानी साम्राज्य को कृत्रिम सहारा

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कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके ‘पसंदीदा’ उद्योगपति गौतम अडानी पर देश के वित्तीय इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे घिनौना हमला बोला है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और महासचिव जयराम रमेश ने इस संगठित लूट को “मोदानी मेगास्कैम” नाम देते हुए, सीधे आरोप लगाया कि भारत की सबसे भरोसेमंद बीमा कंपनी एलआईसी (LIC) के करोड़ों पॉलिसीधारकों की गाढ़ी कमाई के ₹33,000 करोड़ रुपये को अडानी समूह के डूबते साम्राज्य में जबरन ठूंसा गया। रमेश ने इस कार्रवाई को ‘निवेश’ नहीं, बल्कि सत्ता द्वारा प्रायोजित एक गहरी साजिश बताया, जिसका एकमात्र लक्ष्य था — वैश्विक आलोचना और वित्तीय संकट से जूझ रहे अडानी समूह के लिए ‘सरकारी विश्वास’ और ‘स्थिरता’ की झूठी दीवार खड़ी करना। यह शर्मनाक खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब अडानी समूह पहले से ही विदेशी जांच एजेंसियों की निगरानी में है और उस पर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे हैं, जिससे देश के 30 करोड़ बीमाधारकों की भविष्य की बचत पर सीधा और तत्काल खतरा मंडरा रहा है। यह केवल एक वित्तीय अनियमितता नहीं है, यह सार्वजनिक धन का राजनीतिक हितों के लिए किया गया सबसे नंगा दुरुपयोग है।

‘जनता का पैसा, दोस्त का कारोबार’: राजनीतिक डकैती से हुआ ‘बेलआउट’

जयराम रमेश ने इस पूरी प्रक्रिया को देश की वित्तीय प्रणाली पर राजनीतिक डकैती करार दिया। उन्होंने चीखकर कहा कि यह कोई सामान्य कारोबारी निर्णय हो ही नहीं सकता, बल्कि यह राजनीतिक दबाव में किया गया जनता की बचत का सबसे बड़ा बलिदान है — एक उद्योगपति की डूबती नाव को बचाने का निर्लज्ज प्रयास। उन्होंने खुलासा किया कि मई 2025 में, भारतीय नौकरशाही के अधिकारियों को हड़बड़ी में एलआईसी फंड को अडानी कंपनियों में लगाने का प्रस्ताव तैयार करने और जबरन पास करवाने का सीधा आदेश दिया गया था। 

रमेश ने इसे “मोबाइल फोन बैंकिंग का क्लासिक उदाहरण” बताया, जिसका स्पष्ट अर्थ है कि देश की संस्थागत स्वायत्तता पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और ऊपर से आए एक इशारे पर सरकारी संस्थाएं कठपुतली बन जाती हैं। रमेश ने प्रधानमंत्री मोदी से सीधा सवाल पूछा कि “वित्त मंत्रालय और नीति आयोग के अधिकारियों पर किसका दबाव था? उन्हें क्यों यह जिम्मेदारी दी गई कि वे एक ऐसे निजी समूह को बचाएं जिस पर अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग के सबसे गंभीर आरोप लगे हैं?” यह ‘क्रोनी कैपिटलिज़्म’ (मित्र पूंजीवाद) का सबसे घिनौना, सबसे खतरनाक रूप है, जहाँ सत्ता और संपत्ति मिलकर देश के नागरिकों के हितों को रौंदते हैं।

एलआईसी पर ₹7,850 करोड़ का घातक वार: करोड़ों भारतीयों के भविष्य पर हमला

कांग्रेस प्रवक्ता ने इस राजनीतिक “षड्यंत्र” की आर्थिक मार को सार्वजनिक करते हुए बताया कि इसका सबसे बड़ा खामियाजा सीधे-सीधे देश की आम जनता ने भुगता है। उन्होंने बताया कि सितंबर 2024 में जब अडानी और उनके सात सहयोगियों पर अमेरिका में अभियोग दर्ज हुआ, तब सिर्फ चार घंटे के ट्रेडिंग में एलआईसी को ₹7,850 करोड़ का त्वरित और घातक नुकसान उठाना पड़ा। रमेश ने इस कृत्य को “आर्थिक देशद्रोह” करार दिया और दहाड़ते हुए कहा कि “मोदी सरकार ने जनता की पॉलिसियों का पैसा अपने पसंदीदा उद्योगपति की रक्षा में झोंक दिया। यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के भविष्य पर किया गया सीधा हमला है।” 

उन्होंने प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए यह भी आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने अमेरिकी SEC के समन का जवाब देने से लगातार इनकार किया, जबकि अडानी समूह पर ₹2,000 करोड़ की रिश्वत योजना का गंभीर आरोप है। रमेश के अनुसार, यह पूरा मामला एलआईसी जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को तार-तार कर देता है, यह साबित करता है कि जनता का भरोसा अब सत्ता के निजी स्वार्थों की वेदी पर बलि चढ़ चुका है।

‘मोदानी मेगास्कैम’ — एक संगठित राष्ट्र-विरोधी हमला, एजेंसियां बनीं निजी मोहरे

जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक वित्तीय चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और संगठित ‘मेगास्कैम’ है, जिसमें केंद्र की कई प्रमुख एजेंसियां एक निजी कंपनी के मोहरे के रूप में शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह घोटाला कई मोर्चों पर देश के हितों पर घातक वार करता है: ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग जैसी जांच एजेंसियां अब खुलेआम अन्य कंपनियों पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल की जा रही हैं, ताकि वे अपनी बहुमूल्य संपत्तियाँ अडानी समूह को औने-पौने दामों पर बेचने पर मजबूर हो जाएं।

 देश के प्रमुख एयरपोर्ट, पोर्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर के निजीकरण में खुलेआम धांधली की गई ताकि केवल एक ही समूह को एकाधिकार मिल सके। इसके अलावा, मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क से जुड़ी शेल कंपनियों के जरिये ओवर-इनवॉइस्ड कोयले का आयात कराया गया, जिससे देश में बिजली की कीमतें आसमान छूने लगीं। राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और बिहार) में अडानी को असामान्य दामों पर बिजली आपूर्ति के सौदे दिए गए, और बिहार में तो पावर प्लांट के लिए जमीन ₹1 प्रति एकड़ में आवंटित की गई। यह सब सत्ता और पूंजी की सबसे गहरी और शर्मनाक सांठगांठ का प्रमाण है।

JPC जांच से भागना यानी षड्यंत्र पर पर्दा डालना: ‘क्या LIC अब अडानी का निजी बैंक है?’

कांग्रेस ने इस महाघोटाले की तत्काल संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से जांच कराने की कठोर मांग की है, क्योंकि इसमें केंद्र सरकार के कई मंत्रालय और संस्थाएं नंगे हो चुके हैं। रमेश ने चुनौती दी कि अगर सरकार JPC जांच से बचने की कोशिश करती है, तो इसका एक ही अर्थ होगा — सत्य पर पर्दा डालने और इस महाषड्यंत्र को छिपाने की सुनियोजित साजिश। उन्होंने याद दिलाया कि कांग्रेस ने अपनी 100 प्रश्नों वाली “हम अडानी के हैं कौन (HAHK)” सीरीज़ में इस घोटाले की जड़ें पहले ही उजागर कर दी थीं, लेकिन प्रधानमंत्री चुप रहे। 

यह मामला अब केवल वित्तीय भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा और नैतिकता पर हमला है। जयराम रमेश ने तीखे शब्दों में मोदी सरकार को आईना दिखाते हुए पूछा — “जब सरकार जनता के पैसों से अपने पूंजीपति मित्रों के कर्ज चुकाती है, तो यह केवल स्कैम नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन है। मोदी जी, देश जानना चाहता है — क्या एलआईसी अब अडानी का निजी बैंक बन चुकी है?” कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि JPC जांच न होने पर यह लड़ाई संसद से लेकर देश के हर चौराहे तक लड़ी जाएगी।

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