Home » Opinion » ED का विस्तार या राजनीतिक हथियार? विपक्ष पर 95% कार्रवाई के आरोपों के बीच उठे बड़े सवाल

ED का विस्तार या राजनीतिक हथियार? विपक्ष पर 95% कार्रवाई के आरोपों के बीच उठे बड़े सवाल

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 मई 2026

केंद्र सरकार द्वारा Enforcement Directorate की ताकत में लगभग 60 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के भविष्य को लेकर गंभीर बहस का विषय बन चुका है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ED को मजबूत क्यों किया जा रहा है, बल्कि यह भी है कि क्या यह ताकत निष्पक्ष आर्थिक अपराध जांच के लिए इस्तेमाल होगी या फिर राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने का सबसे बड़ा औजार बनती जाएगी।

पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े विपक्ष के आरोपों को और तेज कर देते हैं। विभिन्न संसदीय जवाबों, मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक विश्लेषणों में बार-बार यह दावा सामने आया है कि ED की कार्रवाई का बड़ा हिस्सा विपक्षी नेताओं, विपक्ष-शासित राज्यों या भाजपा विरोधी दलों से जुड़े लोगों पर केंद्रित रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि करीब “95 प्रतिशत राजनीतिक मामले” विपक्षी नेताओं के खिलाफ दर्ज किए गए या सक्रिय रूप से आगे बढ़ाए गए। हालांकि सरकार इस आंकड़े को राजनीतिक प्रचार बताती है, लेकिन यह सच है कि हाल के वर्षों में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, DMK, RJD, CPI(M), शिवसेना (UBT), NCP (शरद गुट) और समाजवादी पार्टी के कई बड़े नेता ED की जांच के दायरे में आए हैं।

राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा उस पैटर्न को लेकर होती है जिसमें कई नेताओं पर विपक्ष में रहते हुए ED या CBI की कार्रवाई तेज होती दिखती है, लेकिन सत्ता पक्ष के करीब आने या भाजपा में शामिल होने के बाद जांच की गति धीमी पड़ जाती है या राजनीतिक विवाद कम हो जाते हैं। विपक्ष इसी आधार पर आरोप लगाता है कि जांच एजेंसियां “कानूनी संस्थाएं” कम और “राजनीतिक प्रबंधन तंत्र” ज्यादा बनती जा रही हैं।

यह भी एक बड़ा तथ्य है कि ED के मामलों में गिरफ्तारी और छापेमारी की संख्या तेजी से बढ़ी है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार पिछले वित्तीय वर्ष में एजेंसी की रेड लगभग दोगुनी हो गईं। लेकिन दूसरी ओर आलोचक यह सवाल भी उठाते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई के बावजूद अंतिम सजा यानी conviction rate अपेक्षाकृत कम क्यों है। विपक्ष कहता है कि एजेंसियों का इस्तेमाल “मीडिया ट्रायल” और “राजनीतिक दबाव” के लिए अधिक हो रहा है, जबकि अदालत में अंतिम दोष सिद्ध होने के मामले कम हैं।

हालांकि दूसरी तरफ यह तर्क भी उतना ही मजबूत है कि भारत में आर्थिक अपराध, हवाला, बेनामी संपत्ति, शेल कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय मनी लॉन्ड्रिंग का नेटवर्क अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक वित्तीय नेटवर्क के दौर में जांच एजेंसियों को तकनीकी और मानव संसाधनों से मजबूत करना जरूरी माना जा रहा है। सरकार का कहना है कि यदि भ्रष्टाचार या मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल लोग राजनीतिक दलों में हैं, तो केवल राजनीतिक पहचान के आधार पर उन्हें जांच से छूट नहीं दी जा सकती।

लेकिन लोकतंत्र में असली चुनौती “निष्पक्षता की धारणा” होती है। यदि देश की सबसे शक्तिशाली जांच एजेंसी की कार्रवाई लगभग पूरी तरह विपक्षी नेताओं पर केंद्रित दिखे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। यही वजह है कि ED अब केवल एक जांच एजेंसी नहीं रही, बल्कि भारतीय राजनीति के सबसे बड़े राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष का प्रतीक बन चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में ED को व्यापक अधिकार दिए हैं, लेकिन साथ ही संवैधानिक संतुलन और नागरिक स्वतंत्रता की अहमियत पर जोर दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी लोकतंत्र में जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता उनकी “राजनीतिक दूरी” से तय होती है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि एजेंसियां सत्ता के अनुसार सक्रिय या निष्क्रिय होती हैं, तो संस्थागत भरोसा कमजोर होने लगता है।

आज भारत में बहस सिर्फ ED की शक्ति पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर है। समर्थकों के लिए यह “भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक युद्ध” है, जबकि आलोचकों के लिए यह “राजनीतिक नियंत्रण का नया मॉडल” बन चुका है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि ED इतिहास में एक मजबूत निष्पक्ष जांच एजेंसी के रूप में याद की जाएगी या फिर राजनीतिक ध्रुवीकरण के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments