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अत्यधिक अंग्रेज़ी दवा का सेवन: आधुनिक समस्या

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आजकल लोग मामूली सिरदर्द, बदन दर्द, या खांसी-जुकाम जैसी छोटी बीमारियों में तुरंत अंग्रेज़ी दवाओं की ओर भागते हैं। पेनकिलर, एंटीबायोटिक और अन्य दवाएं बिना डॉक्टर की सलाह के लेने की आदत लोगों को तात्कालिक राहत तो देती हैं, लेकिन बार-बार या लंबे समय तक उनका सेवन शरीर के लिए गंभीर हानिकारक साबित हो सकता है। लगातार या अधिक मात्रा में अंग्रेज़ी दवा लेने से लीवर, किडनी और पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे पेट या आंत में गैंग्रीन, एलर्जी और रोग-प्रतिरोधक क्षमता में कमजोरी जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

अंग्रेज़ी दवाओं के छुपे हुए नुकसान

बहुत सी दवाएं शरीर के जरूरी पोषक तत्व—जैसे विटामिन C, B12, फोलिक एसिड और मैग्नीशियम—को धीरे-धीरे खत्म कर देती हैं। उदाहरण के लिए, एस्पिरिन का लगातार सेवन विटामिन C के अवशोषण को कम करता है, जिससे थकान, एनीमिया और आयरन की कमी हो सकती है। पैरासिटामोल ग्लूटाथियोन को घटाता है, जिससे लिवर पर बुरा असर पड़ता है। डायबिटीज की दवा मेटफॉर्मिन से विटामिन B12 की कमी और नसों को नुकसान होने का खतरा बढ़ जाता है। एंटासिड्स का लगातार सेवन कैल्शियम और पोटैशियम की कमी, मांसपेशियों की कमजोरी और हड्डियों की कमजोरी का कारण बन सकता है। इसी तरह, स्टैटिन्स से मांसपेशियों में दर्द और सूजन, एंटीबायोटिक्स से पेट की समस्याएं और इम्यूनिटी में गिरावट, स्टेरॉयड से हड्डियों की कमजोरी आम हैं।

बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए खतरा अधिक

छोटी बीमारियों के लिए ली जाने वाली अंग्रेज़ी दवाओं का असर बच्चों और बुज़ुर्गों पर ज्यादा गहरा पड़ता है। इनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और शरीर जल्दी साइड इफेक्ट्स के जाल में फंस जाता है। स्किन एलर्जी, नींद में बाधा, पेट की जलन, दस्त, उल्टी या शरीर में चकत्ते जैसे लक्षण अचानक उत्पन्न हो सकते हैं। कई बार दवाएं खाना खाने या अन्य दवाओं के साथ प्रतिक्रिया करती हैं, जिससे नई स्वास्थ्य समस्याएं जन्म लेती हैं। इस वजह से बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए अंग्रेज़ी दवा का सेवन विशेष सावधानी का विषय है।

आधुनिक जीवनशैली और नई बीमारियाँ

अनियमित खान-पान, तनाव, कम नींद और व्यायाम की कमी ने आज हाई ब्लड प्रेशर, शुगर, थायराइड और मानसिक चिंता जैसी बीमारियों को आम कर दिया है। इन बीमारियों के लिए लोग अंग्रेज़ी दवाओं पर निर्भर होकर केवल लक्षण दबाते रहते हैं, लेकिन बीमारी की जड़ का इलाज नहीं करते। धीरे-धीरे शरीर इन दवाओं का आदती हो जाता है, और दवाओं का डोज़ बढ़ता जाता है, जिससे गंभीर स्वास्थ्य जोखिम और ड्रग एडिक्शन जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं।

देसी इलाज और आयुर्वेदिक विकल्प

भारतीय परंपरा में हल्दी, अजवाइन, सोंठ, अदरक, तुलसी जैसी घरेलू औषधियों से छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज किया जाता रहा है। आयुर्वेद में न केवल लक्षणों का, बल्कि बीमारी की जड़ का पता लगाकर इलाज किया जाता है। घरेलू कसरत—जैसे वॉकिंग, हल्का योग, प्राणायाम—पाचन, रक्त संचार और प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं, जिससे शरीर खुद ही दर्द, सूजन और थकान से लड़ सकता है। आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सा में साइड इफेक्ट बेहद कम होते हैं और यह लंबी अवधि में शरीर की जड़ से बीमारी को ठीक करने में मदद करती हैं।

क्या करें और क्या न करें

छोटी बीमारियों के लिए बिना डॉक्टर की सलाह के अंग्रेज़ी दवा न लें। लंबे समय तक या अधिक मात्रा में दवा लेने से बचें। पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए संतुलित आहार लें और यदि दवा लेना आवश्यक हो तो विशेषज्ञ की सलाह पर सप्लीमेंट का सेवन करें। देसी उपायों को प्राथमिकता दें—गर्म पानी, हरी सब्जियां, प्राणायाम और हल्की कसरत रोज़मर्रा की दिनचर्या में शामिल करें। छोटी परेशानियों में धैर्य रखें, शरीर की इम्यूनिटी स्वयं ही काम करेगी। केवल तत्काल राहत के लिए लगातार अंग्रेज़ी दवाओं का सेवन भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।

 

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