हरियाणा से बिहार के लिए 3 नवंबर 2025 को अचानक चलाई गई चार स्पेशल ट्रेनों को लेकर सामने आई RTI जानकारी ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह खुलासा महज़ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, पूरे चुनावी तंत्र पर लगा एक ऐसा धब्बा है, जिसे धोना आसान नहीं होगा। चुनाव से सिर्फ़ 3 दिन पहले, जब बिहार में हर राजनीतिक दल वोटरों की नब्ज़ टटोलने में जुटा था, तब हरियाणा के कर्नाल और गुरुग्राम से चलकर भागलपुर और बक्सर/बनारस रूट पर पहुँचने वाली इन ट्रेनों की टाइमिंग, रूट, और उनकी गुप्त बुकिंग—सब कुछ एक गहरे राजनीतिक खेल की ओर इशारा करते हैं।
RTI जवाबों में साफ़ है कि कर्नाल से दो ट्रेनें और गुरुग्राम से दो ट्रेनें 3 नवंबर की सुबह 10–11 बजे के बीच बिहार के लिए रवाना हुईं। कोच कंपोज़िशन में जनरल, स्लीपर, SLR जैसे 20 तक कोच लगाए गए, और यह सब “एक्स्ट्रा रश क्लियरेंस” के नाम पर किया गया। लेकिन जब जानकारी मांगी गई कि इन ट्रेनों को किसने बुक किया, कितना किराया जमा हुआ, कितने यात्री सवार थे, सुरक्षा जमा कौन-सा था, और इन ट्रेनों की जरूरत क्यों पड़ी, तो रेलवे ने या तो चुप्पी साध ली या जवाब को प्रेस रिलीज़ के पीछे धकेल दिया। यानी, असली सवालों पर सर्जिकल साइलेंस—जो किसी भी लोकतंत्र में सबसे बड़ी चेतावनी होती है।
सबसे बड़ा संदेह पैदा करने वाली बात यह है कि मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट चल रहा था। ऐसे समय में हर सरकारी संसाधन का उपयोग अत्यंत सख़्ती से नियंत्रित रहता है। लेकिन यहाँ मामला अलग है—सरकारी ट्रेनों को “अतिरिक्त भीड़” के नाम पर ऐसे समय में बिहार भेजा गया, जब उसी सप्ताह वहां पहला चरण 6 नवंबर और दूसरा चरण 11 नवंबर को मतदान होना था। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर हरियाणा से अचानक इतनी भीड़ बिहार में क्या करने जा रही थी? त्योहार? पर्यटन? या फिर वह भीड़, जो ECI की नज़रों से बचाकर मतदान केंद्र तक पहुँचाई जानी थी?
Representation of the People Act, 1951 की धारा 123(5) के तहत, किसी भी तरह का “फ्री कंवेयंस ऑफ वोटर्स” यानी वोटरों को मुफ्त/प्रायोजित यातायात उपलब्ध कराना एक भ्रष्ट चुनावी प्रैक्टिस माना जाता है। और अगर सरकारी संसाधन का उपयोग किसी विशेष पार्टी के चुनावी लाभ के लिए किया गया हो, तो यह न सिर्फ़ कानूनी अपराध है, बल्कि लोकतंत्र की पूरी बुनियाद को हिला देने वाला कदम है। सवाल यह भी है—क्या यह सिर्फ़ संयोग है कि ट्रेनों की शुरुआत हरियाणा से हुई, और अंत बिहार के उन क्षेत्रों में जहाँ वोटर्स की जनसांख्यिकी राजनीतिक नतीजे बदल सकती है?
RTI से यह भी साफ़ हुआ कि रेलवे कई सवालों पर जानकारी देने से बचता रहा। इससे शक और गहरा हो जाता है—क्या ट्रेनें वाकई “भीड़” के लिए चलाई गई थीं? या फिर यह रेलवे की आड़ में चलाई गई “वोट-ट्रांसफर मशीनें” थीं? क्या किसी विशेष राजनीतिक लाभ के लिए हरियाणा से “माइग्रेंट वोट बैंक” की संगठित ढुलाई की गई? यदि हाँ, तो यह देश के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा “रेलगाड़ी घोटाला” हो सकता है।
अब सवाल रेलवे से ज़्यादा चुनाव आयोग और सरकार की पारदर्शिता पर है। यदि यह केवल “भीड़ क्लियरेंस” था, तो बुकिंग से लेकर किराए तक हर जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं है? अगर यह वोटरों की ढुलाई नहीं थी, तो फिर गोपनीयता क्यों? और यदि यह चुनावी धांधली है, तो फिर लोकतंत्र के मूल स्तंभ के साथ ऐसा खिलवाड़ कोई सरकार कैसे कर सकती है?
यह मामला सिर्फ़ ट्रेनों का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का है। और चुनावी लोकतंत्र तभी तक मजबूत है, जब तक उसकी रेल सिर्फ़ जनता की आवाज़ लेकर चलती है—न कि सत्ता के लिए भरी जा रही एकतरफा “स्पेशल बोगियों” में बदल जाती है।





