एबीसी डेस्क | 13 दिसंबर 2025
अगस्त में जब CAG और संसद की पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (PAC) की रिपोर्टें सामने आईं, तब यह साफ हो गया था कि बच्चों की शिक्षा के नाम पर वसूले गए हजारों करोड़ रुपये सही जगह तक पहुंचे ही नहीं। यह कोई तकनीकी चूक या मामूली प्रशासनिक गलती नहीं थी, बल्कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में एक गहरे और व्यवस्थित संकट की तस्वीर थी। इसके बावजूद चार महीने गुजर जाने के बाद भी सरकार की तरफ से न कोई ठोस जवाब आया, न जिम्मेदारी तय हुई और न ही सुधार की दिशा में कोई स्पष्ट कदम उठाया गया। ऐसे में यह सवाल लाज़मी है कि क्या ₹48,000 करोड़ पर बनी यह चुप्पी सिर्फ लापरवाही है, या फिर इसे भी उसी तरह “नीति” मान लिया गया है, जैसे नई शिक्षा नीति के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं?
टैक्स वसूली चुस्त, शिक्षा खर्च सुस्त—दोहरा मापदंड क्यों?
2018 से 2024 के बीच 4% हेल्थ एंड एजुकेशन सेस के जरिए ₹75,542 करोड़ वसूले गए। यह पैसा स्कूलों, छात्रवृत्तियों, मिड-डे मील, उच्च शिक्षा और रिसर्च के लिए था। लेकिन करीब ₹48,000 करोड़ (64%) खर्च ही नहीं हुए। वसूली में कभी देरी नहीं, लेकिन खर्च में हमेशा बहाने। क्या सेस सिर्फ राजस्व बढ़ाने का जरिया बन गया है? अगर सिस्टम टैक्स काटने में फुर्तीला है, तो बच्चों तक पैसा पहुंचाने में लकवाग्रस्त क्यों?
CAG का चार्जशीट: व्यवस्था ही नदारद, जवाबदेही शून्य
CAG की रिपोर्ट सीधी और कठोर है—एजुकेशन सेस के लिए कोई अलग, पारदर्शी और बाध्यकारी मैकेनिज़्म बनाया ही नहीं गया। न समयबद्ध मंजूरियां, न स्पष्ट प्रक्रियाएं, न मजबूत निगरानी। नतीजा—हजारों करोड़ रुपये फाइलों में दफन या बजट के दूसरे घाटों को भरने में मोड़ दिए गए। यह नीति की चूक नहीं, नीति-विरुद्ध आचरण है।
बच्चों पर वार: भूख, जर्जर स्कूल और रुकी हुई छात्रवृत्तियां
जिसका असर सबसे पहले बच्चों पर पड़ता है, वही योजनाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं। PM पोषण (मिड-डे मील) में ₹1,912 करोड़ खर्च नहीं हो पाए—जबकि कुपोषण आज भी हकीकत है। स्कूलों में शिक्षक कम, इमारतें जर्जर, सुविधाएं नदारद। छात्रवृत्तियों में देरी ने लाखों छात्रों को पढ़ाई छोड़ने के कगार पर खड़ा कर दिया। यह लापरवाही नहीं, सीधा नुकसान है।
रिसर्च का गला घोंटा गया: युवाओं से भविष्य छीना
नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के लिए तय ₹2,000 करोड़ रुपये ज्यों के त्यों पड़े रहे। न लैब बनीं, न प्रोजेक्ट शुरू हुए, न इनोवेशन को पंख मिले। सरकार ज्ञान-अर्थव्यवस्था की बात करती है, लेकिन फंड फाइलों में कैद हैं। यह सिर्फ धन का नहीं, समय और प्रतिभा का अपव्यय है—जिसकी कीमत देश दशकों तक चुकाएगा।
PAC की चेतावनी अनसुनी: सेस का पैसा भटका, शिक्षा हारी
PAC ने साफ कहा—बिना स्पष्ट ट्रैकिंग के सेस की रकम शिक्षा से फिसलकर अन्य मदों में चली जाती है। चेतावनी थी कि सेस की आत्मा बचानी होगी। लेकिन सुनवाई नहीं हुई। सवाल उठता है—जब संसद की समिति भी असर नहीं डाल पाती, तो जवाबदेही किससे तय होगी?
असली पीड़ित: टैक्सपेयर और भविष्य की पीढ़ी
इस पूरे खेल में हारने वाले वही हैं जो ईमानदारी से टैक्स देते हैं और अपने बच्चों के बेहतर कल का सपना देखते हैं। स्कूलों में सुविधाएं नहीं, रिसर्च में दम नहीं—लेकिन खजाने में पैसा पड़ा है। यह वित्तीय कुप्रबंधन नहीं, पीढ़ीगत विश्वासघात है।
खामोशी का अर्थ: जवाबदेही से बचने की रणनीति?
अगस्त से दिसंबर तक की चुप्पी बताती है कि सरकार जवाब देने से बच रही है। न श्वेतपत्र, न टाइमलाइन, न जिम्मेदारी तय। क्या यह मान लिया गया है कि रिपोर्ट आएगी और भूल जाएगी? लोकतंत्र में खामोशी सबसे खतरनाक संकेत होती है।
अब क्या चाहिए: कानून, ट्रैकिंग और दंड—तीनों साथ
देश को बहानों की नहीं, कार्रवाई की जरूरत है।
- एजुकेशन सेस के लिए कानूनी तौर पर बाध्यकारी फेंसिंग—पैसा शिक्षा से बाहर न जाए।
- रीयल-टाइम ट्रैकिंग—हर रुपये का हिसाब सार्वजनिक हो।
- जिम्मेदारी तय और दंड—देरी और डायवर्ज़न पर स्पष्ट सजा।
रिपोर्टें काफी नहीं, अब फैसला चाहिए
तथ्य अब किसी बहस के मोहताज नहीं हैं। CAG और संसद की PAC जैसी संवैधानिक संस्थाओं ने दस्तावेज़ों के साथ साफ-साफ बता दिया है कि एजुकेशन सेस के नाम पर वसूले गए ₹48,000 करोड़ रुपये शिक्षा तक पहुंचे ही नहीं। ये आंकड़े किसी राजनीतिक दल के आरोप नहीं हैं, बल्कि देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्थाओं की आधिकारिक रिपोर्टों में दर्ज हैं। इसके बाद भी अगर सरकार चुप है, तो यह चुप्पी साधारण नहीं मानी जा सकती। लोकतंत्र में रिपोर्टें चेतावनी होती हैं, लेकिन चेतावनी पर कार्रवाई न हो तो वह सिस्टम की नाकामी बन जाती है।
यह मामला सिर्फ पैसे का नहीं है, बल्कि नीयत और प्राथमिकता का है। अगर सरकार हर साल टैक्स वसूल सकती है, तो उसी तत्परता से शिक्षा पर खर्च क्यों नहीं कर सकती? जब हर बजट में शिक्षा को “राष्ट्र का भविष्य” कहा जाता है, तो फिर वही भविष्य फाइलों में क्यों दबा रहता है? क्या बच्चों की पढ़ाई, उनका पोषण और युवाओं की रिसर्च वास्तव में प्राथमिकता है, या सिर्फ भाषणों की शोभा?
₹48,000 करोड़ कोई अमूर्त संख्या नहीं है। यह रकम अगर ज़मीन पर उतरती, तो लाखों बच्चों के हाथ में बेहतर किताबें होतीं, स्कूलों में पंखे-शौचालय-लैब होतीं, मिड-डे मील की थाली में पूरा पोषण होता और विश्वविद्यालयों में रिसर्च के नए दरवाज़े खुलते। यह पैसा काग़ज़ों में नहीं, क्लासरूम, किचन और कैंपस में दिखना चाहिए था। लेकिन हुआ इसका उल्टा—जहां ज़रूरत थी वहां पैसा नहीं पहुंचा, और जहां नहीं होना चाहिए था वहां वह खप गया या पड़ा रह गया।
अब सवाल यह नहीं रह गया कि गलती कहां हुई; सवाल यह है कि कौन जिम्मेदार है और सुधार कब होगा। क्या सरकार एक समयबद्ध रोडमैप देगी कि बचे हुए पैसों को कैसे और कब शिक्षा में लगाया जाएगा? क्या सेस के लिए अलग कानूनी ढांचा बनेगा ताकि भविष्य में एक भी रुपया इधर-उधर न हो सके? या फिर यह मान लिया जाए कि रिपोर्टें आएंगी, सुर्खियां बनेंगी और कुछ महीनों बाद सब भुला दिया जाएगा?
राष्ट्रनिर्माण भाषणों से नहीं होता, बल्कि निर्णयों और क्रियान्वयन से होता है। अगर सरकार सचमुच शिक्षा को देश की रीढ़ मानती है, तो उसे अभी, यहीं फैसला करना होगा—खामोशी छोड़कर सुधार का रास्ता चुनना होगा। क्योंकि जो देश अपने बच्चों की पढ़ाई और युवाओं की प्रतिभा में निवेश नहीं करता, वह भविष्य में कीमत चुकाने को मजबूर होता है। ₹48,000 करोड़ का सही इस्तेमाल सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति नैतिक जिम्मेदारी है।




