आलोक रंजन, वरिष्ठ पत्रकार | नई दिल्ली, 29 अक्टूबर 2025
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में कृषि शिक्षा व्यवस्था का ढांचा धीरे-धीरे ढहता जा रहा है। पूसा कृषि विज्ञान केंद्र (आईएआरआई), नई दिल्ली में 27 अक्टूबर को आयोजित ‘राष्ट्रीय कृषि छात्र सम्मेलन’ के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने यह कड़वी सच्चाई सामने आई कि देश के कृषि विश्वविद्यालयों और संस्थानों में शिक्षकों के 85% तक पद खाली पड़े हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने स्वीकार किया कि विभिन्न संस्थानों में वैकेंसी का स्तर 15% से लेकर 85% तक फैला हुआ है, जिससे कृषि शिक्षा की गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।
कृषि मंत्री चौहान ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताते हुए आईसीएआर को निर्देश दिया कि खाली पदों को तत्काल भरा जाए, संस्थानों की ग्रेडिंग प्रणाली शुरू की जाए और कृषि शिक्षा को मजबूत करने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स गठित की जाए। उन्होंने कहा — “कृषि शिक्षा में सुधार के बिना आत्मनिर्भर भारत का सपना अधूरा रहेगा।” यह निर्देश केवल आईसीएआर के लिए ही नहीं, बल्कि राज्यों के कृषि विभागों के लिए भी है, जहां हजारों पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं।
देश को हो रहा गहरा नुकसान: शिक्षा से लेकर अर्थव्यवस्था तक का संकट
कृषि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी का सीधा असर देश की कृषि उत्पादकता, अनुसंधान और आर्थिक स्थिरता पर पड़ रहा है। भारत में कृषि क्षेत्र लगभग 42% आबादी को रोजगार देता है और जीडीपी में 18% का योगदान करता है। लेकिन वैकेंसी के कारण यह पूरा ढांचा चरमराने लगा है।
शिक्षा की गुणवत्ता पर असर:
छात्रों को पर्याप्त मार्गदर्शन न मिलने से कृषि स्नातकों की क्षमता में भारी गिरावट देखी जा रही है। 2017 से 2022 के बीच कृषि विश्वविद्यालयों में नामांकन दोगुना हुआ, लेकिन शिक्षकों की कमी के कारण व्यावहारिक प्रशिक्षण, नवाचार और रिसर्च कौशल बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। नतीजतन नई पीढ़ी के किसान और वैज्ञानिक तैयार नहीं हो पा रहे, जो जलवायु परिवर्तन और उत्पादकता की चुनौतियों से जूझ सकें।
अनुसंधान का ठहराव:
कृषि विश्वविद्यालय अनुसंधान के केंद्र माने जाते हैं, लेकिन खाली पदों के कारण शोध परियोजनाएं ठप पड़ी हैं। नई फसल किस्में, कीट प्रबंधन तकनीकें और सतत खेती के उपाय विकसित करने में लगातार देरी हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति में किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य अब एक दूर का सपना बन गया है।
अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर खतरा:
कृषि शिक्षा की कमजोरी से ग्रामीण रोजगार में गिरावट आ रही है। स्नातकों के लिए सरकारी अवसर सीमित हैं, और निजी क्षेत्र (बीज कंपनियां, बैंक, कृषि तकनीक संस्थान) में भी मांग घटती जा रही है। इससे भविष्य में खाद्य आयात बढ़ने का खतरा है, जो विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव डालेगा। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, तकनीकी-आधारित कृषि शिक्षा ही उत्पादकता बढ़ा सकती है, लेकिन मौजूदा वैकेंसी इसे पूरी तरह रोक रही है।
जनता और सोशल मीडिया का गुस्सा
सोशल मीडिया पर यह मुद्दा जोर पकड़ रहा है। वरिष्ठ पत्रकार शकील अख्तर ने लिखा — “बातों की तो कोई कमी नहीं है, मगर काम की कोई ना कहे!” वहीं, समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता डॉ. अशुतोष वर्मा ने इसे “गरीबों को शिक्षा से दूर करने की साजिश” बताया। छात्र संगठनों ने भी सरकार से मांग की है कि भर्ती प्रक्रिया को फास्ट-ट्रैक मोड में लाया जाए।
भविष्य के लिए खतरे की घंटी
यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, क्योंकि कृषि भारत की आर्थिक रीढ़ है। अगर 85% पद खाली रहेंगे, तो न केवल वर्तमान किसान पीड़ित होंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी खतरे में पड़ जाएगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इससे जीडीपी ग्रोथ 1-2% तक प्रभावित हो सकती है और ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ेगी।
सरकार की ओर से निर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन कार्यान्वयन में देरी देश को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकती है। जब तक खाली पद नहीं भरे जाते, तब तक कृषि क्रांति का सपना अधूरा रहेगा।
कृषि मंत्री के निर्देशों का असर कब दिखेगा, यह तो समय बताएगा, पर इतना तय है कि अगर शिक्षा और अनुसंधान में निवेश नहीं बढ़ाया गया, तो भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता खतरे में पड़ सकती है। यह संकट एक स्पष्ट चेतावनी है अगर आज शिक्षा में बीज नहीं बोएंगे, तो कल अन्न का भविष्य खो देंगे।




