नई दिल्ली 18 नवंबर
आतंकवाद को हिंदू–मुस्लिम चश्मे से देखना सबसे खतरनाक भूल
देश की राजनीति और मीडिया माहौल में बढ़ती साम्प्रदायिक तल्ख़ी के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का एक पुराना वीडियो (2014) अचानक सुर्खियों में लौट आया है। इस वीडियो में डोभाल बेहद साफ़ और सख़्त शब्दों में कहते हैं कि भारत में आतंकवाद को हिंदू–मुस्लिम के चश्मे से देखना सिर्फ़ गलत ही नहीं, बल्कि देश की एकता और सुरक्षा के लिए सबसे गहरी चोट है। यह वीडियो एक तरह से उन तमाम दक्षिणपंथी ट्रोल्स, नफ़रती प्रचारकों और टीवी पर्दे पर हर मुद्दे को धार्मिक रंग देने वाले “ग़ोदी एंकरों” के चेहरे बेनकाब करने जैसा है, जो सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को धर्म की खाई में धकेलकर जनता का ध्यान भटकाते रहे हैं।
“भारत में आतंकवाद समुदायों की लड़ाई नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है”—डोभाल का स्पष्ट संदेश
वीडियो में डोभाल कहते हैं कि भारत की लड़ाई किसी “हिंदू आबादी बनाम मुस्लिम आबादी” की नहीं है। आतंकवाद एक शुद्ध रूप से राष्ट्रीय मुद्दा है, जिसमें किसी धर्म का नाम लेना या किसी समुदाय को दोषी ठहराना न केवल अविवेकपूर्ण है बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी एक गंभीर गलती है। उनका कहना था कि आतंकवाद का मुकाबला तभी प्रभावी हो सकता है जब पूरे देश को एकजुट रखकर कार्य किया जाए, और इस एकजुटता को धार्मिक विभाजन की राजनीति नुकसान पहुंचाती है।
डोभाल के शब्दों में यह चेतावनी थी कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को धार्मिक चश्मे से देखने वाले लोग न केवल वास्तविक खतरों को समझने में असफल हैं बल्कि अनजाने में आतंकवादियों के narratives को भी बढ़ावा देते हैं।
“मुस्लिम संगठन हमारी लड़ाई में हमारे साथ हैं—कई हिंदू संगठनों से ज़्यादा मजबूती से”—डोभाल के बयान ने चौंकाया
वीडियो का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वह है जिसमें अजीत डोभाल साफ़ कहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में भारत के मुस्लिम संगठन न सिर्फ़ साथ खड़े हैं, बल्कि कई मामलों में हिंदू संगठनों से भी अधिक मजबूती से सहयोग करते हैं।
यह बयान उस प्रचार को सीधी चुनौती देता है जिसमें मुसलमानों को अक्सर संदेह की नज़र से देखा जाता है, और आतंकवाद के मुद्दे पर सामूहिक रूप से निशाना बनाया जाता है।
डोभाल का यह कहना कि भारतीय मुसलमान आतंकवाद के खिलाफ सबसे पहले, सबसे मुखर और सबसे संगठित रूप से आवाज़ उठाते रहे हैं, आज के राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह उलट देता है और यह बताता है कि समाज में नफ़रत का माहौल कितनी गलत धारणाओं पर खड़ा है।
2012 का ऐतिहासिक फ़तवा—50,000 मौलानाओं का मंच पर आकर आतंकवाद के खिलाफ ऐलान
डोभाल ने एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना का ज़िक्र किया—2012 में दिल्ली के रामलीला मैदान में 50,000 मौलानाओं ने वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ एक सर्वसम्मत फ़तवा जारी किया था। यह एक असाधारण घटना थी, जब इतने बड़े पैमाने पर धार्मिक नेताओं ने एकजुट होकर हिंसा का विरोध किया।
डोभाल बताते हैं कि मुस्लिम संगठनों ने चाहा था कि कुछ हिंदू संगठन भी इस मंच पर आएं, ताकि यह एक व्यापक, समन्वित और राष्ट्रीय संदेश बने। लेकिन उन्होंने यह भी खुलासा किया कि कुछ हिंदू संगठनों ने इस कार्यक्रम में शामिल होने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि यह उनके लिए जोखिमभरा होगा। यह बयान यह स्पष्ट करता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कौन वास्तव में आगे रहा और किसने दूरी बनाई—और इससे साम्प्रदायिक नरेटिव की पोल भी खुलती है।
“कट्टरपंथी हिंसक गुटों को इस्लाम की आवाज़ समझ लेना खतरनाक भूल है”—डोभाल का ऐतिहासिक विश्लेषण
डोभाल ने यह भी स्पष्ट किया कि देश में अक्सर बहुत छोटा, हिंसक और उग्रपंथी गुट पूरे इस्लाम की आवाज़ मान लिया जाता है, जबकि हक़ीक़त इसके बिल्कुल उलट है। भारतीय मुसलमानों का विशाल बहुमत हिंसा को खारिज करता है, आतंकवाद का विरोध करता है और राष्ट्रीय सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभाता है। डोभाल ने कहा कि इस्लाम, भारतीयता और राष्ट्रवाद की जो साझा सांस्कृतिक धारा है, उसका गलत चित्रण करके मीडिया और राजनीतिक ताकतें देश को अनावश्यक विभाजनों में धकेल देती हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि जब भी कोई राष्ट्र अपने ही नागरिकों को शक की नज़रों से देखना शुरू करता है, वह न सिर्फ़ सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि आतंकवादियों के एजेंडा को भी मजबूत करता है।
“स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय मुसलमानों का योगदान अविस्मरणीय”—डोभाल का ऐतिहासिक संदर्भ आज और भी प्रासंगिक
वीडियो में डोभाल यह भी याद दिलाते हैं कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में मुसलमानों का बड़ा और निर्णायक योगदान रहा है। खान अब्दुल गफ्फार खान, मौलाना आज़ाद, अशफ़ाक़ उल्ला खान—इन जैसे अनगिनत नाम स्वतंत्रता की लड़ाई के स्तंभ रहे।
डोभाल का यह तर्क कि भारत की राष्ट्रीय पहचान किसी एक समुदाय की बपौती नहीं बल्कि सभी का साझा योगदान है—आज के माहौल में बेहद ka महत्वपूर्ण संदेश की तरह उभरता है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और साम्प्रदायिक पहचान को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना न केवल ऐतिहासिक सच का अपमान है, बल्कि आज की नीतियों को भी गलत दिशा में ले जाता है।
डोभाल का पुराना वीडियो आज के भारत के लिए नए सबक की तरह
अजीत डोभाल के इस पुराने वीडियो का दोबारा उभरना यह दर्शाता है कि देश में साम्प्रदायिक राजनीति और नफरत फैलाने वालों के बीच भी कुछ आवाज़ें ऐसी हैं जो राष्ट्रीय मुद्दों को सही संदर्भ में देखने की सलाह देती हैं।
जब राजनीतिक माहौल हर मुद्दे को हिंदू–मुस्लिम खांचे में धकेल रहा है, डोभाल का संदेश हमें यह याद दिलाता है कि—आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। धर्म का कोई आतंक नहीं होता। और भारत की ताक़त उसकी एकता है, न कि उसके विभाजन।





